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तो पकड़े जाते बोफोर्स के चोर

Sun, 31 May 2015 07:52 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 31 May 2015 07:52 PM IST
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then Boforce thief caught

अब जब राष्ट्रपति ने बोफोर्स का जिक्र कर ही दिया है, तब यह विश्लेषण जरूरी हो गया है कि इस मामले में क्या हुआ था 1987 में, जब स्वीडन के किसी रेडियो पत्रकार ने अपने कार्यक्रम में खबर दी थी कि बोफोर्स कंपनी ने भारत सरकार के आला अधिकारियों को रिश्वत देकर अपनी तोपें बेची थीं? इस खबर के आते ही दिल्ली की राजनीतिक गलियों में हंगामा शुरू हो गया था, क्योंकि राजीव गांधी ने अपनी छवि 'मिस्टर क्लीन' की बना रखी थी। अपनी छवि को पाक-साफ रखने के लिए ही उन्होंने रक्षा सौदों में दलालों की भूमिका समाप्त कर दी थी। तो कल्पना कीजिए, कितना बुरा लगा होगा भारतवासियों को, जब पता लगा कि भ्रष्टाचार की बू आनी शुरू हो गई थी बोफोर्स सौदे से, और यह बदबू प्रधानमंत्री निवास तक पहुंच चुकी थी।

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राजीव गांधी ने अपना बचाव करते हुए लोकसभा में बयान दिया था कि न मैंने और न मेरे परिवार के किसी सदस्य ने रिश्वत का पैसा लिया है, लेकिन जब बोफोर्स के अधिकारी दिल्ली पहुंच कर रिश्वतखोरों के नाम बताने को तैयार हुए, तो प्रधानमंत्री ने यह कहकर उन्हें रोक दिया था, कि ऐसा करना राष्ट्रहित में नहीं होगा। सच तो यह है कि राष्ट्रहित में था रिश्वतखोरों के चेहरे मालूम करना, क्योंकि उस समय अगर दोषियों को दंडित किया जाता, तो संभव है कि वे बड़े-बड़े घोटाले न होते, जो बाद में मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री काल में हुए।
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सवाल यह भी है कि अगर सचमुच कोई मामला नहीं था, तो ओट्टावियो क्वात्रोच्चि को भारत से क्यों भागने दिया सोनिया जी के चुने हुए प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने। 29 जुलाई, 1993 की रात भागे थे क्वात्रोच्चि साहब, क्योंकि उस दिन मेरी दोस्त चित्रा सुब्रमण्यम की खोजी पत्रकारिता की बदौलत मालूम पड़ा था कि रिश्वत का पैसा जिन स्विस खातों में पड़ा पाया गया था, वह क्वात्रोच्चि और उनकी पत्नी के नाम से था। सवाल यह है कि क्वात्रोच्चि दंपति को रिश्वत किस वास्ते दी गई थी।
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क्वात्रोच्चि साहिब इटली की एक सरकारी कंपनी में मुलाजिम थे, जो खाद बनाने का काम करती थी। खाद व्यापारी का क्या वास्ता हो सकता था रक्षा सौदे से? क्वात्रोच्चि दंपति की राजीव गांधी और उनकी पत्नी से दोस्ती थी। छुट्टियां इकट्ठा बिताया करते थे दोनों परिवार, और सोनिया जी के माता-पिता जब दिल्ली आते थे, तो ठहरते थे उन्हीं के घर पर। बाद में सोनिया गांधी ने कई बार कहा कि उनका क्वात्रोच्चि परिवार से कोई वास्ता नहीं था, लेकिन हम जो उन दिनों भी दिल्ली में पत्रकारिता करते थे, जानते थे कि उनकी दोस्ती गहरी है।


यह ठीक है कि किसी अदालत में दोषी न क्वात्रोच्चि पाए गए कभी और न ही राजीव या सोनिया गांधी। पर ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि भारत सरकार ने मुकदमा ही काफी कमजोर बनाया था। मुकदमा कमजोर बनाने में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार का भी हाथ था। अगर उनके प्रधानमंत्री काल में पूरी कोशिश से रिश्वतखोरों का पर्दाफाश करने का प्रयास किया होता, तो जरूर पकड़े जाते बोफोर्स के चोर। अफसोस कि उस समय भी जो प्रयास किया गया था क्वात्रोच्चि को भारत लाने का, वह नाम के वास्ते ही किया गया था। बोफोर्स इस देश का पहला बड़ा घोटाला था, इसलिए शायद आज भी जरूरी है उन रिश्वतखोरों के नाम जानना, जो भारत की जनता के करोड़ों रुपये हजम कर गए।

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