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प्रवासी मजदूरों के हक का सवाल

नम्रता राजू Updated Mon, 19 Feb 2018 07:14 PM IST
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नई नौकरी के लिए किसी ऐसे देश में जाने की कल्पना करें, जहां जाकर आपको पता चले कि आपको 4,700 डॉलर में बेच दिया गया है। यह सुनने में बड़ा अटपटा लगता है, पर यह 39 वर्षीय हैदराबादी महिला सलमा बेगम की जिंदगी की असली कहानी है, जो पिछले वर्ष सुर्खियों में थी। फर्जी भर्ती एजेंटों ने धोखा देकर सलमा को उसके नियोक्ता को बेच दिया, जिसने विवाह का प्रस्ताव खारिज करने पर उसे प्रताड़ित किया। सलमा हालांकि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के हस्तक्षेप के बाद मुंबई लौट आई, पर ऐसी ही स्थितियों में फंसी प्रवासियों की भीड़ इतनी भाग्यशाली नहीं होती।
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खाड़ी देशों में 1970 के दशक में तेल खनन में उछाल आने पर दक्षिण एशियाई प्रवासियों का इन देशों में पलायन शुरू हो गया और तभी से खाड़ी देशों के नियोक्ता ब्लू कॉलर जॉब की तलाश में गए प्रवासियों के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि मजबूत होती आर्थिक स्थिति ने भारत को सौदेबाजी की स्थिति में ला दिया है, पर स्थानीय दूतावासों को प्रत्येक खाड़ी देश में प्रचलित स्थानीय कानूनों के चलते मुश्किल क्षेत्रों में समझौते करने पड़ते हैं। यौन हिंसा को लेकर कानूनों की कमी इसका एक आदर्श उदाहरण है : भले यौन हिंसा के शिकार प्रवासियों की मदद दूतावास करते हैं, पर स्थानीय कानूनी ढांचे निवारण की मांग के वक्त दूतावास की पहुंच को बाधित करते हैं।

प्रवासन अपने आप में बुरा नहीं है। अगर इसे सुरक्षित ढंग से अंजाम दिया जाए, तो यह संबंधित सभी पक्षों-श्रमिक, गंतव्य देश और भारत, के लिए लाभदायक है। ऐसा नहीं है कि भारत सरकार सुरक्षित प्रवास सुनिश्चित करने के उपाय शुरू करने में विफल रही है। इस दिशा में कई कदम उठाए गए हैं, जैसे, 2014 में भारतीय श्रमिकों की मांग करने वाले विदेशी नियोक्ताओं को पंजीकृत करने के लिए ऑनलाइन प्लेटफॉर्म 'ई-माइग्रेट' की शुरुआत की गई।

अनौपचारिक माइग्रेशन चैनल के जरिये प्रवासी श्रमिकों के शोषण के पीछे दो बुजुर्ग अपराधी तथा सलमा बेगम की दुर्दशा के लिए भर्ती एजेंट जैसे लोग जिम्मेदार होते हैं। इस बारे में वाकिफ होने के बाद सरकार ने नौकरी चाहने वालों की औपचारिक भर्ती और संदिग्ध नियोक्ताओं की गड़बड़ी कम करने के लिए ई-माइग्रेट प्लेटफॉर्म शुरू किया। हालांकि इसकी अपनी मुश्किलें हैं, लेकिन सलमा जैसों की मदद करने के लिए उन्हें दूर करना अनिवार्य है।

ई-माइग्रेट की पहली कमी है कि यह उन महिलाओं की मदद नहीं करता, जो इमिग्रेशन क्लीयरेंस रिक्वायर्ड (ईसीआर) का स्टांप लगे पासपोर्ट पर प्रवास करती हैं। यह स्टांप 1983 के आप्रवासन कानून के तहत लगा होता है, जो कहता है कि जिन्होंने दसवीं कक्षा पास नहीं की है और जो खाड़ी देशों समेत सूची के अट्ठारह देशों में जाना चाहते हैं, उन्हें प्रवासियों के संरक्षक से पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता है। इस समय ई-माइग्रेट 30 वर्ष से कम उम्र की भारतीय महिलाओं को ईसीआर श्रेणी के तहत प्रवास की अनुमति नहीं देता। यह सूची के 18 देशों में इस श्रेणी की महिलाओं के लिए प्रतिबंध के समान है-अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने इसके खिलाफ बार-बार चेतावनी दी है। हालांकि ईसीआर श्रेणी में 30 साल से कम उम्र की महिलाओं पर यह प्रतिबंध अच्छे इरादे से लगाया गया हो सकता है, लेकिन यह ऐसी महिलाओं को अनौपचारिक प्रवास चैनल अपनाने के लिए प्रेरित कर सकता है और इस तरह उनकी ट्रैफिकिंग का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए ऐसे प्रतिबंध को हटाना अनिवार्य है।

भारत सरकार खाड़ी में ब्लू कॉलर श्रमिकों की दुर्दशा से अवगत है, इसलिए उसने नर्सों और महिला घरेलू श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कुछ खाड़ी देशों के साथ सहमति पत्र (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं। ई-माइग्रेट प्लेटफॉर्म सरकार को श्रमिकों के हित में दोनों तरफ तालमेल की सुविधा प्रदान करता है और यह सुनिश्चित करता है कि एमओयू को बरकरार रखा गया है। फिर भी एनजीओ एवं प्रवासी अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि भारत और खाड़ी देशों के बीच अलग-अलग समझौता पर्याप्त नहीं है। इसके बजाय पूरे खाड़ी क्षेत्र के लिए एक समझौता वक्त की जरूरत है। पूरे खाड़ी क्षेत्रीय समझौते के अभाव के कारण एक खाड़ी देश की सीमाओं से दूसरे देश में भारतीय श्रमिकों की तस्करी की गुंजाइश बनी रहती है।

विदेशों में प्रवासी भारतीय श्रमिकों के वेतन के निरंतर अवमूल्यन को देखते हुए सरकार का यह मानना सही है कि रेफरल वेज (न्यूनतम मजदूरी) न केवल महत्वपूर्ण है, बल्कि उनके आर्थिक सशक्तीकरण के लिए जरूरी भी है। रेफरल वेज के कुछ गलत डिजाइन ने कुछ रोजगार की श्रेणियों में श्रमिकों के लिए जो मजदूरी की पेशकश की है, वह विदेशी नियोक्ताओं के लिए महंगी है। इसके बाद उन नियोक्ताओं ने भारत से बाहर दक्षिण एशियाई श्रमिकों की तलाश शुरू कर दी है, क्योंकि वे नई दरों पर मजदूरी नहीं दे सकते। विडंबना यह है कि रेफरल वेज ने सलमा जैसी श्रमिकों का फायदा पहुंचाने से ज्यादा नुकसान किया है, क्योंकि विदेशी नियोक्ता उनकी जगह पाकिस्तानी या बांग्लादेशी श्रमिक ढूंढ सकते हैं।

इसका समाधान यह तय करना है कि हम रेफरल मजदूरी का निर्धारण कैसे करते हैं। इसके लिए गंतव्य देश में प्रचलित मजदूरी की बाजार दर का सर्वेक्षण करने के साथ दक्षिण एशिया के बाकी हिस्सों में समान रोजगार के लिए प्रचलित मजदूरी की तुलना की जाती है। ध्यान रखें कि ये कदम व्यापक समाधान का एक हिस्सा मात्र हैं। प्रवासी मजदूरों की मुश्किलें कम करने के लिए अन्य उपाय किए जाने चाहिए, जैसे, प्रस्थान पूर्व दबाव प्रयासों को कम करने से लेकर अवैध नियोक्ताओं और उनके उप-एजेंटों के लिए सख्त सजा का प्रावधान करना। आप्रवासन की जटिलता और प्रवासियों की संख्या को देखते हुए ऐसा करने में अभी लंबा वक्त लगेगा, ताकि सलमा बेगम जैसी स्थिति फिर न हो।

- हार्वर्ड केनेडी स्कूल की स्कॉलर

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