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भारत के आकाश में ड्रोन की जगह

शशांक श्रीनिवासन Updated Mon, 10 Dec 2018 07:24 PM IST
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मानव रहित हवाई वाहनों (यूएवी, जिसे आम तौर पर ड्रोन कहा जाता है) के निर्माण और संचालन के क्षेत्र में वैश्विक नेता बनने की भारत की आकांक्षा सात अक्तूबर, 2014 को रातोंरात कुचल दी गई। भारतीय नागरिक उड्डयन के नियामक यानी डीजीसीए के महानिदेशक ने एक सार्वजनिक सूचना जारी कर नियामकों के जारी होने तक सुरक्षा मुद्दों के चलते किसी भी उद्देश्य के लिए किसी भी गैर सरकारी इकाई को यूएवी लॉन्च करने से प्रतिबंधित कर दिया। बेशक उस सूचना में निर्देश के सख्त अनुपालन की बात की गई, लेकिन सौभाग्य से भारत के नवजात ड्रोन उद्योग के लिए इसमें किसी तंत्र या सरकारी एजेंसी का जिक्र नहीं किया गया, जो इसका अनुपालन करने के लिए जिम्मेदार होते।
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नतीजतन प्रतिबंध जहां ड्रोन के व्यापक उपयोग को कम करने में प्रभावी रहा, वहीं नियामक अराजकता ने इस छोटे से उद्योग के निर्माण के लिए पर्याप्त जगह भी प्रदान की। पिछले चार वर्षों में खेतों का नक्शा बनाने, वीडियोग्राफी कराने और रियल एस्टेट मार्केटिंग के लिए तस्वीरें लेने के लिए निजी ड्रोन ऑपरेटरों से संपर्क करना और उनसे किराये पर ड्रोन लेना अपेक्षाकृत आसान हो गया है। ये लोग शहरी इलेक्ट्रॉनिक ग्रे बाजारों से ड्रोन खरीदने, मित्रों या परिजनों से अपने निजी सामान के रूप में आयात करने या उसके जरूरी पुर्जे खरीदकर अपना ड्रोन बनाने में सक्षम रहे हैं। कुछ व्यवसायी, जो भारत में ड्रोन बनाने या संचालित करने के लिए जरूरी जटिलताओं को सुलझाने में सक्षम रहे हैं, सरकार की शत्रुतापूर्ण निगहबानी को आकर्षित किए बिना छायांकन, कृषि और आधारभूत संरचनाओं के क्षेत्रों के लिए उत्पाद एवं सेवाएं प्रदान करते हैं। हालांकि ऐसे नियमों के बिना, जो उनके उत्पादों और सेवाओं को वैधता की गारंटी देते हैं, इन व्यवसायों के लिए निवेश आकर्षित करना मुश्किल हो गया है, जिससे उनके विकास की क्षमता सीमित हो गई है। इसलिए हैरानी नहीं कि भारत में कोई स्वदेशी ड्रोन निर्माता नहीं है, जो डीजेआई, पैरोट और यूनिक जैसे ड्रोन उद्योग की दिग्गज कंपनियों से वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम हो।

लेकिन अगले कुछ हफ्तों में यह परिदृश्य बदल सकता है। बीते एक दिसंबर को भारत का ड्रोन रेगुलेशन 1.0 लागू किया गया। ये नियामक दो सार्वजनिक परामर्शों एवं असंख्य निजी बैठकों तथा कई सरकारी एजेंसियों की जांच के बाद सामने आए हैं। नियामकों का यह प्रारंभिक संस्करण सरकारी एजेंसियों के एक निर्धारित समूह से अनुमति प्राप्त करने के बाद गैर-सरकारी एजेंसियों, संगठनों और व्यक्तियों को विशिष्ट संचालन के लिए यूएवी का उपयोग वैध बनाता है। इसमें ड्रोन के निर्माण (चाहे निर्माण भारत में हो या बाहर) के लिए न्यूनतम मानक, ड्रोन ऑपरेटरों के लिए जरूरी अनिवार्य प्रशिक्षण पर जानकारी और विशिष्ट ड्रोन संचालन के लिए विभिन्न अनुमति प्रपत्र भी शामिल हैं। नियामकों के इस संस्करण में बाजार परिवर्तन की संभावना वाली कुछ गतिविधियों को अभी मंजूरी नहीं दी गई है। मसलन, ड्रोन के जरिये की जा रही आपूर्ति को जहां इस उद्योग के विकास का एक प्रमुख क्षेत्र माना जाता है और इस क्षेत्र में सतत शोध और विकास का भी लक्ष्य है, जबकि यह ऑनलाइन रिटेल और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र पर महत्वपूर्ण असर डालेगा। लेकिन इसे अभी मंजूरी नहीं मिली है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि ऑपरेटर को विजुअल लाइन ऑफ साइट के परे संचालन की जरूरत होती है और उड़ान भरते वक्त खुद ड्रोन को पेलोड जारी करना होता है, पर इन दोनों को ड्रोन नियामक में स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित किया गया है।
 
हालांकि उम्मीद है कि नियामकों के बाद के संस्करण में उद्योग के अनुभवों को ध्यान में रखा जा सकता है और संचालन की स्वीकृति के दायरों को बढ़ाया जा सकता है, तभी फिलहाल प्रतिबंधित संचालनों को अनुमति मिल सकती है। डीजीसीए ने पूरे देश में टेस्ट साइट्स का एक सेट तैयार किया है, जहां ड्रोन निर्माता और ऑपरेटर एक सुरक्षित वातावरण में नवाचार कर सकते हैं। लेकिन यह सवाल बचा हुआ है कि ड्रोन नियामक ड्रोन उद्योग की गति बनाए रखने में सक्षम होगा या नहीं। तकनीकी मुद्दों के अलावा एक सामाजिक मुद्दा यह है कि वर्तमान में तैयार नियमों में समावेशन का ध्यान नहीं रखा गया है। ड्रोन का इस्तेमाल भारत की एक बड़ी ग्रामीण आबादी के लिए प्रासंगिक है। मसलन, खेतिहर समुदाय वानस्पतिक तनाव, जंगली पशुओं द्वारा फसलों की बर्बादी रोकने, कीटनाशकों व उर्वरकों के छिड़काव के लिए सहकारी रूप से ड्रोन का संचालन कर सकते हैं। वर्तमान में तैयार नियमों के अनुसार, ड्रोन उड़ाने की अनुमति प्राप्त करने में शामिल प्रक्रियाओं और फीस कंपनियों की मदद लिए बिना उनके लिए बहुत मुश्किल होगा, जिसके चलते ऐसे संचालन की लागत में वृद्धि होगी। मौजूदा नियम भारत के गैर सरकारी संगठनों एवं ग्रामीण समुदायों की तुलना में स्टार्ट अप और निगमों के लिए ज्यादा अनुकूल है, जिसे नियामकों के भावी संस्करण में सुधारने की जरूरत है। यह स्पष्ट है कि भारत अपने नागरिक हवाई क्षेत्र में ड्रोन को शामिल करने और समाज में ड्रोन के इस्तेमाल के लिए तैयार है, जैसा कि चार साल पहले भी स्पष्ट था। हालांकि भारत में ऐसे असंख्य लोग हैं, जिन्होंने आज तक उड़ान भरने वाले रोबोट को सक्रिय नहीं देखा है। पर हो सकता है कि अगले पांच वर्ष में ऐसी स्थिति न रहे।

देश के भीतर कानूनी रूप से ड्रोन संचालन की सीमा भविष्य में बढ़ेगी। ड्रोन को केवल उन्हीं लोगों तक सीमित नहीं होना चाहिए, जिनके पास पूंजी है, क्योंकि इससे भारतीय समाज में मौजूद असमानताओं में वृद्धि होगी। इसलिए यह जरूरी है कि ड्रोन उद्योग के बाहर के ज्यादा प्रतिनिधि, जैसे नागरिक संगठन, पैरोकार समूह आदि भारत के भावी ड्रोन रेगुलेशन को तैयार करने में शामिल हों, जिससे ड्रोन का उपयोग व्यापक आबादी की भलाई के लिए होना सुनिश्चित किया जा सके।

-लेखक अनुभवी ड्रोन पायलट एवं टेक्नोलॉजी फॉर वाइल्ड लाइफ के संस्थापक हैं। 
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