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सुबह-सबेरे उनके डेरे

Mon, 08 Apr 2013 10:51 PM IST
अशोक गौतम
अशोक गौतम Updated Mon, 08 Apr 2013 10:51 PM IST
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they appear day and night

पत्नी की चिल्ल-पों से निजात पाने के लिए सुबह-सुबह वॉक पर निकला था कि सामने शहर में बचे-खुचे इकलौते पीपल के पेड़ के नीचे वह ताबड़-तोड़ व्यायाम करते दिखे, तो मुझे अपनी जवानी के दिन याद आ गए। आह, क्या दिन थे वे भी! जब देखो कसरत, बस कसरत, सदाबहार जवानी के लिए। यह बात दीगर है कि कसरत करने के बाद भी जवानी से पहले ही हमें बुढ़ापे ने आ घेरा, प्रेमिका की तरह!

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इस उम्र में भी उनमें यह जोश देख अनायास ही उनके पास रुकने को मन हो गया। अस्सी की उम्र में भी सेहत का इतना ख्याल! ध्यान से देखा, तो पीपल की ओट में ही एक सौ आठ भी खड़ी दिखी। एक सौ आठ यानी आपात स्थिति में स्वास्थ्य सेवा देने वाली गाड़ी। जितनी उनके व्यायाम ने जिज्ञासा जगाई, उससे कहीं ज्यादा छिपकर खड़ी एक सौ आठ ने। वे जब रुके, तो मैंने उनसे माफी मांगते पूछा, पूछने के लिए गुस्ताखी माफ! पर साहब इस उम्र में ये क्या हो रहा है?
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क्या बताऊं यार! सरकार चलाने की क्या-क्या नहीं करना पड़ता? सरकार में बने रहने के लिए बंदा दिमाग से फिट रहे या न, लेकिन बॉडी से तो एकदम फिट दिखना ही चाहिए! ऊपर से आठ फीसदी विकास दर हासिल करने का पंगा।
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पर पास में ये न दिखने वाली एक सौ आठ? समर्थन वालों की दुआ है यह, पता नहीं कब अस्पताल जाने की जरूरत पड़ जाए। वह फिर व्यायाम करने के लिए ढीली पड़ी निकर कसने लगे, तो मैंने डरते हुए पूछा, तो अगली पारी का क्या इरादा है?

वह मुझे घूरते हुए बोले, क्या बात है, पत्रकारों की सोहबत में तो नहीं हो आजकल? तुम तो यों पूछ रहे हो जैसे... देखो वोटर! न मैं सत्ता से बाहर हूं, न सत्ता के अंदर! मैं सत्ता के अंदर भी हूं और सत्ता के बाहर भी, लेकिन...
मतलब, कुंभ में जल, जल में कुंभ! न कुंभ में जल, न जल में कुंभ! वाह! राजनीति में अद्वैत! अद्वैत में राजनीति! क्या मनोदशा है आपकी। आप तो पार्टी से ऊपर उठे लग रहे हो प्रभु!


अच्छा एक बात बताओ? पूछो? मुझे पहली बार लगा कि मैं भी समझदार हूं। यार! अब तो बच्चों का मुंह देखना पड़ रहा है...

देखो बंधु! देश में लोकतंत्र-कम-मोहतंत्र है। इसलिए पार्टी का जूता जब बेटे के पांव में फिट आ जाए, तो उसे ही सर्वेसर्वा समझो। न मानने के बाद भी मान लो, बच्चा बड़ा हो गया है।

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