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लंबित मुकदमों की त्वरित सुनवाई का समय

Thu, 06 Aug 2020 03:14 AM IST
Vinay Jhelawat विनय झैलावत
Updated Thu, 06 Aug 2020 03:14 AM IST
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Time for speedy trial of pending cases
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर भानुमति ने अपने विदाई भाषण में जिन प्रश्नों को उठाया है, उनसे न्यायपालिका से जुड़े सभी व्यक्तियों को आत्मचिंतन करने पर मजबूर कर दिया है। अपने विदाई संभाषण में उन्होंने कहा, 'मैंने अपने पिता को एक दुर्घटना में दो वर्ष की उम्र में खोया।


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उन दिनों हमने मुआवजे के लिए न्यायालय में दावा प्रस्तुत किया। मेरी माताजी ने दावा पेश किया, जिस पर न्यायालय ने डिक्री भी पारित की, पर हम न्याय व्यवस्था की पारित प्रक्रिया के कारण मुआवजे की रकम प्राप्त नहीं कर सके। मैं स्वयं, मेरी विधवा माताजी तथा मेरी दो बहनें न्याय व्यवस्था की प्रक्रिया में कमी एवं न्याय व्यवस्था के विलंब के शिकार रहे।'

सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीशों में वह इकलौती थीं, जो अधीनस्थ न्याय जगत से सर्वोच्च न्यायालय में पदस्थ हुईं। उन्होंने यह भी कहा कि लोग विचाराधीन प्रकरणों की भारी संख्या पर चिंता व्यक्त करते हैं, पर मामलों की यह भारी संख्या सकारात्मक प्रयासों से ही समाप्त हो सकती है।

न्याय व्यवस्था से जुड़ा प्रत्येक व्यक्ति न्यायमूर्ति आर भानुमति की चिंता से ग्रस्त है। वर्तमान में विभिन्न न्यायालयों में लगभग साढ़े तीन करोड़ मामले विचाराधीन हैं। सर्वोच्च न्यायालय में 58,700, उच्च न्यायालयों में लगभग 44 लाख और जिला अदालतों तथा अधीनस्थ न्यायालयों में लगभग तीन करोड़ मुकदमे लंबित हैं। इनमें अस्सी फीसदी से अधिक मामले जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में विचाराधीन हैं। मौजूदा रफ्तार से इन विचाराधीन प्रकरणों के पहाड़ को समाप्त होने में करीब 324 साल लग सकते हैं।

लगभग डेढ़ सौ ऐसे मामले हैं, जो 60 साल से विचाराधीन हैं। 66,000 मामले 30 साल से तथा 60,00,000 मामले पांच वर्ष से अधिक की अवधि के हैं। विचाराधीन मामलों में उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र सबसे आगे हैं। न्यायाधीशों की कमी, न्यायालयों में आधारभूत ढांचे की कमी तथा मामलों में एक पक्ष की विलंब में रुचि मामलों के लंबित होने के कारण हैं।

आधारभूत ढांचे की कमी कोविड-19 के दौरान बड़ी तेजी से सामने आई है। इसका एक कारण ऑल इंडिया ज्युडिशियल सर्विस का न होना भी है। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार तो कमोबेश इसके लिए तैयार है, पर न्यायपालिका का रुख उतना सकारात्मक नहीं है।

कुछ समय पूर्व ही दिल्ली उच्च न्यायालय की एक प्रारंभिक परियोजना रिपोर्ट पेश की गई, जिसमें कहा गया है कि न्यायालय में लंबित मुकदमों को एक वर्ष में निपटाने के लिए मौजूदा न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की जरूरत है। अधीनस्थ न्यायालयों में न्यायाधीशों की संख्या में भारी वृद्धि तथा आधारभूत ढांचे में तेजी से सुधार आज की जरूरत है।

सरकार सबसे बड़ी मुकदमेबाज है। अधिकांश मुकदमों में कथित अन्याय के मामलों में वह पक्षकार होती है। सरकार के विरुद्ध मुकदमे कम हों, यह हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। उपरोक्त परियोजना में कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं, जिनमें एक सुझाव जीरो पेंडेंसी प्रोजेक्ट में न्यायाधीशों की संख्या एवं समय सीमा निश्चित करने का सुझाव दिया गया है।

सुबूतों का अभाव, साक्ष्य में देरी, पक्षकारों एवं वकीलों की प्रक्रिया में विलंब, पक्षकारों का दूरस्थ स्थानों में रहना आदि लंबित मामलों के कारण हैं, जिनके निराकरण की व्यवस्था करनी होगी। बुनियादी ढांचे के विकास हेतु सरकार प्रयास कर रही है, पर उसकी गति धीमी है।

13,672 न्यायालयों को वाई-फाई कनेक्शन एवं कंप्यूटर दिए गए हैं। उच्च न्यायालयों व जिला जजों को 14,000 लैपटॉप दिए गए हैं। आईसीटी सुविधा 16,845 न्यायालयों में हैं तथा 3,240 जिला न्यायालयों तथा 1,280 जेलों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की व्यवस्था की गई है। पर अब भी अनेक न्यायालयों में मूल सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं।

यह स्थिति बदलनी चाहिए। संविधान में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान है। इस पर अमल कर भी मुकदमों के पहाड़ को पार करने में सहायता मिल सकती है। जरूरत इस बात की है कि सरकार, न्यायपालिका तथा वकीलों की संस्थाएं साथ बैठकर इस समस्या के निराकरण हेतु गंभीर प्रयास करें।

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