फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   this is the day of racer

दौड़ने-भागने के यही तो दिन हैं

Sun, 20 Apr 2014 06:35 PM IST
श्याम विमल
श्याम विमल Updated Sun, 20 Apr 2014 06:35 PM IST
विज्ञापन
this is the day of racer

अपने लोकतंत्र का चुनावी महासंग्राम लगभग आधा निपट चुका है। ये नेताओं के दौड़ने-भागने-धूप में चलने के दिन हैं। भले ही हमारे जनप्रतिनिधि साढ़े चार साल तक इलाके में झांकने भी न आएं, पर चुनाव की मुनादी होते ही वे दौड़ पड़ते हैं।

विज्ञापन


नोटों और फूलमालाओं से लदे-फंदे जब वे इलाके में वोट मांगने पहुंचते हैं, तो छोटे बच्चे भी समझ जाते हैं कि चुनाव आ गए हैं। बीस-पच्चीस मिनट के पैदल दौरे में किसी नंग-धड़ंग बच्चे को गोद में उठा लेना, किसी लड़के के सिर पर हाथ फेर देना या बत्तीसी दिखाते हुए बुजुर्गों-महिलाओं के पास जाकर हाथ जोड़ लेना इनकी यूएसपी है। पांच साल में बमुश्किल दस-पंद्रह दिन ऐसा करना पड़ता है। क्या बुरा है?
विज्ञापन


कुछ नेता इस मौसमी कवायद में कुछ खास जुमलों का इस्तेमाल करते हैं। ज्यादातर छोटे-मोटे और राष्ट्रीय दलों का ऐसा ही एक मुफीद शब्दास्त्र है-सेक्यूलर। इसका इस्तेमाल करने वाले नेता अपने भाषण में यह बताना कतई नहीं भूलते कि वह सेक्यूलर हैं और देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को बनाए रखने के लिए उन्हीं की पार्टी को वोट देना चाहिए। हालांकि सिर्फ सेक्यूलर का असर नहीं होता। जिनके पास धनबल होता है, जिनकी छत्रछाया में बाहुबली पलते-पुसते हैं या जो धमनियों में खानदानी खून और रिश्ते का प्रेशर डालने का भाग्य लिखा लाए होते हैं, वे भी वरण योग्य जनप्रतिनिधि हो जाते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


कई नेताओं की इस मौसम में खासी फजीहत होती है। कुर्सी पद की चिंता में खीझे इन नेताओं की प्रेस कान्फ्रेंसों-रैलियों में जुबान कभी फिसल जाती है, तो कभी डर्टी हो जाती है। कभी हाई कमान के इशारे पर जुबान गंदी कर ली और मीडिया में फजीहत होने लगी, तो खेद या सॉरी जैसे रवायती हल्का शब्द बोलकर उधार चुकता किया समझो। वचने का दरिद्रता! राजनीति का यही दस्तूर है भैया। बदजुबानी का तीर कमान से निकलकर लक्ष्यभेद कर भी ले, तो क्या जाता है अपना? अगर दबाव पड़ा, तो कह देंगे मीडियाकर्मी की नासमझी से यह सब हुआ है। अगर चुनाव जीत गए, तो पांच साल की तमाम चिंताओं से मुक्ति ही समझो।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed