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ये स्वर्ण मुद्राएं वंचितों को दें

Mon, 07 Jan 2013 11:31 AM IST
Updated Mon, 07 Jan 2013 11:31 AM IST
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these gold coins give to poors

हमारे धर्मगुरुओं को लेकर कई ऐसे प्रसंग हैं, जो हमें सद्जीवन बिताने की प्रेरणा देते हैं। ऐसी कहानियां हमें त्यागमय जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं। इसी से जुड़ा एक प्रसंग संत रविदास का है। वह परम भक्त होने के साथ महान विरक्त प्रवृत्ति के तपस्वी महापुरुष थे। वह प्रतिदिन दो जोड़ी जूते बनाते। एक को बेचकर परिवार का पालन करते, जबकि दूसरा जोड़ा किसी गरीब तीर्थयात्री को भेंट कर देते। शेष समय वह ईश्वर की भक्ति में बिताते थे।

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एक दिन एक सेठ उनके पास आया। उसने कुछ स्वर्ण मुद्राएं उनके समक्ष रखते हुए कहा, भक्त राज, मेरी कोई संतान नहीं थी। एक दिन मैंने आपकी ख्याति सुनी, तो दर्शन को आया, चुपचाप मिन्नत की कि यदि आपकी कृपा-दृष्टि हो जाए, तो मेरे घर पुत्र हो जाए। आपके आशीर्वाद से मेरी पत्नी ने कल पुत्र को जन्म दिया है। मैं आपकी सेवा में यह तुच्छ भेंट लेकर आया हूं, स्वीकार करने की कृपा करें।
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संत रविदास ने विनम्रता से स्वर्ण मुद्राएं लौटाते हुए कहा, सेठ जी, मैं अपने जीवन यापन लायक धन अर्जित कर लेता हूं। इन मुद्राओं से आप किसी अपंग और गरीब व्यक्ति को भोजन या वस्त्र आदि उपलब्ध करा दें। जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करने से ही पुण्य की प्राप्ति होती है। मुझ जैसे कमाने में सक्षम व्यक्ति को धन देने से पुण्य कैसे मिलेगा? संत रविदास के त्यागमय जीवन के समक्ष सेठ नतमस्तक हो उठा।
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