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इस जीत की गूंज दूर तक जाएगी
शरत प्रधान
Updated Sat, 02 Dec 2017 09:01 AM IST
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भाजपा
उत्तर प्रदेश के स्थानीय निकाय चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का वर्चस्व होना स्वाभाविक था। जब सभी विपक्षी पार्टियों ने पहले ही हार मान ली, तो और क्या समझा जाए! और तो और, सबसे मजबूत पार्टी समाजवादी पार्टी (सपा) का जब ये हाल हो गया कि वह मैदान में आने से पहले ही अपने आपको धाराशायी समझ ले, तो ऐसी पार्टी लड़ाई में कहां शामिल होगी। जहां तक अन्य पार्टियों का सवाल है, कांग्रेस से तो किसी को कोई उम्मीद नहीं थी। बहुजन समाज पार्टी (बसपा), जो पहली बार अपने चुनाव चिह्न पर इस चुनाव में उतरी थी, उसकी भी कोई तैयारी नहीं थी, न ही उसकी सर्वोच्च नेता मायावती ने इसमें कोई दिलचस्पी दिखाई।
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फिर भी बसपा को यदि कहीं-कहीं पर बढ़त मिली और कुछ सीटें उसकी झोली में आ गिरीं, तो वह केवल इसलिए कि सपा ने ऐसी जगहों पर नाम के लिए अपना प्रत्याशी उतारा। और यह हुआ अधिकतर उन स्थानों पर जहां मुसलमानों की आबादी अच्छी मानी जाती है। यह देखकर कि सपा सिर्फ चुनाव में औपचारिकता निभा रही है एक कमजोर प्रत्याशी खड़ा करके, मुसलमानों का रुख बसपा की ओर जाना लाजिमी हो गया।
सबसे बड़े अचंभे की बात तो यह है कि ऐसे स्थान, जहां सपा अपने मुस्लिम वोट के कारण भाजपा को अच्छी टक्कर दे सकती थी, वहां पर 'डमी केंडिडेट' खड़ा करके वह क्या हासिल कर रही थी। ऐसी सूरत में दो बातें ही हो सकती हैं-या तो अखिलेश यादव अपना आत्मविश्वास पहले से ही खो चुके थे, या फिर उनकी कोई अंदरूनी 'डील' हो गई थी योगी आदित्यनाथ से। पूर्व मुख्यमंत्री और सपा के युवा अध्यक्ष, जिन्होंने अपने पिता मुलायम सिंह यादव की बनाई हुई पार्टी पर बड़ी चालाकी से अपना कब्जा जमाया, वह इस पूरे चुनाव के प्रचार में एक बार भी नहीं निकले। ऐसा नहीं था कि उनके प्रत्याशी चाह नहीं रहे थे कि उनके युवा नेता उनकी मदद के लिए मैदान में उसी शिद्दत के साथ उतरें, जैसे कि सत्तारूढ़ दल के नेता और प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जुटे हुए थे। परंतु सपा अध्यक्ष ने इसकी कोई आवश्यकता नहीं समझी।
सपा के कार्यकर्ता और अन्य नेता स्वयं इस अचंभे में हैं कि अखिलेश यादव ने चुनाव को गंभीरता से क्यों नहीं लिया, जबकि इसका असर 2019 के लोकसभा चुनाव पर पड़ सकता है। अब तो कुछ विश्लेषक यहां तक सोचने लगे हैं कि इस चुनावी जीत का फायदा मोदी गुजरात में भी ले सकते हैं। किसी को यह अभी तक समझ में नहीं आया है कि अखिलेश ने जान-बूझकर कुछ महत्वपूर्ण स्थानों पर कमजोर प्रत्याशियों को क्यों टिकट दिया। ऐसे प्रत्याशियों में लखनऊ भी शामिल है, जहां कि महापौर की प्रत्याशी मीरा वर्धन का राजनीति से केवल इतना ही लेना-देना था कि उनका विवाह समाजवाद के उच्च स्तंभों में से एक आचार्य नरेंद्र देव के पुत्र से हुआ है। वैसे उनकी पहचान एक व्यापारी के रूप में ज्यादा है, क्योंकि उन्होंने कुछ वर्ष पहले तक एक महिला पॉलिटेक्निक चलाया और अब अपने पिता से विरासत में मिला एक पेट्रोल पंप चला रही हैं। समाजवाद या समाजवादी पार्टी से उनका क्या सरोकार रहा है, यह तो सपा कार्यकर्ता भी नहीं समझ पाए हैं। मीरा वर्धन अकेली ऐसी सपा प्रत्याशी नहीं थी, जो केवल नाम मात्र के लिए चुनाव में पार्टी द्वारा उतारी गईं थी। ऐसे कई शहर हैं, जहां सपा ने इसी प्रकार औपचारिकता निभाई, जिससे भाजपा की नैया बड़े आराम से पार हो गई।
न सिर्फ अखिलेश यादव इस चुनाव से दूर रहे, बल्कि उनके परिवार के अन्य लोग, जो वैसे पार्टी के कर्ता-धर्ता बने रहते हैं और सत्ता का भरपूर भोग उठा चुके हैं, वे भी पूरे प्रचार से कोसों दूर रहे। चाहे वह खुद मुलायम सिंह यादव हों, या उनके दोनों भाई- शिवपाल और रामगोपाल। मुलायम का तो समझा में आता है कि उम्र और सेहत का तकाजा हो सकता है। शिवपाल की तो आजकल अखिलेश से बोलचाल भी बंद है और शायद इसीलिए वह मुलायम के जन्मदिवस आयोजन में भी नहीं दिखाई दिए। पर रामगोपाल भी केवल फिरोजाबाद तक सीमित रहे। और वह भी इसलिए कि उनका बेटा अक्षय यादव वहां से लोकसभा सदस्य है और यह चुनाव उसकी प्रतिष्ठा का सवाल बन गया। आजम खान एक अकेले ऐसे सपा नेता थे, जिन्होंने इस चुनाव में पूरी जान झोंक दी, लेकिन उनकी सीमा थी। केवल उनका रामपुर शहर, जहां उन्हें विश्वास था कि उनका नगर विकास मंत्री के रूप में योगदान इस चुनाव में काम आएगा।
सबका मानना है कि यदि अखिलेश मन लगाकर इस चुनाव में जुट जाते, तो वह योगी को कई जगह चुनौती दे सकते थे। बेशक हार निश्चित थी, पर इतनी बुरी हार न होती। फिलहाल तो यह रहस्य बना हुआ है कि अखिलेश यादव ने इस चुनाव को हल्केपन से क्यों लिया और भाजपा से ज्यादा योगी आदित्यनाथ को अपना वर्चस्व कायम करने के लिए मैदान साफ क्यों छोड़ दिया। वजह जो भी रही हो, पर अखिलेश की निष्क्रियता के कारण उनकी सबसे बड़ी विरोधी बसपा की नेता मायावती का कुछ फायदा हो गया। अधिकतर स्थानों पर, जहां बसपा ने विजय पाई है, उसका कारण है सपा का वोट बसपा में ट्रांसफर हुआ।
इसे भी बड़ा लाभ मिला है योगी आदित्यनाथ को, जिन्होंने इस चुनावी जीत के जरिये प्रदेश में अपने बूते पर अपना वर्चस्व कायम कर लिया। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि मुख्यमंत्री का पद उन्हें प्रधानमंत्री मोदी द्वारा उपहार में मिला था, क्योंकि विधानसभा चुनाव में उन्हीं के नाम पर भाजपा को अभूतपूर्व विजय प्राप्त हुई थी। अब इस छोटे से चुनाव प्रचार की कमान अपने हाथों में लेकर पार्टी को विजय के शिखर पर पहुंचाकर मानो उन्होंने मोदी को रिटर्न गिफ्ट दे दिया हो। सभी मानते हैं कि इस विजय की गूंज 2019 के चुनाव तक सुनाई देती रहेगी। परंतु यह भी तय है कि इस जीत का पूरा फायदा उठाने के लिए भाजपा को सही मायने में जमीनी स्तर पर विकास करके दिखाना होगा। आगे कोई बहाना नहीं चलेगा, क्योंकि केंद्र से लेकर प्रदेश और स्थानीय स्तर तक अब एक ही पार्टी विराजमान है, जवाबदेही जरूर होगी।