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नकल पर नकेल: शिक्षा व्यवस्था में सुधार का सवाल
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सार
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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सोशल मीडिया
विस्तार
संगमनगरी प्रयागराज स्थित प्रोफेसर राजेंद्र सिंह (रज्जू भइया) राज्य विश्वविद्यालय में पिछले दिनों 9,849 नकलची विद्यार्थियों का पकड़ा जाना उच्च शिक्षा के इतिहास में काले अध्याय सरीखा है। यह भी अभूतपूर्व है कि सभी विद्यार्थी एक ही कक्षा (स्नातक तृतीय वर्ष) के हैं। इनमें भी 87 फीसदी उन विज्ञान विषयों से ताल्लुक रखते हैं, जिन्हें आर्ट्स या कॉमर्स के मुकाबले उच्चतर समझा जाता है। इन पर कॉपियों के मूल्यांकन में एक-से जवाब मिलने
के बाद शक गहराया, तो परीक्षा केंद्रों के सीसीटीवी फुटेज की जांच कराई गई। इसमें खुलासा हुआ कि परीक्षा कक्ष में बैठे विद्यार्थी एक साथ सिर उठाकर सामने देखते हैं और फिर लिखने लगते हैं। यह नकल बोर्ड पर लिखकर और बोलकर कराई गई थी। कारस्तानी छिपाने के लिए केंद्र व्यवस्थापकों ने ब्लैक बोर्ड की ओर कैमरे नहीं लगाए थे।
चूंकि विश्वविद्यालय प्रशासन ने ही नकल के इस दुस्साहसिक खेल को न सिर्फ उजागर किया, बल्कि नकलचियों को एक साल के लिए प्रतिबंधित भी किया, इसलिए उसके व्हिसिलब्लोअर बनने को उच्च शिक्षा व्यवस्था में सुधार की कोशिश के रूप में ही लेना चाहिए। हालांकि, पूरब के ऑक्सफोर्ड (इलाहाबाद विश्वविद्यालय) वाले शहर के इस मात्र छह बरस पुराने राज्य विश्वविद्यालय के इस कदम से व्यवस्था में सुधार आ ही जाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। हां, यह खतरा जरूर बढ़ गया है कि इस विश्वविद्यालय से प्रतापगढ़, कौशाम्बी, फतेहपुर और प्रयागराज जिले के संबद्ध 653 महाविद्यालयों में आगे दाखिले ही घट जाएं। दरअसल, उच्च शिक्षा में व्यापक सुधार माध्यमिक और प्राथमिक शिक्षा के अच्छा हुए बगैर संभव ही नहीं है।
इस चुनौती को स्वतंत्रता हासिल होने के तुरंत बाद महात्मा गांधी ने शिद्दत से महसूस करते हुए हरिजन में लिखा था, 'विश्वविद्यालय चोटी पर होता है। चोटी तभी कायम रह सकती है, जब बुनियाद अच्छी हो।' वैसे, यह बात 50 की उम्र पार कर चुके अभिभावकों को बखूबी याद भी होगी, जब उनके विद्यार्थी जीवन में राजकीय इंटर और डिग्री कॉलेजों में दाखिला पाना कितने गर्व की बात हुआ करती थी। यहां दाखिला मिलना ही इस बात की गारंटी हो जाती थी कि विद्यार्थी कुछ 'बड़ा' बनकर ही निकलेंगे। इनका स्वर्णिम इतिहास ही कुछ ऐसा था। पर, आज स्थिति ऐसी हो गई है कि इनकी प्रयोगशालाएं धूल से अटी पड़ी हैं और पूरे शैक्षिक सत्र में एक-आध बार उपकरणों के दर्शन-लाभ भर से विद्यार्थियों को उत्कृष्ट श्रेणी हासिल करा दी जा रही है। यहां सख्ती हो जाए, तो सीटें भरने के लाले पड़ सकते हैं।
वैसे भी लाख जतन करके अभी 26.3 फीसदी छात्र ही उच्च शिक्षा संस्थानों तक पहुंच पा रहे हैं। इसमें उन निजी महाविद्यालयों का आंकड़ा भी शामिल है, जो इसी गारंटी के साथ प्रवेश देते हैं कि क्लासरूम में आए बिना ही अच्छे अंकों में पास की मार्कशीट दिला देंगे! इसी खेल के कारण कुछ दशक पहले तक ठसक से छांट-छांटकर प्रवेश देने वाले एडेड महाविद्यालय भी आज पूरी सीटें नहीं भर पा रहे। इनके दबाव का ही नतीजा है कि उत्तर प्रदेश में शिक्षकों की बायोमीट्रिक हाजिरी के खिलाफ बात हाई कोर्ट तक गई और वहां से राहत नहीं मिलने के बावजूद आठ साल बाद जून-2022 से इसे लागू किया जा सका है। कॉलेजों में शिक्षक आएंगे तो पढ़ाएंगे ही, यह धारणा कितनी फलीभूत होती है, यह आगे पता लगेगा।
वैसे, राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात को 26 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 फीसदी तक लाने का जो लक्ष्य रखा गया है, संभव है कि उसे हासिल कर लिया जाए, लेकिन क्या इससे गुणवत्ता सुनिश्चित हो सकेगी? नई शिक्षा नीति के नियंताओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षण से लेकर मूल्यांकन तक की व्यवस्था पारदर्शी और ईमानदार बनाई जाए। यह कुछ पाठ्यक्रमों में बदलाव या राष्ट्रीय आकलन केंद्र 'परख' की स्थापना मात्र से कतई नहीं सुधरने वाला। इसके लिए कैंपस का माहौल पूरी तरह बदलना होगा, जवाबदेह बनाना होगा। जब तक यह नहीं होगा, नकल के काले अध्याय जुड़ते ही रहेंगे।