इस घोटाले पर भी ध्यान दें
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आखिर वक्फ है क्या? वक्फ का इतिहास लगभग 1,000 वर्ष पुराना है। वक्फ का अर्थ है, ऐसी धन-संपत्ति जिसको निर्धन मुसलमानों, विधवाओं, तलाकशुदा स्त्रियों, अनाथ बच्चों आदि के ऊपर खर्च किया जाए। वक्फ दो प्रकार का होता है, एक वक्फ अलल्लाह, अर्थात अल्लाह के लिए दी जाने वाली जमीन, संपत्ति।
दूसरा है- वक्फ-अलल-औलाद, अर्थात अपनी औलाद के लिए जमीन, संपत्ति आदि। वक्फ-अल-अल्लाह में बादशाहों, नवाबों, पूंजीपतियों आदि ने अपनी पिछड़ी हुई कौम के लिए जमीन-जायदाद छोड़ी है। वक्फ जायदाद में मदरसे एवं शिक्षा संस्थान, सार्वजनिक चिकित्सालय, अनाथालय, सराय, उद्यान, मस्जिदें, खानकाहें, इमामबाड़े आदि समय-समय पर दिए जाते रहे हैं।
भारत में पहला वक्फ कानून 1954 में बना और 1995 में उसमें संशोधन किया गया।
लेकिन व्यावहारिक जमीन पर कुछ नहीं बदला। भले ही हम कितने ही वक्फ कानून बना लें, लेकिन इससे कुछ नहीं होने वाला है, क्योंकि जिस प्रकार से वक्फ संपत्ति गुल हो रही है, उसकी गति बड़ी तीव्र है। जहां भी कुछ अच्छे वक्फ अधिकारी बोर्ड की संपत्ति को कानूनी चाराजोई द्वारा बचाना चाहते हैं, वहां उन्हें पता चलता है कि उनके वकील ही उनके प्रतिद्वंद्वियों से मिल गए, लिहाजा अब और कुछ नहीं हो सकता।
सच्चाई यह है कि वक्फ की संपत्ति के घालमेल में वकील, राजनेता, पुलिस एवं प्रशासन सभी मिल जाते हैं और अंदरखाने फाइलें गायब कर दी जाती हैं। ऐसा हालांकि औकाफ के वकीलों द्वारा करवाया जाता है, मगर न्यायालय में वकील वक्फ के विरुद्ध केस करवा देते हैं और अधिकारियों से कहते हैं कि फाइलों के नदारद होने के कारण वे कुछ नहीं कर सकते। इसी का नतीजा है कि आज हजारों स्कूल, मदरसे, मस्जिदें, दरगाहें वक्फ बोर्ड के घोटालों द्वारा निजी संपत्ति में बदल चुकी हैं।
यदि इतनी विशाल संपत्ति को ठीक ढंग से प्रयोग में लाया जाए, तो मुस्लिम समाज की तस्वीर बदल सकती है, उसके वारे-न्यारे हो सकते हैं। लगभग चार लाख करोड़ की संपत्ति का केवल किराया ही ढंग से जमा कर लिया जाए, तो मुस्लिम वर्ग के सभी बच्चों की इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट जैसे प्रोफेशनल पाठ्यक्रमों की पढ़ाई का खर्चा आराम से निकल सकता है और इसके अतिरिक्त सैकड़ों स्कूल एवं महाविद्यालय, विश्वविद्यालय आदि की स्थापना भी की जा सकती है।
बहुत-सा खर्च तो मात्र किराये से ही निकल सकता है। खेद है कि किराया या प्रापर्टी की कीमत तो छोड़िए, वक्फ की सारी जमीन को स्वयं वक्फ के कारिंदों ने ही कौड़ियों के मोल लुटा दिया है। इस प्रकार के घोटालों के हजारों उदाहरण हैं। दिल्ली को ही लें, जहां 77 प्रतिशत जमीन वक्फ बोर्ड की मिल्कियत है, लेकिन लगभग सभी पर कब्जे हो चुके हैं।
आज भारत में 28 वक्फ बोर्ड हैं, जिनकी दुर्दशा देखते ही बनती है। प्रत्येक वक्फ बोर्ड में कम से कम पांच सदस्य होना आवश्यक है। आज हो यह रहा है कि विभिन्न सरकारें ऐसे लोगों को वक्फ बोर्डों की अध्यक्षता एवं सदस्यता दे रही है, जिन्हें मंत्रालय में स्थान नहीं प्राप्त होता। यह सोचकर दंग रह जाना पड़ता है कि धड़ल्ले से वक्फ बोर्ड के भवनों का तिया-पांचा करने के बावजूद सरकार क्यों चुप्पी साधे है? अब समय आ गया है कि सामान्य मुसलमान स्वयं वक्फ संपत्ति की पड़ताल करे और इस घोटाले को यह समझ कर न छोड़ दे कि यह तो सहज मामला है और इसको देखने वाले या तो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड वाले हैं या धार्मिक बिरादरी।