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टाइम मशीन: क्या बिल्लियां तरल होती हैं? एक भौतिकविज्ञानी की सैद्धान्तिक दलील

Sun, 23 Feb 2025 07:00 AM IST
शिव शुक्ला मैनन बिस्कॉफ
मैनन बिस्कॉफ Published by: शिव शुक्ला Updated Sun, 23 Feb 2025 07:00 AM IST
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सार
जैक्स मोनोड इंस्टीट्यूट के भौतिक विज्ञानी मार्क-एंटोनी फर्दिन रियोलॉजी (द्रव गतिकी) के आधार पर प्रमाणित करते हैं कि जिस प्रकार तरल पदार्थों का आयतन समान रहने पर भी आकार बदल लेता है, उसी तरह बिल्ली में भी जगह के अनुसार अपना आकार बदलने की जादुई क्षमता होती है।
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Time Machine: Are Cats Liquid? theoretical argument of a physicist
बिल्ली। - फोटो : Istock

विस्तार

यह करीब पंद्रह साल पहले की बात है। नए वर्ष का पहला दिन था। थोड़ी देर पहले हम सभी बेहद खुश थे, लेकिन अब पूरे परिवार को एक अनजाना-सा डर सताने लगा था। दरअसल, हमारी पालतू बिल्ली टिग्रो, जो कुछ घंटे पहले तक हमारे पास ही थी, कहीं चली गई थी। सभी अनुमान लगा रहे थे। शायद वह पटाखों के शोर से डर गई हो या कोई उसे उठा कर ले गया हो। हमने उसकी सभी पसंदीदा जगहों पर तलाश की, पर वह कहीं नहीं मिली। हमें यही लग रहा था कि शायद हमने उसे हमेशा के लिए खो दिया। पर कुछ ही देर बाद हमने जो देखा, वह किसी आश्चर्य से कम नहीं था। दीवार में एक संकरा छेद था, जिसमें एक काले व रोएंदार जीव को हमने रेंगते देखा। हम हैरान थे। वह टिग्रो नहीं हो सकती थी। वह इस छोटे-से छेद में समा ही नहीं सकती थी। टिग्रो अब मेरी गोद में खेल रही थी, और मेरे जेहन में यही विचार चल रहा था कि क्या बिल्लियां पानी होती हैं, जो किसी आकार में ढल जाती हैं।



बिल्लियों को तरल रूप में संदर्भित करने वाले मीम्स कई वर्षों से ऑनलाइन प्रसारित हो रहे हैं। इसने जैक्स मोनोड इंस्टीट्यूट के भौतिक विज्ञानी मार्क-एंटोनी फर्दिन का ध्यान आकर्षित किया, जो अब पेरिस सिटी यूनिवर्सिटी और फ्रेंच नेशनल सेंटर फॉर साइंटिफिक रिसर्च में हैं। वर्ष 2014 के वसंत में, फर्दिन ने बिल्लियों के तरल व्यवहार का अध्ययन करना शुरू किया। यह ऐसा शगल था, जिसने उन्हें अपने असली काम से हटकर कुछ अलग करने का अवसर दिया था। वह कहते हैं, ‘इस अजीब से प्रयोग ने वास्तव में मुझे कुछ सफलता दिलाई। इसने मुझे भौतिकी का आईजी नोबेल पुरस्कार दिलाया, जो ऐसे शोध को पुरस्कृत करता है, जो आपको हंसाने के साथ सोचने पर भी मजबूर करता है।’ स्कूल में हम सबने पढ़ा होगा कि ठोस पदार्थ के अंदर अणु एक-दूसरे से सटे हुए होते हैं और एक निश्चित स्थान पर होते हैं, जबकि द्रव पदार्थ के अंदर अणु एक-दूसरे के इर्द-गिर्द ठोस की तुलना में ज्यादा दूर व स्वतंत्र रूप से घूमते हैं। लेकिन फर्दिन का शोध द्रव गतिकी या रियोलॉजी पर आधारित है। इसके अनुसार, जिन वस्तुओं का आयतन स्थिर होता है और आकार निश्चित होता है, वे ठोस होती हैं। जबकि तरल पदार्थों का आयतन वही रहता है, लेकिन उनका आकार बदल सकता है। बिल्लियों पर तरल पदार्थों वाला मानदंड लागू होता है: स्थिर आयतन के बावजूद, वे कार्डबोर्ड बॉक्स या सिंक जैसे कंटेनर में घुसने के लिए अपनी इच्छानुसार झुक सकती हैं। इसका मतलब यह कि बिल्लियों को तरल पदार्थ के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए, है न?


लेकिन इस प्रश्न का जवाब देना इतना आसान भी नहीं है। फर्दिन कहते हैं, ‘अगर हम लंबे समय तक प्रतीक्षा करें, तो अंततः सब कुछ बह जाएगा। यही रियोलॉजी का आदर्श वाक्य है।’ उदाहरण के लिए, ढलान वाली सड़क का ठोस डामर बहुत धीरे-धीरे बहता है, जिसे कई वर्षों या दशकों बाद देखा जा सकता है। अगर ठोस पदार्थ पर भी पर्याप्त दबाव डाला जाए, तो वे विकृत हो सकते हैं। दूसरी तरफ, तरल पदार्थ में भी ठोस गुण हो सकते हैं। मसलन, केचअप खुली कांच की बोतल से तभी निकलता है, जब उसे कई बार हिलाया जाता है। इसलिए तरल पदार्थों की पहले दी गई परिभाषा पूरी तरह से मान्य नहीं है। तरल क्या है-यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किसी चीज को कितनी देर तक देखते हैं। इसलिए रियोलॉजिस्ट यह इंगित करने के लिए कि कोई वस्तु कितनी तरल है, डेबोरा संख्या (डीई) नामक एक मान का उपयोग करते हैं, जो आंशिक रूप से अवलोकन समय (टी) पर निर्भर करता है। सिद्धांत रूप में, डेबोरा संख्या जितनी छोटी होगी, पदार्थ उतना ही अधिक तरल होगा। अवलोकन समय के अतिरिक्त, डेबोरा संख्या कथित विश्राम समय पर भी निर्भर करती है, जो कि तरल पदार्थ को अपना आकार अनुकूलित करने में लगने वाला समय है। यदि आप गिलास में पानी डालते हैं, तो यह बहुत जल्दी भर जाता है, इसलिए विश्राम का समय बहुत कम होता है। जबकि शहद जैसे चिपचिपे तरल को भरने के लिए आपको अधिक समय तक इंतजार करना पड़ता है। आप जितनी ज्यादा देर तक किसी चीज का निरीक्षण करते हैं, डेबोरा संख्या उतनी ही छोटी होती जाती है और वह उतनी ही ज्यादा तरल दिखाई देती है। पहाड़ निर्विवाद रूप से ठोस है, लेकिन लाखों वर्षों में यह भी बदल जाता है। वास्तव में, डेबोरा संख्या का नाम ओल्ड टेस्टामेंट के एक भाग की पंक्ति से आया है, जिसे ‘डेबोरा का गीत’ के नाम से जाना जाता है। (किंग जेम्स संस्करण में अनुवाद है: ‘पहाड़ प्रभु के सामने पिघल गए।’) डेबोरा संख्या यह स्पष्ट नहीं करती कि बिल्लियां तरल पदार्थ हैं या नहीं। वास्तव में तरल पदार्थ क्या है, क्योंकि यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप उन्हें कितनी देर तक देखते हैं। फिर भी, द्रव गतिकी से संबंधित अध्ययन बिल्लियों की कई तरल विशेषताओं को प्रकट करते हैं। बिल्लियों की डेबोरा संख्या की गणना करने के लिए आपको उनके विश्राम समय का निर्धारण करना होगा।

यह विभिन्न जानवरों में अलग-अलग होता है, जो उसकी नस्ल, उम्र, आदि पर निर्भर करता है। जैसे, बिल्ली के बच्चों को आराम करने में अधिक समय लग सकता है, क्योंकि वे बहुत ज्यादा बेचैन रहते हैं। उन्हें शांत होने और अपने आकार को वातावरण के अनुसार ढालने में घंटों लग सकते हैं। फर्दिन ने बताया कि कंटेनर या वातावरण का आकार भी मायने रखता है। उदाहरण के लिए, बिल्लियां अपने मालिक की गोद में ज्यादा जल्दी आराम कर सकती हैं, बजाय उस वाहन के, जिसमें उन्हें पशु चिकित्सक के पास ले जाया जाता है। यह परिवर्तनशीलता बिल्लियों को तरल ठहराती है। कई परिचित तरल पदार्थों में विश्राम का समय उनके वातावरण के आधार पर अलग-अलग होता है। पानी टेफ्लॉन जैसी विकर्षक सतहों पर बूंदों के रूप में रहता है, जबकि यह अन्य सतहों पर आसानी से फैल जाता है। जैसा कि फर्दिन ने बताया, बिल्लियां तरल पदार्थों के साथ अन्य गुण भी साझा करती हैं। उदाहरण के लिए, उनमें न्यूनतम तनाव होता है, जिसका अर्थ है कि कंटेनर से बाहर निकलने से पहले उन्हें न्यूनतम मात्रा में बल लगाना पड़ता है। यही बात प्लास्टिक की बोतल में केचअप पर भी लागू होती है, जिसे निचोड़कर निकालना पड़ता है। इसके अलावा, बिल्लियां तरल पदार्थ की तरह अपने शरीर को उस बर्तन के अनुकूल बना लेती हैं, जिसमें वे प्रवेश करती हैं। बिल्लियों में कुछ तरल पदार्थों की तरह एक और विशेषता होती है, वह है उनका उच्च सतही तनाव, जो छोटे कंटेनर में अंदर या बाहर दबाव डालने पर काम आता है। जीवन विज्ञान के दृष्टिकोण से, ये जानवर मनुष्यों जैसे अन्य प्राणियों की तुलना में बहुत अधिक तरल पदार्थ की तरह दिखते हैं, क्योंकि उनकी कॉलरबोन चलती है (और कभी-कभी गायब होती है)। एक बार जब उनका सिर एक छेद से होकर गुजरता है, तो शरीर का बाकी हिस्सा आसानी से उसका अनुसरण कर सकता है। इसी तरह से टिग्रो घर की दीवार के एक संकरे छेद में घुस गई थी।

लेखिका सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी और स्पेक्ट्रम की संपादक हैं, जो साइंटिफिक अमेरिकन का सहयोगी प्रकाशन है।

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