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मनोविज्ञान: दूसरी दुनिया में खुलने वाली खिड़की...सिद्धांत और आधुनिक शोध भी नहीं तोड़ सके सपनों का तिलिस्म

Sun, 17 Dec 2023 07:58 AM IST
गुलाम अहमद जोसी मिलेनोवस्की, प्रोफेसर, ईस्ट लंदन यूनिवर्सिटी
जोसी मिलेनोवस्की, प्रोफेसर, ईस्ट लंदन यूनिवर्सिटी Published by: गुलाम अहमद Updated Sun, 17 Dec 2023 07:58 AM IST
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सार
सपने अचेतन के दरवाजे खोलने वाले जादुई दरवाजे हैं। सिग्मंड फ्रायड दमित इच्छाओं को, तो आधुनिक शोध मस्तिष्क में न्यूरॉन्स की गोलाबारी को इनकी वजह बताते हैं। लेकिन इनमें से कोई भी विचार अचूक नहीं दिखता, यही वजह है कि सपने अभी भी रहस्य बने हुए हैं।
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theories and modern research could not solve magic of dreams psychology
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

आखिर हम सपने क्यों देखते हैं? सदियों से मनोविज्ञानी इस सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यह अभी भी एक रहस्य बना हुआ है। पुराने समय में बहुत से लोग मानते थे कि सपने दूसरी दुनिया में खुलने वाली एक खिड़की हैं। उनका मानना था कि सपने जीवन का उद्देश्य खोजने में मदद करते हैं। कुछ लोग इन्हें देवताओं के संकेत या भविष्यवाणी के रूप में देखते थे। सपने भी कई तरह के होते हैं। कई लोग बिल्कुल सपने नहीं देखते, तो कुछ लोग एक ही सपना बार-बार देखते हैं। कहते हैं कि सपनों में समय की गति काफी तेज होती है। तभी तो सपनों में आप एक सेकंड में दिल्ली से तमिलनाडु पहुंच जाते हैं। लेकिन मजे की बात है कि सपने में इस गति का एहसास नहीं होता और सब कुछ सामान्य ही लगता है। मुमकिन है कि हम इस वक्त भी सपना ही देख रहे हों। यह 70-80 साल की जिंदगी एक सपना हो। जिसे हम मनुष्य का मरना समझते हैं, मुमकिन है कि वह उसकी नींद का टूटना हो, जो किसी और दुनिया में खुले। सपनों की अनसुलझी दुनिया वाकई अजूबी है।



क्या फ्रायड गलत थे
करीब सवा सौ साल पहले वियना के बुक स्टोर्स में सिग्मंड फ्रायड की क्लासिक किताब 'द इंटरप्रेटेशन ऑफ ड्रीम्स' आई, जिसमें तर्क दिया गया है कि सपने उन इच्छाओं से ज्यादा कुछ नहीं, जिन्हें हम जाग्रत जीवन में पूरा करना चाहते हैं। इनमें से कुछ इच्छाएं अपेक्षाकृत निर्दोष होती हैं, और इन मामलों में सपने हमारी इच्छा को वैसे ही चित्रित करते हैं जैसे वह हैं। हालांकि, कुछ दूसरी इच्छाएं, जो हमारे लिए इतनी अस्वीकार्य हैं (जैसे कि यौन या आक्रामक आवेग जिन्हें हम स्वीकार नहीं कर सकते) कि हमारे सपनों को उन्हें सेंसर करना पड़ता है। ऐसी अस्वीकार्य इच्छाएं आम तौर पर जागरूक जाग्रत मन द्वारा दबा दी जाती हैं लेकिन सपने में अपरिचित और अक्सर विचित्र तरीके से सामने आती हैं।


लेकिन फ्रायड ने तर्क दिया कि एक मनोविश्लेषक की मदद से, सपनों के पीछे छिपी इच्छाओं का पता लगाया जा सकता है। उन्होंने सपनों के अव्यक्त अर्थ, उनमें निहित विचित्र कल्पनाओं और गहरे व सहज उद्देश्यों व इच्छाओं को छिपाने वाली अनोखी कहानी को बताया। हालांकि आधुनिक न्यूरो वैज्ञानिक सपनों को एक अलग नजरिये से देखते हैं। 1960 और 70 के दशक में हुए अध्ययनों ने सपनों को छिपी इच्छाओं से नहीं बल्कि मस्तिष्क के सबसे आदिम हिस्से में न्यूरॉन्स की गोलाबारी और रसायनों के दोलन से जोड़ा। लेकिन हाल के वर्षों में सपनों के अध्ययन के क्षेत्र में जो विकास हुए हैं, उनसे संदेह होता है कि क्या फ्रायड ने जो कहा वह गलत था?

प्रयोगों से खुलासा
पिछले कुछ दशकों में सपनों के विज्ञान को समझने के लिए जो प्रयोग हुए हैं, उनसे जाहिर होता है कि फ्रायड का सिद्धांत बेशक अपूर्ण हो, लेकिन उसकी एक बात बिल्कुल सही है कि हम सपने में उन चीजों को देखते हैं, जिन्हें अनदेखा करने की हम पूरी कोशिश कर रहे होते हैं। इनमें एक दिलचस्प प्रयोग डैनियल वैगनर का है, जिन्होंने देखा कि जब हम किसी विचार को अनदेखा करने या उसे दबाने की कोशिश करते हैं, तो वह ज्यादा मजबूती से बाहर आता है। वह इसकी यह वजह बताते हैं कि जब हम किसी विचार को दबाने की कोशिश करते हैं, तो एक साथ, एक ही समय में दो मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाएं काम कर रही होती हैं। पहली वह जो लगातार विचार को दबाती है और दूसरी, निगरानी प्रक्रिया जो दबे हुए विचारों पर नजर रखती है। मनोविज्ञान में विचारों का दमन इसीलिए काफी जटिल माना जाता है। यह सही ढंग से तभी हो सकता है, जब दोनों प्रक्रियाएं सामंजस्यपूर्ण ढंग से एक साथ काम कर रही हों।

वैगनर का कहना था कि रैपिड- आई मूवमेंट (आरईएम) नींद के दौरान ये प्रक्रियाएं विफल हो सकती हैं। रैपिड आई मूवमेंट (आरईएम) नींद की वह अवस्था है, जिसमें ज्यादातर सपने आते हैं। इसका नाम इस बात पर आधारित है कि जब आप सपना देख रहे होते हैं तो आपकी आंखें आपकी पलकों के पीछे कैसे घूमती हैं। आरईएम नींद के दौरान, आपका मस्तिष्क वैसे ही काम कर रहा होता है, जैसा कि वह जागते वक्त करता है। जितने समय आप सोते हैं, उसका 25 फीसदी हिस्सा आरईएम नींद का होता है। आरईएम नींद के दौरान मस्तिष्क के वे हिस्से जो विचारों के दमन के लिए जरूरी होते हैं, निष्क्रिय हो जाते हैं। चूंकि ज्यादातर सपने आरईएम नींद के दौरान आते हैं, इसलिए वैगनर के अनुसार सपने में हमें कई दबे हुए विचार दिखते हैं। वैगनर ने इसे लेकर एक प्रयोग किया, जिसमें प्रतिभागियों को उस व्यक्ति की पहचान करने के लिए कहा गया, जिसे वे जानते थे और फिर उस रात बिस्तर पर जाने से पहले पांच मिनट तक जो भी मन में आए लिखने को कहा गया।

प्रतिभागियों के पहले समूह से खास तौर पर कहा गया कि वे अपने लेखन के पांच मिनट के दौरान उस व्यक्ति के बारे में न सोचें, जब कि दूसरे समूह को खास उसी व्यक्ति के बारे में सोचने के लिए कहा गया। एक तीसरा समूह भी था, जिसे जो चाहे सोचने की छूट दी गई थी। जब वे सुबह उठे, तो उन सभी द्वारा उस रात देखे गए सपनों को नोट किया गया। जिन प्रतिभागियों को किसी व्यक्ति के संबंध में विचारों को दबाने के लिए कहा गया था, उन्होंने बाकी दोनों समूहों के प्रतिभागियों की तुलना में उस व्यक्ति को सपने में ज्यादा देखा।

सामान्य जिंदगी में भी यह महसूस किया जा सकता है कि जो लोग विचारों को दबाते हैं, उन्हें उस विचार के बारे में अप्रिय स्वप्न ज्यादा आते हैं। ऐसे लोगों की नींद की गुणवत्ता भी कम होती है और तनाव, चिंता और अवसाद का स्तर कहीं ज्यादा होता है। विचारों को दबाना कई तरह की मानसिक बीमारियों को भी पैदा करता है। हमें यह बेहतर ढंग से समझने की जरूरत है कि जब हम विचारों को दबाते हैं, तो उनका क्या होता है। सपनों पर ध्यान देने से हमें अपनी जिंदगी में उन चीजों की पहचान करने में मदद मिल सकती है, जिन पर हम जरूरी ध्यान नहीं दे पा रहे हों। भले कोई पारंपरिक ढंग से अपना इलाज करा रहा हो, लेकिन उसके सपनों की खोज से व्यक्ति के भीतरी स्वास्थ्य की झलक मिलती है।

कोई सिद्धांत पूर्ण नहीं
फ्रायड के स्वप्न सिद्धांत के अभी भी ढेर सारे पहलू हैं, जिनका परीक्षण नहीं किया गया है। कालांतर में फ्रायड खुद ही स्वीकारते हैं कि उनके सिद्धांत के पास हर तरह के सपनों का जवाब नहीं है। उनक सिद्धांत के साथ दिक्कत यह है कि यह एक विश्लेषक का सिद्धांत है, जो वाकई में सपने देखने वाले से अलग है। लेकिन फिर भी, कम से कम एक मामले में फ्रायड के सिद्धांत पर कोई उंगली नहीं उठा सकता, जब वह कहते हैं कि सपने अचेतन तक पहुंचने के जादुई मार्ग हैं।

नींद के दौरान मस्तिष्क
रोजमर्रा का अनुभव बताता है कि जब हम चीजों को देखते हैं, तो हमारी आंखें और मस्तिष्क जानकारी को एकत्र करने और उसे अर्थ देने के लिए खास ढंग से व्यवहार करते हैं। लेकिन नींद में सपने देखने के दौरान आंखों की गति अपेक्षाकृत अज्ञात है। सोते समय आंखों की जो गति होती है, वह दरअसल उस सपने से जुड़ी होती है, जो हम देख रहे होते हैं। लेकिन क्या इसका कोई मनोवैज्ञानिक आधार है कि हमें नींद में सपनों में दिख रहे दृश्यों को देखने के लिए आंखों को हरकत में लाना होता है या इसके कुछ और मनोवैज्ञानिक अर्थ हैं? सपनों की दुनिया दरअसल एक रहस्य है और इस क्षेत्र में चल रहे शोध यह जानने के लिए भी प्रेरित करते हैं कि आखिर हम सोते ही क्यों हैं?

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