{"_id":"6ab45a0f31063ede14062bf6","slug":"theatre-of-endless-wars-fascinating-triangle-spanning-three-continents-us-wielding-weapon-of-economic-pressure-2026-09-24","type":"story","status":"publish","title_hn":"अंतहीन युद्धों का रंगमंच: तीन महाद्वीपों के दिलचस्प त्रिकोण! अमेरिका आर्थिक दबाव का हथियार चला रहा है","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
अंतहीन युद्धों का रंगमंच: तीन महाद्वीपों के दिलचस्प त्रिकोण! अमेरिका आर्थिक दबाव का हथियार चला रहा है
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
ट्रंप ने टैरिफ को हथियार बनाया (फाइल)
- फोटो : एएनआई / व्हाइट हाउस
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की डायरी अपने आप में एक युद्ध का मैदान है। अमेरिकी दूतों के मॉस्को से युद्धविराम की योजना लेकर लौटने के तुरंत बाद ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से फोन पर एक घंटे बातचीत की। लेकिन, युद्धविराम सिर्फ सप्ताहांत तक ही टिक सका और सोमवार को फिर लड़ाई शुरू हो गई। ट्रंप के सामने कई अहम काम हैं-उनके ‘बड़े बॉलरूम’ पर चर्चा, मीडिया पर रोक, कैनेडी सेंटर को गिराना, ताइवान और वेनेजुएला के तेल से जुड़े मुद्दे और एआई को लेकर बढ़ते डर को खत्म करना। इसके साथ ही मध्यावधि चुनावों की रैलियों में अपनी छवि संभालने की चुनौती भी है।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
ट्रंप की डायरी के अनुसार, वाशिंगटन में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग पहुंचे हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने हाल में प्रधानमंत्री मोदी से बात नहीं की है, लेकिन माना जाता है कि ओवल ऑफिस में भारत को लेकर चर्चा होती रहती है। तीन महाद्वीपों के तीन नेताओं के इस दिलचस्प त्रिकोण में, ट्रंप युद्ध खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं-एक वह युद्ध, जिसे उन्होंने एक दिन में खत्म करने का वादा किया था और दूसरा वह नया युद्ध, जिसे शुरू न करने का वादा किया था। पिछले शुक्रवार तक उनकी डायरी में एक और एंट्री जुड़ गई-एचआर 5334, ‘लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’। यह विधेयक अमेरिकी संसद से पारित होने और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद कानून बन गया। इसमें 200 से अधिक धाराएं हैं, जिनमें कड़े दंड के प्रावधानों के साथ कुछ दिलचस्प छूट भी दी गई है। इसकी धारा 114 की खास बात यह है कि यह अमेरिका में कम-संवर्धित यूरेनियम के आयात पर लागू नहीं होगी।
ग्राहम कानून रूस पर प्रतिबंध लगाता है और ईरान पर लगे प्रतिबंधों की अवधि को पांच साल और बढ़ाता है। साथ ही, यह रूस से सबसे ज्यादा तेल खरीदने वाले पांच देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की अनुमति देता है, जिनमें भारत भी शामिल है। चीन वह दूसरा देश है, जो आमतौर पर ज्यादा तेल खरीदता है। अगर इसे रूस के खिलाफ एक कानून के रूप में देखें, तो यह सीधा और कड़ा हथियार है। पर, यदि इसे तीन देशों के बीच समीकरण के तौर पर देखा जाए, तो यह शांति का संभावित हथियार भी बन सकता है। पहली नजर में अमेरिकी कांग्रेस ने राष्ट्रपति को एक ऐसा आर्थिक हथियार दिया है, जिसका मकसद दबाव डालकर कुछ हासिल करना है। सवाल यह है कि क्या टैरिफ की धमकी से रूस या चीन को झुकाया जा सकता है। अब तक का अनुभव कुछ खास उत्साहजनक नहीं रहा है।
रूस से भारत के तेल आयात पर ग्राहम कानून के संभावित असर को लेकर काफी चर्चा है। भारत ने तेल कंपनियों के जरिये झटके को सहकर और करों में बदलाव करके कीमतों को काफी हद तक स्थिर रखा है। हालांकि, कीमतों का दबाव रिफाइनरियों व सरकारी राजस्व पर पड़ रहा है। इसका असर करदाताओं और महंगाई के आंकड़ों पर भी पड़ेगा। अब तक भारत ने प्रतिबंधों से बचते हुए अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखी है और अपनी अर्थव्यवस्था के हित में वेनेजुएला से लेकर ईरान तथा रूस तक हाइड्रोकार्बन के वैकल्पिक स्रोत तलाशे हैं। पर क्या अमेरिका चीन को रूस व ईरान से तेल या गैस खरीदना बंद करने के लिए मजबूर कर सकता है?
ग्राहम कानून के तहत कार्रवाई की बात करें, तो बीजिंग, दिल्ली की तुलना में कहीं ज्यादा आगे है। कानून के मुताबिक, राष्ट्रपति को इसके लागू होने के 30 दिनों के भीतर टैक्स लगाना होगा। सैद्धांतिक रूप में बहुत कुछ संभव है, पर हकीकत में संभावनाओं का दायरा काफी बड़ा है। मसलन, कहा जा सकता है कि चीन के पास 600 अरब डॉलर से ज्यादा का अमेरिकी कर्ज है और वह रेयर अर्थ से लेकर दवा निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री तक की उत्पादन शृंखला रोक सकता है। चीन के पास ये विकल्प जरूर हैं, लेकिन यह भी उतना ही साफ है कि चीन को इनका इस्तेमाल नहीं करना पड़ेगा।
धमकी, दबाव वाली कूटनीति और सजा की कार्रवाई, हालात और उपलब्ध विकल्पों पर निर्भर करती हैं। इसमें एक आर्थिक पहलू है और दूसरा भू-राजनीतिक ढांचा। आर्थिक हालात के आंकड़े खतरे का संकेत दे रहे हैं। सबसे बड़ा आर्थिक संकेत राजनीतिक भी है। अमेरिका में गैसोलीन की औसत कीमत 4.2 डॉलर प्रति गैलन से ज्यादा और डीजल की 6.2 डॉलर से अधिक है। मध्यावधि चुनाव से पहले हुए एक सर्वे में 84 प्रतिशत डेमोक्रेट, 73 प्रतिशत निर्दलीय और 66 प्रतिशत रिपब्लिकन इससे सहमत थे कि टैरिफ के कारण कीमतें बढ़ी हैं। कैटो फॉल 2026 के सर्वे में 75 प्रतिशत लोगों ने माना कि टैरिफ का असर पड़ेगा। कीमतें मांग और आपूर्ति से तय होती हैं। इस सप्ताह ब्रेंट क्रूड करीब 110 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया, क्योंकि हूतियों के पाइपलाइन पर हमलों के बाद सऊदी अरब को उत्पादन घटाना पड़ा और यूरोप के लिए कुछ शिपमेंट रद्द करनी पड़ी। आपूर्ति घटने का सीधा असर कीमतों पर पड़ता है।
भारत का कहना है कि अगर उसने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया होता, तो वैश्विक कच्चे तेल की कीमत 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती थी। भारत यूरोप को डीजल आपूर्ति करने वाले देशों में शामिल है। ऐसे में, किसी भी दबाव या धमकी से उत्पादन घटेगा और वैश्विक कीमतों में बढ़ोतरी होगी। खासकर नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बाद बने भू-राजनीतिक माहौल को देखते हुए लगता है कि अमेरिका डेंग शियाओपिंग का तरीका अपनाते हुए सावधानी से कदम उठाएगा। शी और ट्रंप की बैठक के एजेंडे में बुसान और बीजिंग में बनी सहमति को आगे बढ़ाने की बात है-जिसमें व्यापार युद्धविराम, रेयर अर्थ, ताइवान और एआई जैसे मुद्दे शामिल हैं। लेकिन, एजेंडे में शामिल बातों से ज्यादा अहम वे मुद्दे हैं, जो इसमें नहीं हैं। अमेरिका ईरान और यूक्रेन में चल रहे युद्धों को खत्म करने का रास्ता तलाशना चाहेगा। किसी भी बड़ी कामयाबी का रास्ता ग्राहम कानून के तहत छूट देने के राष्ट्रपति के अधिकार से ही बनेगा। चीन के पास ईरान और रूस पर असर डालने की ताकत है-चाहे वह आर्थिक हो या राजनीतिक।
इनमें से कोई भी चीज अचानक नहीं हो रही है। जिस दिन सदन में ग्राहम कानून पर मतदान हुआ, उसी दिन अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दर बढ़ाकर 3.75 से चार प्रतिशत कर दी। अगस्त में अमेरिका का कर्ज 40 लाख करोड़ डॉलर के पार पहुंच गया और यह हर दिन करीब 7.35 अरब डॉलर की रफ्तार से बढ़ रहा है। महंगाई के राजनीतिक जोखिम से जूझ रही अमेरिकी सरकार वैश्विक तेल कारोबार पर दबाव डालकर बच नहीं सकती। उसे इस कानून की कीमत दो बार चुकानी पड़ेगी-एक बार पेट्रोल पंप पर और दूसरी बार मतदान में।