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यहां 'मोदी बनाम राहुल' नहीं हैं चुनाव

रशीद किदवई Updated Sun, 16 Sep 2018 08:01 PM IST
रमन सिंह, वसुंधरा राजे और शिवराज
रमन सिंह, वसुंधरा राजे और शिवराज
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मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावी रणक्षेत्र इस संदर्भ में भाजपा के लिए मुश्किल भरे हैं कि सत्तारूढ़ पार्टी इस लड़ाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनाम कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी बनाने में विफल रही है। इन तीनों राज्यों में पूरी राजनीति इन मुख्यमंत्रियों के इर्द-गिर्द घूम रही है, जहां मतदाता उनके लिए या उनके खिलाफ मतदान करेंगे। भाजपा के रणनीतिकार निजी तौर पर स्वीकार करते हैं कि एक महीने के गहन चुनाव अभियान के भीतर इन चुनावों को मोदी बनाम राहुल बनाना आसान नहीं है।
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अब जबकि केंद्रीय चुनाव आयोग इन राज्यों में चुनाव की तारीखों और कार्यक्रमों की घोषणा करने के लिए तैयार हो रहा है, इन तीनों राज्यों की राजनीतिक स्थिति पर नजर डालने से पता चलता है कि जमीनी वास्तविकता शिवराज सिंह, वसुंधरा राजे और डॉ. रमन की पिछली चुनावी सफलताओं से अलग है। मध्य प्रदेश में लगता है कि चौहान अकेले चुनाव लड़ रहे हैं। प्रभात झा को छोड़कर कोई भी वरिष्ठ भाजपा अधिकारी या राज्य का कोई भी मंत्री उनकी जन आशीर्वाद यात्रा में उनके साथ नहीं है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) अधिनियम में हालिया संशोधनों पर नाराजगी के चलते चौहान की लोकप्रियता लगातार गिर रही है। प्रभावशाली सवर्ण जातियां पहले ही अनुसूचित जाति (एससी) एवं जनजाति (एसटी) के सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति में आरक्षण का विरोध कर रही हैं और वे नरेंद्र मोदी से बुरी तरह नाराज हैं। अनुसूचित जाति या जनजाति समुदाय के लोगों के खिलाफ अत्याचार के आरोपी व्यक्ति के लिए अग्रिम जमानत के प्रावधान में संशोधन के सरकार के फैसले खिलाफ सवर्णों की निराशा इस तथ्य से स्पष्ट है कि हाल ही में उन्होंने बंद का आयोजन किया था। मध्य प्रदेश में कुछ प्रदर्शनकारी 'हम हैं माई के लाल' लिखी टी-शर्ट पहने हुए थे। गौरतलब है कि जून,  2016 में चौहान ने आरक्षण नीति की किसी भी समीक्षा को खारिज करते हुए कहा था कि 'कोई माई का लाल आरक्षण खत्म नहीं कर सकता।' जातिगत कसौटी इतनी ज्यादा तीव्र हो गई है, कि वायदे या देरी के लिए बहाने की गुंजाइश नहीं है, क्योंकि केंद्र और राज्य, दोनों जगह भाजपा सत्ता में है। जातिगत विभाजन ने भाजपा प्रमुख अमित शाह को मध्य प्रदेश में अपने कार्यक्रम स्थगित करने के लिए बाध्य किया, जो 12 सितंबर से शुरू होने वाले थे।

शिवराज सिंह चौहान और रमन सिंह, दोनों विपक्षी कांग्रेस नेतृत्व के संकट से ताकत हासिल कर रहे हैं। लेकिन नवंबर, 2018 में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया, तीनों काफी काम कर रहे हैं। जहां दिग्विजय सिंह असंतुष्ट पार्टी नेताओं के साथ-साथ जातिगत नेताओं को अपने पाले में लाने में व्यस्त हैं, वहीं ज्योतिरादित्य सिंधिया एक अनुभवी प्रचारक का सबूत दे रहे हैं। मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ वृहत स्तर पर प्रबंधन देख रहे हैं, पर्दे के पीछे वह बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और स्थानीय गोंडवाना संगठन के साथ गठबंधन की लंबी वार्ताएं करने के साथ-साथ फंड एवं संसाधन जुटाने का काम कर रहे हैं।

इन तीनों को सुरेश पचौरी, कांतिलाल भूरिया और अरुण यादव (तीनों पूर्व राज्य कांग्रेस प्रमुख) के साथ नेता प्रतिपक्ष, अर्जुन सिंह के पुत्र और पांच बार से विधायक अजय सिंह जैसे नेताओं का सहयोग मिल रहा है। फिर चार राज्य स्तरीय कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं-मीणा समुदाय के प्रभावशाली पिछड़े नेता रामनिवास रावत, जनजातीय महाकौशल क्षेत्र के बाला बच्चन, इंदौर (मालवा क्षेत्र) के पिछड़े नेता जीतू पटवारी और सागर बुंदेलखंड क्षेत्र के अनुसूचित जाटव नेता सुरेंद्र चौधरी।
 
छत्तीसगढ़ में 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को कांग्रेस से दस सीटें ज्यादा मिली थीं, लेकिन वोट शेयर मुश्किल से 0.77 फीसदी ही कांग्रेस से ज्यादा था। हालांकि यह सच है कि 2013 में माओवादी हमले में राज्य कांग्रेस के सभी अग्रणी नेता मारे गए थे, और वहां कांग्रेस का कोई बड़ा नेता नहीं है, लेकिन राहुल गांधी भूपेश बघेल, टीएस सिंह देव, चरण दास महंत और ताम्रध्वज साहू का बेहतर इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं, जिनमें से सभी कम से कम आधा दर्जन विधायकों की जीत सुनिश्चित करने में सक्षम हैं। अतीत में अजीत जोगी का टिकट बंटवारे और संसाधनों के उपयोग में बड़ा हाथ रहता था। इस बार जोगी की बगावत ने कांग्रेस को कम महत्वपूर्ण लेकिन वास्तविक प्रयास से लड़ने का मौका दिया है, जहां आंतरिक कलह की आशंका बहुत कम है।
 
राजस्थान में सचिन पायलट के नेतृत्व में कांग्रेस राजनीतिक मशीन की तरह काम कर रही है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव अशोक गहलोत की सचिन पायलट की मोटरसाइकिल पर पीछे बैठकर सवारी करने की तस्वीर ने औसत पार्टी कार्यकर्ताओं को यह आत्मविश्वास दिया है कि राज्य स्तरीय शीर्ष नेतृत्व वसुंधरा को हराने के लिए एकजुट है। माना जाता है कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने सर्वसम्मति से 130 से ज्यादा पार्टी प्रत्याशियों की सूची तैयार कर ली है, जिसकी घोषणा चुनावी प्रक्रिया शुरू होने पर की जाएगी। कांग्रेस को उम्मीद है कि दिग्विजय, सिंधिया और कमलनाथ द्वारा अनुमोदित इस पहली सूची की 80-90 सीटों पर वह जीत हासिल करेगी। बाकी सौ सीटों में से 30 सीटें सहयोगी पार्टियों को दी जाएंगी, जबकि बाकी बची 70 सीटों पर प्रत्याशी चुनने की जिम्मेदारी राहुल गांधी पर छोड़ दी गई है।

इन तीनों राज्यों की 65 लोकसभा सीटों में से 61 सीटें अभी भाजपा के पास हैं। राज्य नेतृत्व के खराब प्रदर्शन के कारण अगर भाजपा की सीटों में कमी आती है, तो उसे मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में महत्वपूर्ण लोकसभा सीटों से वंचित रहना पड़ सकता है। इसी कारण प्रधानमंत्री मोदी इन राज्यों में भाजपा की सत्ता के लिए पूरा जोर लगाएंगे। देखने वाली बात यह है कि मोदी क्या इसमें सफल होंगे? 

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