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पहचान का प्रश्न: एक नैतिक अनुबंध भी है नागरिकता, दस्तावेज के साथ ही व्यवहार भी अहम
Thu, 02 Jul 2026 08:10 AM IST
Pavan
पीयूष पांडे, वरिष्ठ पत्रकार
पीयूष पांडे, वरिष्ठ पत्रकार
Published by: Pavan
Updated Thu, 02 Jul 2026 08:10 AM IST
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नागरिकता एक नैतिक अनुबंध भी है
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अमर उजाला
विस्तार
भारत के संविधान के अनुच्छेद 51(A) में नागरिकों के लिए कुल 11 मौलिक कर्तव्य वर्णित हैं। संविधान का सम्मान करना, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करना, देश की एकता और अखंडता की रक्षा करना, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा करना, पर्यावरण का संरक्षण करना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना, महिलाओं के सम्मान के विरुद्ध प्रथाओं का त्याग करना और अपने बच्चों को शिक्षा दिलाना-ये सभी कर्तव्य नागरिकों से अपेक्षित हैं। लेकिन, क्या हमने कभी यह सोचा है कि संविधान में वर्णित इन कर्तव्यों को निभाने के प्रति हमारा बोध कितना गहरा है? क्या हम नागरिक होने के अधिकार के प्रति जितने सजग हैं, उतने ही अपने कर्तव्यों के प्रति भी हैं?उदाहरण के लिए सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा वाले कर्तव्य को ही देख लीजिए। आए दिन बात-बेबात लोग बसें जला देते हैं, रेल की पटरियां उखाड़ देते हैं या सार्वजनिक संपत्ति का खुलकर नुकसान करते हैं। सिर्फ 2022 में ‘अग्निपथ’ योजना के खिलाफ हुए हिंसक प्रदर्शनों में रेलवे को लगभग 259 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। दूसरी ओर, राष्ट्रगान के दौरान खड़े होने या न होने का विवाद आजादी के करीब आठ दशक बाद भी बार-बार उठ खड़ा होता है। इसी तरह महिलाओं के सम्मान के विरुद्ध प्रथाएं आज भी जारी हैं और पर्यावरण संरक्षण को लेकर आम नागरिक कितने सजग हैं, यह बताने की आवश्यकता नहीं है।
हाल में नागरिकता को लेकर एक नई बहस छिड़ गई। भारत सरकार की ओर से कहा गया कि पासपोर्ट भारतीय नागरिकता की अंतिम और निर्णायक गारंटी नहीं है। विपक्ष के कई नेताओं ने इसे नागरिकों के अधिकारों पर प्रश्नचिह्न बताकर प्रस्तुत किया। लेकिन, इस पूरे विवाद में कुछ जरूरी सवाल लगभग गायब रहे। पहला, क्या पासपोर्ट वास्तव में कभी नागरिकता का अंतिम प्रमाणपत्र था? दूसरा, यदि नहीं था, तो फिर इस बयान पर इतना शोर क्यों?
सच यह है कि भारतीय कानून में नागरिकता और पासपोर्ट दो अलग-अलग विषय हैं। पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है, जिसे सामान्यतः भारतीय नागरिकों को जारी किया जाता है, पर यदि किसी कारण से यह पाया जाए कि गलत जानकारी देकर पासपोर्ट प्राप्त किया गया था, तो पासपोर्ट अपने आप नागरिकता का अटल प्रमाण नहीं बन जाता। यही कारण है कि भारत में नागरिकता का निर्धारण सिटीजनशिप एक्ट, 1955 के प्रावधानों के अनुसार होता है, न कि केवल पासपोर्ट के आधार पर।
भारतीय नागरिकता को लेकर कानून बिल्कुल स्पष्ट है। आजादी के समय लाखों लोग भारत और पाकिस्तान के बीच पलायन कर रहे थे और इसलिए संविधान सभा के सामने भी सबसे कठिन प्रश्नों में से एक यह था कि आखिर किसे भारतीय नागरिक माना जाए। संविधान के अनुच्छेद पांच से 11 तक नागरिकता के प्रारंभिक प्रावधान इसी बहस का परिणाम हैं। संविधान सभा में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि तत्कालीन परिस्थितियां असाधारण थीं। विभाजन के कारण सीमाएं बदल रही थीं, लोग लगातार आ-जा रहे थे और ऐसे में स्थायी नागरिकता का प्रश्न अत्यंत जटिल था। इसी कारण संविधान ने प्रारंभिक व्यवस्था तो दी, लेकिन भविष्य में संसद को नागरिकता पर विस्तृत कानून बनाने का अधिकार भी सौंप दिया था।
विभाजन के दौरान नागरिकता तय करने के लिए केवल जन्मस्थान ही पर्याप्त नहीं था। नागरिकता को लेकर विशेष रूप से 19 जुलाई, 1948 की तिथि महत्वपूर्ण बनी, क्योंकि इसके बाद पाकिस्तान से आने वालों के लिए ‘परमिट सिस्टम’ लागू हुआ। इस तिथि के बाद जो लोग भारत आए, उन्हें पंजीकरण जैसी औपचारिकताओं से गुजरना पड़ा। उस वक्त दुश्वारियां कैसी थीं, इसका उल्लेख संविधान सभा की बहसों और नागरिकता के मुद्दे पर लिखी ऑर्निट शानी की हाउ इंडिया डेमोक्रेटिक जैसी कई किताबों में विस्तार से मिलता है। मसलन, असम सिटिजन्स एसोसिएशन, मंगलदै ने शिकायत दर्ज कराई कि एक सब-डिप्टी कलेक्टर ने 22 वर्षीया तीन बच्चों की एक मां का शपथपत्र इस आधार पर निरस्त कर दिया कि वह अपनी उम्र के समर्थन में जन्मपत्री प्रस्तुत नहीं कर सकी।
विडंबना यह है कि नागरिकता के मुद्दे पर चर्चा अधिकारों तक सीमित होकर रह जाती है। संविधान की प्रति हाथ में लेकर राजनीति करते हुए राजनेता अक्सर नागरिक होने के अधिकार की बात करते तो दिखते हैं, लेकिन दायित्वों की चर्चा नहीं करते। इस संदर्भ में जापान का उदाहरण अक्सर इसलिए दिया जाता है कि वहां सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना सामाजिक शर्म का विषय माना जाता है। अनेक यूरोपीय देशों में कर चुकाना केवल कानूनी दायित्व नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी माना जाता है। लेकिन, भारत में कर बचाने के लिए हथकंडे अपनाना कई लोग अपनी योग्यता मानते हैं। दरअसल, भारत में भी संविधान निर्माताओं ने यही अपेक्षा की थी कि नागरिक अधिकारों के साथ-साथ अपना उत्तरदायित्व भी निभाएंगे और इसलिए 1976 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा मौलिक कर्तव्यों को संविधान में जोड़ा गया और बाद में, 86वें संशोधन द्वारा बच्चों को शिक्षा दिलाने का कर्तव्य भी इसमें शामिल किया गया।
जरूरी यह है कि आज चर्चा सिर्फ इस बात पर न हो कि ‘कौन नागरिक है?’ बल्कि इस पर भी हो कि ‘अच्छा नागरिक कौन है?’ क्या वह, जो केवल अपना पासपोर्ट दिखा सके, या वह, जो संविधान के मूल्यों को अपने व्यवहार में उतारे? क्या नागरिकता केवल एक कानूनी पहचान है, या एक नैतिक अनुबंध भी है? पासपोर्ट, आधार या मतदाता पहचान पत्र नागरिकता की प्रशासनिक पहचान हो सकते हैं, लेकिन नागरिकता का वास्तविक अर्थ तब पूरा होता है, जब व्यक्ति संविधान के प्रति सम्मान, समाज के प्रति जिम्मेदारी और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व को भी उतनी ही गंभीरता से निभाए, जितनी गंभीरता से वह अपने अधिकारों की रक्षा चाहता है। साथ ही, सरकार को भी नागरिकता संबंधी दस्तावेजों को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है।