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उन्हें भी सम्मान चाहिए

Thu, 15 Jun 2017 05:33 PM IST
सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली Updated Thu, 15 Jun 2017 05:33 PM IST
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They should also respect
सुभाषिनी सहगल अली

इसी महीने की दस तारीख को व्हील चेयर पर चलने वाली अंतरराष्ट्रीय विकलांग खेल में पदक जीत चुकीं सुवर्ण राज को नागपुर से निजामुद्दीन तक का रेल का सफर डिब्बे की फर्श पर लेटकर करना पड़ा। आरक्षण में उनको ऊपर की सीट मिली थी। यह सबको दिख रहा था कि वह ऊपर की सीट तक पहुंचने में असमर्थ हैं। पर न टीटी ने उनकी सुनी और न ही किसी अन्य सहयात्री ने अपनी नीचे की सीट उन्हें दी। फर्श पर बिछाने के लिए उन्हें कंबल भी मुहैया नहीं कराया गया।   

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क्या यह एक अपवाद मात्र है? ऐसा होता तो अच्छा होता, लेकिन ऐसा है नहीं। सुवर्ण राज केवल विकलांग नहीं, बल्कि वह एक महिला खिलाड़ी भी हैं। विकलांगों के साथ हमारी सरकार और हमारा समाज, दोनों ही बहुत ही संवेदनहीनता का परिचय देते हैं। 
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तीन दिसंबर, 2015 को अंतरराष्ट्रीय दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चिर-परिचित अंदाज में घोषणा कर दी कि अब भारत के विकलांगों की किस्मत बदलने वाली है। उन्होंने नया शब्द पेश किया और कहा कि अब उन्हें विकलांग नहीं ‘दिव्यांग’ कहा जाएगा अर्थात उनकी शारीरिक समस्या को उन्हें ईश्वर द्वारा दिया गया तोहफा समझा जाएगा। उसी समय, विकलांगों के बीच काम करने वाले कई संगठनों ने उन्हें पत्र भेज कर अनुरोध किया कि नाम बदलने से काम चलने वाला नहीं है, उन्हें उन तमाम अवरोधों को विकलांगों के जीवन से हटाने की कोशिश करनी चाहिए, जो उन्हें देश की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन में पूरी तरह से भागीदारी से रोकते हैं। 
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भारत में स्थिति क्या है? तमाम विकलांगों में साक्षरता का दर 45 फीसदी है। हमारे देश में न तो उनके लिए विशेष तरह के स्कूल हैं और न ही सामान्य स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में विशेष सुविधाएं। बड़ी और महंगी सुविधाओं की बात न भी करें तो, व्हीलचेयर में चलने वालों के लिए न तो रैम्प हैं और न ही बस और ट्रेन से चलने के लिए किसी तरह का इंतजाम। फिर भी विकलांग बच्चे पढ़ने के लिए संघर्ष करते हैं। अवरोधों के पहाड़ लांघने के लिए रोज कमर कसकर घर से निकलते हैं, लड़ते लड़ते शाम तक पस्त होकर घर लौटते हैं। 

हमारी सरकार इस पहाड़ को लांघने के लिए इनकी जो पहली आवश्यकता है – विकलांग होने का सर्टिफिकेट – उसे उपलब्ध करने में भी अमानवीय कंजूसी करती है। अनुमान तो यह है कि तमाम विकलांगों के 51 फीसदी ऐसे हैं, जिन्हें यह सर्टिफिकेट अभी तक नहीं मिला है। सरकार ने 2016 में घोषणा की थी कि वह हर विकलांग को एक विशेष पहचान पत्र प्रेषित करेगी और इसको पाने वाले के लिए सरकार विशेष बजट के अंतर्गत कई तरह की मदद करेगी। बजट सामने आया तो इसमें इसकी कहीं चर्चा नहीं थी। अब जीएसटी लगने वाला है और विकलांगों के इस्तेमाल का तमाम सामान जिस पर किसी प्रकार का टैक्स नहीं लगता था, उस पर पांच फीसदी से अठारह फीसदी तक टैक्स लगेगा। 

पिछले दो-तीन वर्षों में, महिला खिलाड़ियों ने हिम्मत जुटाकर अपने साथ होने वाले उत्पीड़न की तमाम घटनाओं को सार्वजनिक किया है। शिलांग से आई नेहा कुमार, जो बॉक्सर है, को प्रशिक्षण जिम के अंदर ही बलात्कार के प्रयास को झेलना पड़ा था। वह बॉक्सर थी, तो उनका मुकाबला कर सकी। 2014 के एशियन गेम्स के दौरान, दो कोच, मनोज राणा और चंदन पाठक को एक महिला जिमनास्ट के साथ बदसलूकी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, लेकिन खेल के ख़त्म होते ही, उन्हें छोड़ दिया गया और अब दोनों अपने पदों पर तैनात हैं। केरल में नांव चलाने वाली तीन लड़कियों ने उत्पीड़न के चलते आत्महत्या कर ली थी। 


इसीलिए जब रेल मंत्री ने सुवर्ण राज से कहा कि वह उसकी शिकायत की जांच करेंगे, तो उसने जवाब दिया कि उसे जांच नहीं चाहिए।उसे विकलांगों की समस्याओं का समाधान चाहिए। 

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