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शांत दिमाग के पीछे का विज्ञान: रचनात्मक प्रवाह में मस्तिष्क पर बहुत जोर नहीं देना पड़ता, ध्यान काम पर होता है
Sun, 11 Aug 2024 05:02 AM IST
विशांत श्रीवास्तव
गेमा वेयर, द कन्वर्सेशन
गेमा वेयर, द कन्वर्सेशन
Published by: विशांत श्रीवास्तव
Updated Sun, 11 Aug 2024 05:02 AM IST
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कभी आपके साथ ऐसा हुआ कि आपने कोई संगीत सुना और उसमें डूब गए, या कुछ लिखने बैठे, तो मन इतना शांत रहा कि हर शब्द के पीछे रचनात्मक ऊर्जा महसूस होने लगी हो, या आप कोई फिल्म देख रहे हैं, और उसमें इतना खो गए कि कुछ समय तक दुनिया को ही भूल गए? कोई थकावट नहीं हुई। इसके उलट कई बार ऐसा होता है कि लिखने बैठते हैं, तो पूरा समय चला जाता है, फिर भी हम सटीक ढंग से उस बात को नहीं लिख पाते, जो हम लिखना चाहते हैं। लेकिन जब हम सही मनोदशा में होते हैं, तो लगभग बिना कलम रोके लिखते चले जाते हैं। यही रचनात्मक प्रवाह होता है। लेकिन क्या आपने सोचा है कि इस दौरान हमारे दिमाग में कौन-सी रासायनिक क्रियाएं चल रही होती हैं?फिलाडेल्फिया में ड्रेक्सेल विश्वविद्यालय में मनोवैज्ञानिक और मस्तिष्क विज्ञान के प्रोफेसर का कहना है कि रचनात्मक प्रवाह में हमें मस्तिष्क पर बहुत जोर नहीं देना पड़ता है। पूरा ध्यान काम पर होता है। यह आनंददायक होता है और कोई विचलन नहीं होती।
हम बागवानी करते, खाना बनाते, बातचीत करते, संगीत सुनते, या लिखते समय इसका अनुभव कर सकते हैं। जब हमारे मस्तिष्क में रचनात्मक प्रवाह होता है, तो सारी समस्याओं का समाधान तुरंत होता है। आमतौर पर जब हम रचनात्मक प्रवाह में होते हैं, तो समय कब और कितनी जल्दी बीत जाता है, हमें पता ही नहीं चलता। मनोवैज्ञानिक रचनात्मक प्रवाह के बारे में 50 साल से भी अधिक समय से शोध कर रहे हैं, जिसकी शुरुआत मनोवैज्ञानिक मिहाली सिक्सजेंटमिहाली ने की थी। वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क के बाएं और दाएं, दोनों हिस्सों द्वारा किए जाने वाले विशिष्ट कार्यों की पहचान की है।
1990 के दशक में न्यूरो-साइकोलॉजिस्ट एल्खोनन गोल्डबर्ग ने बताया कि मस्तिष्क के दो गोलार्ध अनुभूति और रचनात्मकता में अलग-अलग भूमिका निभाते हैं। इसलिए जब आप कुछ नया सीख रहे होते हैं, तो दायां गोलार्ध इसमें शामिल होता है। जब आप इसमें अभ्यस्त हो जाते हैं, तो यह कौशल बाएं गोलार्ध में स्थानांतरित हो जाता है। बायां गोलार्ध ही हमें सुनने-समझने में मदद करता है। जब हम किसी युवा संगीतकार की धुन में किसी कमी की ओर इशारा करते हैं, तो वह नई धुन पर मेहनत करता है और ज्यादा रचनात्मक ऊर्जा के साथ आता है। पर पुराने संगीतकार झल्लाने लगेंगे और कहेंगे कि उनकी हर धुन में रचनात्मकता है। दरअसल, ऊर्जा का यह रचनात्मक प्रवाह दिमाग की एक स्थिति को दर्शाता है, जिसे हर वक्त बरकरार नहीं रखा जा सकता। इसके लिए प्रयास करने पड़ते हैं।