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वो बोलते नहीं, हमें सुनना होगा

Sun, 13 Jan 2013 12:23 AM IST
मेनका गांधी
मेनका गांधी Updated Sun, 13 Jan 2013 12:23 AM IST
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they do not talk we should listen

पिछले महीने रक्षा मंत्रालय से गुजरते वक्त मैंने फुटपाथ पर लोगों का एक झुंड देखा। मुझे एक बंदर की झलक दिखाई दी। मैं रुकी तो देखा कि तीन लोग दो लंगूरों को आपस में लड़ा रहे थे। मुझे देखते ही उनमें से दो भाग खड़े हुए। लंगूर एक पेड़ पर चढ़ गए। बचे हुए व्यक्ति की जेब तलाशी गई, तो उसके पहचान पत्र से पता चला कि बंदरों को भगाने के लिए रक्षा मंत्रालय ने उसे नियुक्त किया था जिसका नाम अफताब लंगूरवाला था।

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लंगूरों को लाना और दिल्ली के विभिन्न मंत्रालयों, स्कूलों, होटलों और मॉल्स में किराये पर देना, दिल्ली के रोहिणी में रहने वाले कुछ परिवारों का धंधा है। उनके पास 100 से ज्यादा लंगूर हैं। वे लंगूरों को कंधे पर बिठाकर खुलेआम मोटरसाइकिल पर घूमते हैं। मैंने पुलिस को बुलाया। रक्षा मंत्रालय की उस शाखा के सुरक्षा प्रमुख को बुलाया गया। उसे कानून की स्पष्ट जानकारी नहीं थी और वह लंगूरवाला की नियुक्ति को सही ठहराने का प्रयास कर रहा था।
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लंगूरवाला को गिरफ्तार करके वन्यजीव अधिनियम 1972 के तहत जेल भेज दिया गया। लंगूर मेरे पास हैं, जिन्हें जल्द जंगल में वापस भेज दिया जाएगा। शहर में अब मदारी शायद ही दिखें। उनमें से ज्यादातर सलाखों के पीछे हैं। इसके अलावा जब से पशु कानूनों को सख्ती से लागू किया गया है कि उन्होंने अपना पेशा बदल लिया है। लेकिन कई शहरों में अब भी लंगूरवाले दिख जाएंगे। वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अनुसार द्वितीय अनुसूची और आईपीसी की धारा 2, 8, 9, 11, 40, 41, 43, 48, 51, 61 और 62 के तहत इन्हें संरक्षित जीव के तहत रखा गया है।
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इन धाराओं के अनुसार लंगूरों को खरीदना, बेचना, स्वीकार करना, व्यापार करना या किराये पर लेना प्रतिबंधित है। इस कानून के उल्लंघन पर तीन साल की कैद या जुर्माना या फिर दोनों हो सकता है। लेकिन कई सरकारी दफ्तर ऐसे लोगों को काम पर रखकर और लंगूरों के इन कथित मालिकों को पहचान पत्र देकर खुलेआम कानून तोड़ रहे हैं। दरअसल, ये लोग शिकारी हैं जो जंगलों से इन लंगूरों को लाते हैं।

मुझे बताया गया कि राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान नागरिक एजेंसियों ने 38 लंगूरों को लगाया था। वे तंग आ चुके हैं और पूरा दिन दरवाजों से बंधे रहते हैं। उन्हें भूखा-प्यासा रखा जाता है। वे धूप, बारिश या ठंड हर मौसम में बैठे रहते हैं। इनमें से ज्यादातर लंगूर एक साल के भीतर मर चुके हैं। लंगूर केवल एक संरक्षित प्रजाति नहीं रहे हैं,बल्कि अब वे दुर्लभ की श्रेणी में आते जा रहे हैं।

आवास में कमी होने के कारण यह प्रजाति बहुत ज्यादा कष्ट झेल रही है। पेड़ों से उतरकर अब वे सड़कों पर आ गए हैं और कई बार भोजन की तलाश में लोगों के घरों में घुस जाते हैं। इसके अलावा सड़क पार करने के दौरान होने वाली दुर्घटना ने उन्हें ज्यादा असुरक्षित बना दिया है। वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो ने सभी सरकारी विभागों को 15 अक्टूबर को एक पत्र भेजकर कहा कि वे लंगूरों को काम पर नहीं ले सकते और अगर ऐसा कर रहे हैं तो तुरंत इसे बंद कर दें।

वन्यजीव अपराध ब्यूरो ने अब लंगूरवाला परिवारों पर छापा मारना शुरू कर दिया है। उनमें से ज्यादातर अपराधी के रूप में अभी गिरफ्तारी से बच रहे हैं और उनके जानवरों को जब्त कर लिया गया है। मैंने खुद 8 लंगूरवालों को पकड़ा है और न्यायालय ने उन्हें वन्यजीव संरक्षित अधिनियम 1972 के तहत जेल भेज दिया है। अब आपको कानून का पता हो गया है।


अगर किसी मंदिर, फैक्टरी, शैक्षिक संस्थान, मेला या किसी सरकारी भवन में लंगूर बंधा हुआ दिखे तो पुलिस और वन्य जीव अधिकारियों को बुलाएं और ऐसा करने वालों की गिरफ्तारी को सुनिश्चित करवाएं।  लंगूर, हनुमान जी का एक प्रतिनिधि है। अपने भगवान के साथ ऐसा व्यवहार करना कितना शर्मनाक है?

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