फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   This is not that Bangladesh

यह वह बांग्लादेश नहीं

Thu, 07 Jan 2016 06:29 PM IST
तस्लीमा नसरीन
तस्लीमा नसरीन Updated Thu, 07 Jan 2016 06:29 PM IST
विज्ञापन
This is not that Bangladesh

अचानक बांग्लादेश की याद दो कारणों से आई। एक तो चौवालीस साल पहले 16 दिसंबर, 1971 को मुक्तियुद्ध में पाकिस्तान की हार हुई थी और बांग्लादेश नाम का एक नया देश दुनिया के मानचित्र पर उभरा था। बांग्लादेश की याद आने का दूसरा कारण जमात-ए-इस्लामी के मुखिया और हत्यारे मोतिउर रहमान निजामी की फांसी की सजा पर सर्वोच्च न्यायालय की मंजूरी है। पाकिस्तानपरस्त निजामी ने मुक्तियुद्ध के समय असंख्य हिंदुओं और हिंदू समर्थक मुस्लिमों को मौत के घाट उतारा था। निजामी जैसे अनेक लोग थे, जो पाकिस्तान के एजेंट के तौर पर तब काम कर रहे थे। उस समय आज के बांग्लादेश में ऐसा अत्याचार और इस कदर निर्ममता देखी गई थी कि उसकी याद आज भी दिल दहला देती है। विडंबना देखिए कि निजामी को फांसी देने का फैसला कर लेने के बावजूद आज का बांग्लादेश ऐसे निजामियों से मुक्त नहीं हो पाया है।

विज्ञापन


पाकिस्तान के खिलाफ नौ महीने तक युद्ध करने के बाद बांग्लादेश दिसंबर, 1971 में विजयी हुआ था। उस जीत के करीब साढ़े चार दशक बीत चुके हैं। लेकिन आज भी लगता है कि वह कल की घटना है। उस युद्ध में एक तरफ खून की नदियां बह रही थीं, उदारमना लोगों को पाकिस्तान के सैनिकों द्वारा चुन-चुनकर मौत के घाट उतारा जा रहा था, दूसरी तरफ ऐसे लोगों की बड़ी आबादी थी, जो इसे मुक्तियुद्ध मानते थे; सैन्य तानाशाही और नस्ल तथा भाषा के वर्चस्व से मुक्ति का युद्ध।
विज्ञापन


ज्यादातर भारतीयों का दावा है कि इकहत्तर का वह युद्ध भारत और पाकिस्तान के बीच का युद्ध था, जिसमें भारत विजयी हुआ। बंगाली गोरिल्लों ने उस लड़ाई में हिस्सेदारी अवश्य की थी, लेकिन उसके जरिये युद्ध में विजयी होना संभव नहीं था। इकहत्तर में बांग्लादेश नाम के एक नए मुल्क ने जन्म लिया, और पैदा लेते ही उसने स्वाधीनता, धर्मनिरपेक्षता, गणतंत्र आदि शब्दों का उच्चारण करना सीख लिया। पर विडंबना यह है कि इन शब्दों के ठीक-ठीक अर्थ वह आज भी नहीं जानता। जिस दिन वह इन शब्दों के अर्थ समझेगा, इन पर विचार करेगा, उस दिन मुक्तियुद्ध की याद करते हुए वह मसखरा जैसा नहीं दिखेगा। मैं विजय दिवस का पालन नहीं करती, क्योंकि पाकिस्तान और बांग्लादेश में आज मुझे कोई फर्क नहीं दिखता। पाकिस्तान में भी उदार विचारकों का दमन होता है, बांग्लादेश में भी। मेरे विचार से बांग्लादेश विजय दिवस पालन करने की योग्यता उसी दिन हासिल करेगा, जिस दिन वह देश के उदार चिंतकों की हत्याओं को रोक पाएगा और निर्वासित तमाम उदार व्यक्तित्वों को देश में लौटा ला पाएगा। उससे पहले विजय दिवस पर धूमधाम दिखावे के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
विज्ञापन
विज्ञापन


धूमधाम से विजय दिवस मनाते बांग्लादेश से यह सवाल करने की इच्छा होती है कि मुझे वहां रहने का अधिकार क्यों नहीं है। पिछले इक्कीस वर्षों से मैं निर्वासित जीवन बिता रही हूं। बांग्लादेश का दरवाजा आज भी मेरे लिए बंद है। मेरा अपराध क्या था? क्या मैंने किसी की हत्या की थी? मैं एक डॉक्टर और लेखिका थी। अपनी इन दोनों भूमिकाओं में मैंने देशवासियों की सेवा ही की। देश और समाज की भलाई के लिए मैंने मेहनत की थी, मनुष्य की मानवीयता बची रहे, इसलिए मैं लगातार लिखती रही।

पृथ्वी का मानचित्र मूलतः राजनेताओं ने तैयार किया है। अगर हम लेखकों को इसका दायित्व मिला होता, तो दुनिया का नक्शा निश्चय ही अलग होता। तब धर्म के आधार पर मानचित्र नहीं बदले जाते। धर्म के कारण देश के विभाजित होने जैसा दुखद और कुछ हो ही नहीं सकता। पृथ्वी क्रमशः अब छोटी होने लगी है न? आज का मनुष्य अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में बात करना सीख चुका है, अंतरराष्ट्रीय पोशाक पहनना सीख चुका है, दुनिया भर का खान-पान अपना चुका है। ऐसे में भाषा और संस्कृति के आधार पर खुद को अलग-थलग करने का कोई कारण नहीं है। राजनेताओं ने अपने स्वार्थ से दुनिया को जिस तरह अलग-अलग हिस्सों में बांटा, उनकी सीमाएं तय कीं, उन्हें मिटा देने का समय आ गया है। यह बाड़ेबंदी हटा देने का, दीवारें ध्वस्त कर देने का समय है। देशों को अलग करने के बजाय उन्हें एक कर देने का समय है।

इकहत्तर के उस युद्ध में मुसलमान मुसलमानों के खिलाफ लड़ रहे थे। वह लड़ाई शिया-सुन्नी के बीच नहीं थी। सुन्नी-अहमदिया या कादियान के खिलाफ भी वह युद्ध नहीं था। वह लड़ाई सुन्नी-सुन्नी के बीच थी। जिस भाषा और संस्कृति को बचाने के लिए इकहत्तर के बहादुर बंगालियों ने सुन्नी होते हुए सुन्नियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, मैं उसी भाषा की लेखिका हूं। उसी सेक्यूलर संस्कृति के पक्ष में मैंने कलम पकड़ी थी। पर आज मेरा जीवन विपन्न है। औरतों के हक में और कट्टरवाद के विरुद्ध तनकर खड़ी होने वाली एक महिला को गर्दन पकड़कर देश से बाहर कर देने वाली और कट्टरवादी ताकतों को गले लगाने वाली व्यवस्था कितनी निर्बोध, कितनी तानाशाह, मानवाधिकार और गणतंत्र की कितनी विरोधी है, इसकी कल्पना की जा सकती है। बांग्लादेश की सत्ता व्यवस्था में तनिक भी बदलाव नहीं आया है, इसी का नतीजा है कि मुक्तियुद्ध की उस चेतना के समर्थक लोग एक के बाद एक वहां से बाहर निकलने के लिए विवश हुए हैं।


देश का मतलब मेरे लिए एक ऐसी भूमि है, जो आपकी अपनी हो, जहां आपको सुरक्षा मिले। बांग्लादेश देश की मेरी इस परिभाषा में फिट नहीं बैठता। जहां की मिट्टी में लेखकों, शिल्पियों, बुद्धिजीवियों को अपनी बात कहने की स्वाधीनता नहीं है, उसे भला मैं देश कैसे कहूं? स्वाधीन, सार्वभौम राष्ट्र बनना आसान है, देश बनना कठिन। ठीक वैसे ही, जैसे मनुष्य की तरह दिखना आसान है, सच में मनुष्य बनना बेहद मुश्किल।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed