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ऐसे तो विकास नहीं होगा
त्रेपन सिंह चौहान और शंकर गोपाल कृष्णन
Updated Mon, 16 Jun 2014 01:46 AM IST
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नरेंद्र मोदी सरकार ने अपनी प्राथमिकताएं तय कर ली हैं। मंत्रिमंडल के सदस्य भी सक्रियता के साथ अपना कामकाज संभालने में जुट गए हैं। देश का शेयर बाजार कुछ दिनों से ठिठक-सा गया है। जबकि लोकसभा चुनाव के नतीजे आने से पहले ही शेयर बाजार को जैसे पंख लग चुके थे। इसकी वजह यह थी कि देश के अनेक बड़े पूंजीपति नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनाने के पक्षधर थे। अब जब केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार बन गई है, तब इन कंपनियों की उससे क्या उम्मीदें हैं? क्या इन कंपनियों की अपेक्षाएं सरकार पूरा कर पाएंगी?
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गौरतलब है कि इस समय कुछ बड़ी कंपनियां वित्तीय संकट में फंसती जा रही हैं। वे सरकारी बैंकों से लिए कर्ज वापस नहीं लौटा पा रहीं। इससे बैंकों के सामने बड़ा वित्तीय संकट खड़ा हो गया है। रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, सबसे बड़े कर्ज डिफॉल्टर विद्युत उत्पादन में लगे उद्योग हैं, क्योंकि समय पर कोयला खदान न मिलने और निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजनाओं सहित अन्य कई परियोजनाओं में तीखे जन प्रतिरोध के चलते ये उद्योग घराने मुसीबत में फंस चुके हैं। परियोजनाओं के संचालन में आगे मुश्किल न हो, इसके लिए सरकार को वन एवं पर्यावरण से संबंधित तमाम स्वीकृतियां आसानी से दे देनी चाहिए-इस प्रकार की मांगों के साथ ये कंपनियां सरकार पर लगातार दबाव बनाने की रणनीति अपनाए हुई हैं।
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एक अध्ययन के अनुसार, कंपनियों को वन एवं पर्यावरण स्वीकृतियां लेने में कभी कोई दिक्कत नहीं हुई। 96 से 99 प्रतिशत तक स्वीकृतियां सरकार अविलंब प्रदान कर देती हैं। मूल दिक्कत उस जमीन या वनभूमि पर आती है, जिस पर गांव बसे हैं या जिस पर गांव के लोगों की आजीविका निर्भर है। उस जमीन की मांग जब कंपनियां सरकार से करने लगती हैं, तब सरकार के सामने संकट खड़ा हो जाता है। डेढ़ सौ साल पहले अंग्रेजों ने वनों को कानून के दायरे में लाकर देश के वनवासी-आदिवासियों के जीवन में संकट के जो बीज बोए थे, वे आज तक बरकरार हैं। इसलिए तभी से लोग संघर्ष कर रहे हैं और मांग भी कर रहे हैं कि वनों पर उनके अधिकार को सरकार मान्यता दे। वर्ष 2003 से 2006 तक देश भर में वनों पर निर्भर समाज ने एक बड़ा जनांदोलन खड़ा किया था। उस आंदोलन के आगे केंद्र सरकार को झुकना पड़ा और 2006 में वनाधिकार कानून अस्तित्व में आया।
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इस कानून में प्रावधान है कि वनों पर निर्भर रहने वाले लोगों के अधिकार को सरकार को अपने रिकॉर्ड में दर्ज करना होगा और उनको उनके अधिकार का पट्टा देना होगा। इसके बाद अगर किसी परियोजना के लिए वनभूमि की जरूरत पड़ती है, तो संबंधित ग्रामसभा से अनुमति लेना अनिवार्य है। यह इसलिए भी जरूरी था, क्योंकि जब किसी परियोजना के लिए सरकार ग्राम समाज की जमीन या जंगल छीनती है, तो उसका नुकसान सिर्फ जमीन के मालिकों को ही नहीं होता, बल्कि समाज के बड़े हिस्से को भी उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जंगल पर निर्भर लोगों की आबादी 17 करोड़ से भी ज्यादा है। ओडिशा में पॉस्को परियोजना इसका ठोस उदाहरण है। यह भारत का सबसे बड़ा विदेशी निवेश भी है। इस परियोजना के कारण क्षेत्र के 4,000 परिवारों को विस्थापन की मार झेलनी पड़ेगी और करीब 50,000 लोगों की आजीविका संकट में पड़ जाएगी।
यूपीए सरकार ने वनाधिकार कानून तो बना दिया, पर इसका उल्लंघन राज्य सरकारों के साथ केंद्र सरकार ने भी लगातार किया। इन सरकारों ने कानून की अनदेखी कर वनभूमि कई बड़ी परियोजनाओं को आवंटित कर दी। जनवरी, 2008 से अप्रैल, 2013 तक करीब डेढ़ लाख हेक्टेयर भूमि कई परियोजनाओं को दे दी गई। इनमें कम से कम चालीस हजार हेक्टेयर भूमि गैरकानूनी है। दूसरी ओर, इस दौरान अधिकांश जगहों पर सरकारों ने आदिवासियों या वनवासियों को न कोई अधिकार दिए, न उनका अधिकार दर्ज किया, न परियोजनाओं से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की व्यवस्था की, न ही ग्राम सभाओं से अनुमति लेने की कोई जरूरत समझी। इस घोर अपराध में शामिल अधिकारियों और कंपनियों को सजा देने के बजाय लूट का तंत्र अबाध गति से आज तक चल रहा है।
केंद्र एवं राज्य सरकारों के इस जन विरोधी और गैरकानूनी काम के खिलाफ देश भर में कई जगहों पर बड़े जनांदोलन भी हुए। उतराखंड के फलेंडा और ओडिशा में पॉस्को के खिलाफ चल रहे आंदोलन को इस संदर्भ में देखा जा सकता है। विगत नौ वर्षों से कंपनी के पास ओडिशा एवं केंद्र सरकार की गैरकानूनी अनुमति होने के बावजूद पॉस्को को आज तक किसी जगह कोई जमीन नहीं मिल पाई है। सोसाइटी फॉर प्रमोशन ऑफ वेस्टलैंड डेवलेपमेंट के अध्ययन के अनुसार, अपने जंगल और अपनी जमीन बचाने के लिए देश भर के लगभग एक तिहाई जिलों में लोग आंदोलन चला रहे हैं। कुछ आंदोलन बड़े हैं, तो कुछ मध्यम अथवा छोटे आकार के। इन आंदोलनों के चलते एस्सार, हिंडाल्को, टाटा, रिलायंस जैसी बड़ी कंपनियों की बड़ी परियोजनाएं अधर में लटकी हुई हैं।
चूंकि केंद्र में एनडीए की पूर्ण बहुमत वाली सरकार है, ऐसे में, कॉरपोरेट क्षेत्र निश्चित रूप से अति सक्रिय होगा। सरकार से उसकी अपेक्षा होगी कि वह लोगों के आंदोलन को नजरंदाज कर संसाधनों से भरी ग्राम समाज और वनभूमि की जमीन उन्हें देने की हरसंभव कोशिश करे। लेकिन सवाल यह है कि क्या इसी तरह इस देश का विकास होगा। क्या आम जनता और वनवासी-आदिवासियों के संघर्ष की अनदेखी कर दी जाएगी? कहना अतिशयोक्ति नहीं कि ऐसे में भ्रष्टाचार और दमन की आशंका ही बढ़ेगी।