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ताकि जानकारी बोझ न बने
प्रो. यशपाल
Updated Wed, 04 Sep 2013 07:48 PM IST
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हम एक सवाल अपने से पूछ सकते हैं-असल ज्ञान कब मिलता है? इसका एक रोचक जवाब हो सकता है-असल ज्ञान तब मिलता है, जब विद्यार्थी और विद्या एकरूप हो जाए।
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मेरे हाथ में हाल ही में एक किताब आई है। आईआईएम,कोझीकोड के निदेशक देबाशीष चटर्जी की लिखी हुई- द क्लास ऐक्टः नोट्स फ्राम द डायरी ऑफ ए टीचर। इसके कुछ पन्ने पलटे, तो लगा जैसे अपनी ही कही बात को दोबारा देख रहा हूं। किताब में एक जगह इस पर चर्चा है कि नई खोज कैसे होती है।
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देबाशीष कहते हैं कि जब खिलाड़ी और खेल एक हो जाते हैं, तब कुछ नया घटने की गुंजाइश बनती है। महात्मा गांधी भी कुछ इसी विचारधारा के थे। अहिंसा के जरिये भारतवासियों को आजादी दिलाना सामाजिक तौर पर विश्व का सबसे नवाचारी विचार है।
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यह संभव इसलिए हुआ, क्योंकि गांधी अपने विचारों को खुद जीते थे और उनको आधार बनाकर लगातार उस पर काम करते थे। नवाचार सिर्फ विचार से ही नहीं होता, उस विचार की धुन होना भी जरूरी है। उस विचार को जीना, उसमें जीना जरूरी है।
एक कमरे की चार दीवारों और कक्षा में फर्क सिर्फ छात्रों के होने से होता है। छात्र हैं, तो कक्षा है, नहीं हैं, तो सिर्फ दीवारें होती हैं। अगर उस कक्षा में छात्रों को सोचने-पूछने और तलाशने की आजादी है, तो ही वह कमरा क्लास है।
अगर कोई शिक्षक छात्रों पर रौब दिखाकर कुछ साबित करने की फेर में है, तो वह छात्रों को कैद कर रहा है। वहां के छात्र खुद के बारे में सोचना बंद कर देंगे। फिर शिक्षा कैसे होगी, सीखना कहां होगा? रटना हो सकता है, जानकारी का जमावड़ा जरूर हो सकता है। पहले बस्ते का बोझ हुआ करता था, अब जानकारी का बोझ हो रहा है।
एक व्यापक संवाद की जरूरत है, जिसमें केवल विद्यार्थी ही न हों, बल्कि शिक्षक भी शामिल हों। मुझसे लोग कहते हैं कि स्कूल-कॉलेज तो लाभ कमाने वाली दुकानें बन गए हैं। लोग सवाल उठाते हैं कि आज के स्कूल-कॉलेजों में इस तरह के खुले संवाद की गुंजाइश नहीं बची। मैं कहता हूं, वही तो जगह है, उन्हें ही तो बदलने की जरूरत है।
अपने परिवेश, आसपास से जुड़कर खोज करने की गुंजाइश खत्म करते गए हैं हम। इसे बदले बिना बात नहीं बनेगी। मेरी पोती है ज्योति। मुझे याद है, वह जब छोटी थी, तब मेरे साथ घूमने जाती थी, तो आसपास की झाड़ियों-पौधों के पत्तों को तोड़कर मसलती थी, उन्हें सूंघती थी और बताती थी कौन सा पेड़-पौधा है। कभी खुशी से कहती थी, अरे, यह तो मेहंदी निकल गई। अब वह बड़ी हो गई और इस तरह की सारी पहचानें खो गई उससे-बड़े कॉलेज की पढ़ाई ने खत्म कर दिया इसे।
आजकल स्कूल-कॉलेजों में प्रोजेक्ट पर बहुत जोर होता है, सीखने पर कम। जुगाड़ कर जानकारी एक जगह जुटा दो। मैं आपसे एक कहानी साझा करना चाहता हूं। कहानी भारत में अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत की है और इसे कहानी इसलिए कह रहा हूं कि इसमें कुछ दृश्य मैंने अपने से जोड़ दिए हैं, ताकि रोचकता बनी रहे। बिना औपचारिक प्रोजेक्ट रिपोर्ट के देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत की कहानी।
मेरे एक मित्र थे, मुझसे छह साल बड़े। विक्रम साराभाई नाम था उनका। वह कॉस्मिक किरणों पर काम कर रहे थे। एक दिन वह मेरे पास आए और बोले कि हमें अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू करना चाहिए। मैंने कहा कि तुम यह कैसे करोगे? विक्रम ने कहा कि हम टेलीविजन प्रसारण शुरू करेंगे।
वह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पास गए और कहा, हम अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू करना चाहते हैं। हमारा मुख्य लक्ष्य देश के सारे हिस्सों को एक दूसरे से जोड़ने का है। हम भारतीयों को एक दूसरे से जोड़ना चाहते हैं, ताकि हम उनसे बात कर सकें, उन्हें जान सकें और यह मालूम कर सकें कि देश की जरूरतें क्या हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि विक्रम, यह क्या पागलपन है? क्या पूरे देश में एक भी टेलीविजन है? साराभाई ने जवाब दिया कि नहीं है। इसीलिए हमारे पास एक नए तरह का टेलीविजन बनाने का अवसर है। इस पर इंदिरा जी ने उनसे कहा कि आप यह कैसे करेंगे? आपके पास कुछ भी नहीं है, न तो कोई अंतरिक्ष कार्यक्रम और न ही कोई संसाधन, तकनीक।
इस पर साराभाई ने उन्हें जवाब दिया कि मैं अपने मित्रों से बात करूंगा। आखिरकार साराभाई ने प्रधानमंत्री को राजी करने में सफलता पा ली। इस कार्यक्रम के लिए तकरीबन 20 करोड़ रुपये की मंजूरी मिली। फिर काम शुरू हुआ। वह पूरी दुनिया में अपनी तरह का इकलौता ऐसा अंतरिक्ष कार्यक्रम था, जिसे सैन्य उद्देश्यों और बमवर्षक रॉकेट संचालित करने के लिए विकसित नहीं किया गया था।
कई साल पहले मैंने प्रोफेसर चिटणिस से, जो उस दौर के महान साथियों में से एक थे, पूछा कि हमने इतनी सारी चीजें कीं, जिनके बारे में हमने पहले कभी सोचा भी नहीं था। जैसे, मछुआरों को यह बताना कि वे समुद्र में मछली पकड़ने कहां जाएं, ऐसे स्थान खोजना, जहां आप पानी पा सको, और ऐसी ही न जानें कितनी सारी चीजें। यह सब हम कैसे कर पाए?
इस पर उन्होंने कहा कि ये सारी चीजें संभव इसलिए हुईं कि हमने कभी औपचारिक तरीके नहीं अपनाए, प्रोजेक्ट रिपोर्टें तैयार करने के झंझट में हम नहीं पड़े। क्योंकि औपचारिक रिपोर्टें होतीं, तो रोज यह कहा जाता कि जो कहा गया था, वह हुआ या नहीं और अगर सफल भी होते, तो वही बात करनी थी, जो हमें पहले से पता होती।
आप अपनी आवश्यकता के अनुसार अपने उद्देश्यों में बदलाव नहीं ला सकते क्या? आपके अनुभव ऐसे बदलाव के लिए कभी मजबूर नहीं करते क्या? हमारे देश में इस खुले तरीके से काम करने की सोच शायद खत्म होती जा रही है।
मुझे तो लगता है कि वह मेरे सीखने का बेहद ही खूबसूरत दौर था।