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वे भी समाज का हिस्सा हैं
प्रेरणा बख्शी, शोधरत सामाजिक भाषाविद्
Updated Mon, 05 Nov 2012 12:44 PM IST
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हाल ही के दिनों में पूर्व कानून मंत्री और अब विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की ओर से संचालित उनके ट्रस्ट में वित्तीय अनियमितताओं के पाए जाने के आरोप खूब चर्चा में रहे। इस मामले के विरोध में उतरे राष्ट्रीय विकलांग पार्टी के सदस्य तथा अरविंद केजरीवाल की अगुआई में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के कार्यकर्ता और समूचे देश से एकत्रित विकलांग लोगों ने अहम भूमिका निभाई।
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यह मुद्दा समाज में रह रहे उस वंचित और हाशिये पर जीने पर मजबूर कर दिए जाने वाले विकलांग वर्ग से संबंधित था, जिसे अधिकतर मुख्य मीडिया और राजनीतिक दल अपनी कार्य सूची के बाहर का समझते हैं। एक ऐसा वर्ग जिसका इतना भी मोल नहीं कि उसे कोई राजनीतिक दल अपने सामान्य 'वोट बैंक' के खेल तक का हिस्सा समझे। वह वोट बैंक जिसे अलग-अलग नेता अपने व्यक्तिगत और पार्टी लाभ के लिए कभी जाति, वर्ग, या धर्म के नाम पर लुभाते हैं। इसका एक मुख्य कारण है, समाज में मौजूद इन श्रेणियों की अहमियत और इनके साथ जुड़ी लोगों की अस्मिता जिसे राजनीतिक दल भी समझते हैं और महत्व देते हैं।
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ऐसे में यह अफसोसनाक है कि विकलांगता एक ऐसी श्रेणी है, जिसको अन्य सभी श्रेणियों से परे रखते हुए इतना सामान्य बना दिया गया है कि इसका किसी भी सामाजिक या राजनीतिक स्तर पर संवाद में न होना असाधारण नहीं लगता। यह स्थिति किसी भी समाज के लिए सबसे हानिकारक होती है। उदाहरण के लिए, विकलांगता से ग्रस्त व्यक्तियों को सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर किस हद तक अदृश्य बनाए जाने का प्रयास किया गया, उसका इस बात से ही पता चलता है कि आजादी के बाद से लेकर वर्ष 2001 तक जनगणना आयोग ने विकलांगता पर कोई भी आधिकारिक जनगणना करने या आंकड़ों को इकट्ठा करने का प्रयास तक नहीं किया।
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वर्ष 2001 में हुई जनगणना के अनुसार, भारत में 2.19 करोड़ लोग विकलांग थे, जो कि कुल जनसंख्या के 2.13 प्रतिशत हैं। हालांकि यह अनुमान वास्तविकता से काफी कम है। भारत ने विकलांगता से ग्रस्त लोगों के सशक्तिकरण और संपूर्ण सहभागिता के लिए विकलांगता अधिनियम, 1995 (समान अवसर, अधिकारों की सुरक्षा तथा पूर्ण भागीदारी) पारित किया था। इस कानून के अतिरिक्त भारत ने 30 मार्च, 2007 में विकलांगता से ग्रस्त व्यक्तियों के अधिकार से संबंधित संयुक्त राष्ट्र के समझौते पर सहमति जताते हुए हस्ताक्षर किया। इन सबके बावजूद अगर 1995 अधिनियम को और इसके परिपालन को देखा जाए, तो एक मुख्य निष्कर्ष यह निकलता है कि समाज और कानून दोनों आम तौर पर विकलांगता को विकृति से जोड़ते हैं और जिस प्रकार से इसका उल्लेख इस अधिनियम में हुआ है, उससे यह सिद्ध हो जाता है कि कानून विकलांगता से जुड़े मेडिकल मॉडल को प्रमुखता देता है।
विकलांगता के मुख्य रूप से दो मॉडल हैं, जिनके आधार पर नीतियों का गठन किया जाता है- मेडिकल और सामाजिक। संयुक्त राष्ट्र सामाजिक मॉडल का पक्ष लेता है। मेडिकल मॉडल के अंतर्गत व्यक्ति की विकलांगता को व्यक्तिगत रूप से देखा जाता है। इसमें इस बात पर जोर दिया जाता है कि अगर उपयुक्त उपचार, देखभाल और साधन मिलें, तो 'विकृति' को सुधारा जा सकता है। यानी विकलांगता से ग्रस्त व्यक्ति अपनी इस हालत के लिए स्वयं जिम्मेदार है। जबकि सामाजिक मॉडल विकलांगता को सीधे-सीधे सामाजिक और पर्यावरण बाधकों से जोड़ता है। इसके मुताबिक, विकलांगता जैसी समस्या के लिए केवल विकलांग व्यक्ति ही नहीं, बल्कि पूरा समाज जिम्मेदार होता है।
विकलांगता अधिनियम, 1995 में मेडिकल मॉडल अपनाए जाने की झलक इस बात से ही मिलती है कि इसमें विकलांगता की विकृति के आधार पर एक विस्तृत परिभाषा का उल्लेख किया गया है। इसके चलते जिन विकृतियों के नाम परिभाषा में नहीं लिए गए, उनको कानून में दिए गए अधिकारों से वंचित रखा गया है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इन वंचित लोगों में वे भी शामिल हैं, जो अपनी विकलांगता को 40 प्रतिशत से अधिक सिद्ध नहीं कर सकते। यह इस अवधारणा पर आधारित है, मानो हर विकलांगता के पैमाने को मात्रा में निर्धारित किया जा सकता हो। जबकि वास्तविकता यह है कि यह न केवल संयुक्त राष्ट्र के समझौते के विरुद्ध है, बल्कि व्यावहारिक रूप से भी हकीकत से परे है। उदाहरण के रूप में मानसिक रोग एक ऐसी विकलांगता की अवस्था है, जिसको पूर्ण रूप से मात्रा में निर्धारित कर पाना कठिन है।
इसके अतिरिक्त, भारत में सैकड़ों ऐसे विकलांग व्यक्ति हैं, जिनके पास आधिकारिक तौर पर चिकित्सकीय प्रमाणपत्र तक नहीं हैं, ताकि वे अन्य गारंटी स्कीमों या सुविधाओं का लाभ उठा सकें। कहने के लिए तो विकलांगता अधिनियम, 1995 विकलांगता से ग्रस्त व्यक्तियों के सामाजिक और आर्थिक अधिकारों का वर्णन करता है, लेकिन उनके नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर चुप्पी साधता है, जबकि संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र उनके सामाजिक और आर्थिक अधिकारों के साथ-साथ नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर भी विशेष ध्यान देता है।
परिणामस्वरूप यह अपेक्षा की जाती है की भारत विकलांग व्यक्तियों के अधिकार संबंधी संयुक्त राष्ट्र के समझौते का हस्ताक्षरकर्ता सदस्य होने की भूमिका भविष्य में बेहतर तरीके से निभाएगा। ऐसे में भारत में विकलांगता के शिकार व्यक्तियों से भारी भेदभाव के चलते अरविंद केजरीवाल और राष्ट्रीय विकलांग पार्टी की पहल बेहद सराहनीय है, जिसके कारण मुख्यधारा के मीडिया और राजनीतिक स्तर पर एक ऐसे वर्ग की आवाज सुनने का मौका मिला, जिसके मुद्दों और शिकायतों को हमेशा नजरंदाज किया जाता रहा है।