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सवाल महिलाओं की सुरक्षा का है

Sun, 04 Feb 2018 07:17 PM IST
पत्रलेखा चटर्जी
पत्रलेखा चटर्जी Updated Sun, 04 Feb 2018 07:17 PM IST
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The question is about the safety of women
महिला सुरक्षा

मैंने पद्मावत फिल्म नहीं देखी। लेकिन खासकर इन दिनों जब तक आप किसी ऐसी जगह नहीं चले जाते, जहां अखबार, टीवी और इंटरनेट कनेक्टिविटी नहीं हो, तब तक इस फिल्म से संबंधित कोलाहल से खुद को दूर रखना बहुत मुश्किल है। एक शब्द जो हिंसा में निहित दमदार तर्कों, आगजनी और छोटे बच्चों के स्कूली बस पर हमले के दौरान निकल आता है, वह है सम्मान। इसने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि 'सम्मान' की यह कौन-सी धारणा है, जो आम भारतीय को भीड़ में बदल देती है? हमारे इस देश में हिंसा का यह खेल कैसे चलता है? ये वे सवाल हंै, जिनके उत्तर देना आसान नहीं है। लेकिन एक बात तो निश्चित है कि यह सम्मान कितना प्रभावकारी होता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कौन हैं और इस देश की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में आपकी जगह कहां पर है। किसके सम्मान की रक्षा के लिए हम खड़े होते हैं, मुखर होते हैं, शहरी मध्यवर्गीय भारतीय विरोध प्रदर्शन करते हैं, मोमबत्तियां जलाते हैं, टेलीविजन पैनल की चर्चा में शामिल होते हैं और लंबे-लंबे लेख लिखते हैं? और किसके सम्मान के लिए आम तौर पर मुखर रहने वाले हम लोग मौन रहते हैं?


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अब जरा इस पर विचार कीजिए : पद्मावत के रिलीज होने से एक हफ्ते पहले हरियाणा में पंद्रह वर्ष की एक दलित लड़की की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई। उसकी लाश जींद में मिली। इस भयंकर अपराध ने दिसंबर, 2012 में राजधानी दिल्ली में निर्भया के साथ हुए भयावह बलात्कार की याद दिला दी। उस दलित किशोरी की बर्बर हत्या की जांच अभी चल रही है। समाचार पत्रों की खबरों के मुताबिक, इसमें पुलिस को बहुत ज्यादा सफलता नहीं मिली है और वह अब भी विभिन्न संभावनाओं पर विचार ही कर रही है, जिसमें ऑनर किलिंग से लेकर आत्महत्या तक की थ्योरी शामिल है।

विगत नौ जनवरी को जब कुरुक्षेत्र के निकट झांसा गांव से पंद्रह वर्षीय लड़की और किशोर उम्र के ही उसके पुरुष मित्र गायब हुए, तो पुलिस ने लड़के के रिश्तेदारों को पूछताछ के लिए पकड़ा और लड़की के माता-पिता को उनकी बेटी की खोज के लिए बुलाया। लेकिन फिर अगले हफ्ते दोनों के अर्धनग्न शरीर अलग-अलग मिले। स्थानीय पुलिस को यह मानना पड़ा कि वह ऐसे जटिल मामले की तफ्तीश में लगी है, जिनमें कई संभावनाएं हैं। लड़की के शरीर पर बर्बर चोटों के निशान थे, जिसने दिल्ली में 16 दिसंबर, 2012 के सामूहिक बलात्कार और हत्या की यादें ताजा कर दी। इस मामले की जांच में क्या हो रहा है, इसकी कोई ताजा जानकारी नहीं है, लेकिन जहां तक भारतीय मध्यवर्ग का संबंध है, इतना स्पष्ट है कि अखबार के मुखपृष्ठ पर सुर्खियों में छपी इस जंगलीपन की यादें लोगों की स्मृतियों में धुंधली पड़ रही हैं।

और यही सबसे बड़ा संकट है। कई युवा दलित महिलाओं की बर्बरतापूर्वक हत्या की गई है। दलितों के खिलाफ हिंसा के आंकड़े लगातार बढ़ते जा रहे हैं और हर नई घटना पुरानी घटना की बर्बरता को सामान्य बना देती है। अखिल भारतीय दलित महिला अधिकार मंच की महासचिव और दलित कार्यकर्ता आशा कोटवाल कहती हैं, हर घटना सिर्फ एक क्रूर अपराध नहीं है। हर जीवन जिसे खत्म किया जाता है, उसका प्रभाव कई अन्य दलितों, खासकर महिलाओं पर पड़ता है। इनमें से कई पीड़ित लड़कियां और महिलाएं हैं, जिनके अपने सपने थे, वे अपने परिवार की लिखने पढ़ने वाली पहली पीढ़ी थीं और वे डॉक्टर, इंजीनियर या ऐसा ही कुछ बनना चाहती थीं।
 
वह किशोरी, जिसके साथ हाल में हरियाणा में बर्बरता की गई, दो कमरे के एक मंजिला मकान में अपने परिवार के साथ रहती थी। उसके पिता दर्जी हैं। उसकी मां बताती हैं, वह डॉक्टर बनना चाहती थी और कहती थी कि वह हमें गरीबी से छुटकारा दिलाएगी। हमने उसे प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने और ट्यूशन दिलवाने का फैसला लिया था। उसके शिक्षक उसे प्रतिभाशाली, लेकिन शर्मीली लड़की बताते हैं। उसे अक्सर क्लास के ब्लैकबोर्ड पर लिखने के लिए चुना जाता था, क्योंकि उसकी लिखावट खूबसूरत थी। उसे किताबों से प्यार था।

अब वह चली गई है और उसके सपने और उसकी आकांक्षाएं भी। कई मायनों में इस घटना ने मुझे कई दलित महिलाओं की याद दिला दी है-केरल की जीशा, राजस्थान की डेल्टा, जींद की कैफी और ओडिशा की स्नेहलता। जीशा एर्नाकुलम के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज में कानून की पढ़ाई करने वाली 29 वर्षीय छात्रा थी। डेल्टा मेघवाल सत्तरह वर्ष की दलित लड़की थी, जिसकी लाश बीकानेर के जिले के जैन आदर्श टीचर्स ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट के वाटर टैंक में मिली। डेल्टा इसी संस्थान में पढ़ती थी। पिछले वर्ष एक खबर में बताया गया था कि पुलिस का कहना है कि अपने प्रशिक्षक के साथ आपत्तिजनक अवस्था में पकड़े जाने के बाद लड़की ने आत्महत्या कर ली, जबकि डेल्टा के पिता का मानना है कि उनकी बेटी की हत्या की गई है। सबसे दुखद बात है कि पहले डेल्टा के पिता घर-घर जाकर लोगों को अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा दिलाने के लिए प्रेरित करते थे। अब वह ऐसा करने वालों को हतोत्साहित करते हैं। उन्होंने एक पत्रकार से कहा, 'अगर आप बेटियों को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो आठवीं या दसवीं के बाद उन्हें घर पर बिठा दीजिए। कम से कम आखिरी वक्त पर आप उसका चेहरा तो देख पाएंगे।'

हमें इस चीज से परेशान होना चाहिए और इन बेटियों के सम्मान की खातिर अपनी आवाज बुलंद करनी चाहिए। इतिहास अपनी जगह है, पर ऐसा क्यों हो रहा है कि इतिहास से मोहाविष्ट हमारा समाज आज खुरदरे वर्तमान से पूरी तरह आंख मूंदे हुए है?

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