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उदार होने का समय
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सिनेगॉग
पिट्सबर्ग के एक सिनेगॉग (यहूदियों के प्रार्थनास्थल) में प्रार्थनारत ग्यारह यहूदियों को एक सिरफिरे ने गोलियों से उड़ा दिया। मुझे लगा कि वह सिरफिरा निश्चय ही मुस्लिम आतंकवादी होगा, जो फलस्तीनियों पर यहूदियों के हमले का बदला ले रहा होगा। बाद में पता चला कि रॉबर्ट बावर्स नाम का वह हत्यारा ईसाई था। मुस्लिम यहूदियों से नफरत करते हैं और यहूदी मुसलमानों से घृणा करते हैं-हमें यही मालूम है। ज्यादातर लोग भूल गए हैं कि हिटलर के पदचिह्नों पर चलने वाले लोग अब भी कम नहीं हैं। नाजीवाद में यकीन करने वाले लोग अब भी पैदा होते हैं, ऐसे लोग अब भी यहूदियों के प्रति प्रचंड घृणा के साथ रात में सोने जाते हैं।
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यहूदियों के प्रति मुस्लिमों की नफरत तो खैर जग जाहिर है। फलस्तीनी बच्चों को यहूदियों से नफरत करना सिखाया जाता है। यहूदियों की जान लेने वाले मुस्लिमों को आतंकवादी नहीं, स्वतंत्रता सेनानी कहा जाता है। दूसरी ओर, यहूदी राष्ट्र इस्राइल धीरे-धीरे फलस्तीनियों की जमीन पर कब्जा कर रहा है। फलस्तीनियों के मकान, स्कूल, अस्पतालों को बुलडोजरों से ध्वस्त कर दिया जा रहा है। यहूदियों के हाथों फलस्तीनी चीटियों की तरह मारे जा रहे हैं। हिंसा की आग दोनों ने फैलाई है, दोनों में से कोई भी शांति नहीं चाहता। लेकिन मेरी निगाह में इस्राइल का दोष ज्यादा है। अमेरिकी मदद से वह आज सैन्य महाशक्ति बन गया है। फलस्तीन उसके सामने बेहद कमजोर नजर आता है। इस एकतरफा युद्ध को लंबे समय तक चलने नहीं दिया जा सकता।
लेकिन सभी मुस्लिम यहूदियों से घृणा करते हों, ऐसा भी नहीं है। यह जानकारी बहुतेरे लोगों के लिए चौंकाने वाली होगी कि अमेरिकी मुस्लिम संगठन सेलिब्रेट मर्सी ऐंड एम्पावरचेंज पीट्सबर्ग में मारे गए यहूदियों के परिवारों के लिए धन इकट्ठा कर रहा है। सेलिब्रेट मर्सी का उद्देश्य है पीड़ितों की मदद करना, चाहे पीड़ित यहूदी ही क्यों न हों। यह संगठन मुसलमानों को मानवाधिकार और औरतों को बराबर का अधिकार देने के लिए जागरूक कर रहा है। सेलिब्रेट मर्सी के निदेशक तारिक अल मजीदी कहते हैं, मुसलमानों का शिक्षित और आधुनिक होना समय की मांग है। मुस्लिम आतंकवाद के संदर्भ में उनकी बातें ध्यान देने लायक हैं। वह कहते हैं कि मुस्लिमों ने जेहाद के नाम पर दुनिया भर में जिस आतंकवाद को पैदा किया है, उससे कहीं शांति नहीं आई है, बल्कि इससे अशांति और असंतोष ही पनपा है। इस विरामहीन युद्ध में गैर मुस्लिमों की तुलना में मुस्लिम ज्यादा मारे गए हैं। मुसलमान जेहाद की बात चाहे जितना भी करें, लेकिन जरूरत पड़ने पर वे मुस्लिमों की मदद नहीं करते। सीरिया के शरणार्थियों को मुस्लिम देशों में उतनी शरण नहीं मिली है, जितनी कि ईसाइयों के देशों में मिली है।
सेलिब्रेट मर्सी जैसी उदारवादी सोच का परिचय आज दुनिया भर के मुस्लिमों को देने की आवश्यकता है। अपनी घृणा खत्म करेंगे, तो हमारे प्रति दूसरों की घृणा भी अपने आप खत्म हो जाएगी। अपनी तरफ से आतंकवाद खत्म करेंगे, तो हमें निशाना बनाता आतंकवाद भी खत्म हो जाएगा। पाकिस्तान में ईसाई और हिंदू लंबे समय से मुसलमानों के निशाने पर हैं। बेहतर हो कि वहां के मुसलमान अब इन समुदायों के प्रति संवेदना का परिचय दें। बांग्लादेश में छोटी से छोटी बात पर हिंदुओं और उनके मंदिरों को निशाना बनाया जाता है। यहां तक कि भारत समर्थक मानी जाने वाली शेख हसीना के दौर में भी वहां हिंदुओं के प्रति असहिष्णुता खत्म नहीं होती। बल्कि हाल के कुछ वर्षों में तो सांप्रदायिक ताकतों के मजबूत होने के कारण खुद शेख हसीना ने भी हिंदुओं के साथ हुई हिंसा पर चुप्पी का परिचय दिया। सेलिब्रेट मर्सी से प्रेरणा लेकर बांग्लादेश के समाज के भीतर ऐसी उदारवादी सोच क्यों नहीं पैदा होती, जिससे किसी हिंदू को अपना घर छोड़कर भारत न आना पड़े या मामूली बात पर हिंदू मंदिरों को निशाना न बनाया जाए। सऊदी अरब गैर मुस्लिमों के लिए मक्का-मदीना के दरवाजे खोलने पर विचार क्यों नहीं कर सकता? उसे अपने यहां हिंदुओं और ईसाइयों को उनके पूजा स्थल के निर्माण की अनुमति क्यों नहीं देनी चाहिए?
बम नहीं, गोलियां नहीं, चाकू नहीं, मुस्लिमों को अब मदद और सहयोगिता का हाथ बढ़ाने की आवश्यकता है। तभी दुनिया समझ पाएगी कि मुसलमान ‘अल्लाह हू अकबर’ कहकर लोगों पर हमले करना नहीं, बल्कि लोगों को बचाना भी जानते हैं। दरअसल भरोसा टूटने में उतना समय नहीं लगता, जितना भरोसा बहाल होने में लगता है। मुस्लिमों के प्रति, दुर्योग से, जिस तरह की छवि बन गई है, उसे तोड़ने में समय लगेगा। लेकिन इसके लिए पहल तो करनी पड़ेगी। मुस्लिमों की छवि सिर्फ दूसरों की मदद करने से नहीं बदलेगी। इसके लिए खुद को भी विवेकवान और जिम्मेदार नागरिक बनना पड़ेगा। इसके लिए सुशिक्षित होने की आवश्यकता है। यानी ऐसी शिक्षा, जो मुस्लिमों को उदार और अहिंसक होना सिखाए। तभी वे जेहाद के नाम पर मुस्लिम समुदाय के बड़े हिस्से को अशिक्षित, हिंसक और कट्टरवादी बनाए रखने के षड्यंत्र को समझ पाएंगे। तभी वे समझ पाएंगे कि जेहाद दुनिया में मुस्लिमों के वर्चस्व को भले न बढ़ाए, उन्हें घृणा का पात्र जरूर बना रहा है।
यह नहीं मान सकते कि सभी मुस्लिम कट्टरवादी होते हैं। सभी मुसलमान आईएस, तालिबान या अल कायदा के समर्थक नहीं हैं। ऐसे मुस्लिमों की संख्या बहुत होगी, जो अच्छा काम कर रहे हैं, जिन्होंने शिक्षा का महत्व समझा है और जो उदार हैं। लेकिन मुश्किल यह है कि कट्टर इस्लाम ने आज उदार इस्लाम की पहचान छीन ली है। मुसलमानों का जिक्र होते ही लोग डरने लगते हैं। मुस्लिम इतने अलोकप्रिय और इतने अवांछित हो चुके हैं कि इनका डर दिखाकर यूरोप के कई दक्षिणपंथी नेता अपनी राजनीति चला रहे हैं। अब भी समय है। अमेरिका में एक मुस्लिम संगठन उदारवादी सोच का परिचय दे सकता है, तो आम मुस्लिमों को भी अच्छाई और सच्चाई के रास्ते पर क्यों नहीं चलना चाहिए!