क्या ऐसे कायम होगा सहकारी संघवाद
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केंद्र सरकार जिस तरह दिल्ली सरकार के अधिकारों पर हमला कर रही है, वह शर्मनाक है। पिछले कुछ हफ्तों से दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर नजीब जंग मुख्यमंत्री तथा मंत्रिमंडल को बरतरफ कर मनमाना फैसला ले रहे हैं। वह मोदी सरकार के इशारे पर ही ऐसा कर रहे हैं। दिल्ली के मुख्य सचिव के दस दिन की छुट्टी पर जाने पर लेफ्टिनेंट गवर्नर ने मुख्यमंत्री को दरकिनार कर कार्यवाहक मुख्य सचिव की नियुक्ति कर दी। उसके बाद से ही नजीब जंग दिल्ली में वरिष्ठ अधिकारियों की तैनातियों के सारे फैसले ले रहे हैं और ऐसी तैनातियों पर मुख्यमंत्री तथा दिल्ली के मंत्रिमंडल के फैसलों को खारिज कर रहे हैं। इसकी ताजा मिसाल है, मुख्यमंत्री से परामर्श किए बिना भ्रष्टाचार-रोधी ब्यूरो के प्रमुख की नियुक्ति।
दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा हासिल नहीं है। लेकिन संविधान के अनुच्छेद 239 एए के तहत केंद्र सरकार को सार्वजनिक व्यवस्था, पुलिस तथा भूमि के मामले में ही अधिकार हासिल हैं। दूसरे सभी विषय राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। संविधान के इसी अनुच्छेद में यह प्रावधान भी है कि मंत्रिपरिषद लेफ्टिनेंट गवर्नर को सहायता व परामर्श देगी। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली कानून भी इसी सांविधानिक निर्देश के अनुरूप है कि विधानसभा के अधिकार क्षेत्र में आने वाले विषयों में लेफ्टिनेंट गवर्नर को मुख्यमंत्री के परामर्श से काम करना होगा।
इसके बावजूद लेफ्टिनेंट गवर्नर के जरिये मोदी सरकार ने मुख्यमंत्री से यह तय करने का अधिकार ही छीन लिया है कि प्रशासन का मुख्य सचिव कौन होगा। इस अवैध कार्रवाई को सही ठहराने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 21 जनवरी को एक अधिसूचना जारी कर दी, जिसमें कहा गया था कि (अधिकारियों की) 'सेवाओं' का विषय केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। अनेक संविधान विशेषज्ञों के मुताबिक, इसका न तो कोई कानूनी आधार है और न ही सांविधानिक। जाने-माने संविधानविद केके वेणुगोपाल ने केंद्र सरकार की उक्त अधिसूचना को, 'असांविधानिक, अवैध तथा आधारहीन' करार दिया है।
केजरीवाल सरकार की नीतियों और राजनीतिक रुख के संबंध में हमारी राय कुछ भी क्यों न हो, हमारे संविधान के दायरे में एक निर्वाचित राज्य सरकार के अधिकारों को लेकर कोई दुविधा नहीं हो सकती। नरेंद्र मोदी 'सहकारी संघवाद' का दौर लाने की बातें करते हैं, पर दिल्ली के उदाहरण से साफ है कि यह एक क्रूर मजाक है। अब जबकि केंद्र सरकार तथा प्रशासन में सारी शक्तियां प्रधानमंत्री के ही हाथों में केंद्रित होती जा रही हैं, इस तानाशाहीपूर्ण केंद्रीयकरण की मार केंद्र-राज्य संबंधों पर भी पड़ रही है। जैसे, विशेष श्रेणी के राज्यों के लिए विशेष आवंटन की पहले की व्यवस्था को खत्म कर दिया गया है। पूर्वोत्तर के सभी राज्य अपनी विशेष श्रेणी का दर्जा खत्म किए जाने के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। इस पर चर्चा करने के लिए पूर्वोत्तर राज्यों के मुख्यमंत्री पिछले कई हफ्तों से प्रधानमंत्री से समय मांग रहे हैं, पर अभी तक उन्हें समय नहीं मिला है।
दिल्ली का यह ताजा प्रकरण राज्यों के प्रति केंद्र सरकार के तानाशाही रुख को रेखांकित करता है। दिल्ली में राज्य के अधिकारों और संघीय सिद्धांत पर हो रहे हमले का कड़ाई से विरोध किया जाना चाहिए। सांविधानिक सिद्धांत का उल्लंघन करने के लिए लेफ्टिनेंट गवर्नर को हटाया जाना चाहिए। केंद्र सरकार को संघीय तथा सांविधानिक व्यवस्था पर हमले की इजाजत कतई नहीं दी जा सकती।
-लेखक माकपा के वरिष्ठ नेता व पोलित ब्यूरो सदस्य हैं