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गांव बचाने से ही निकलेगा रास्ता

Fri, 30 Sep 2016 07:20 PM IST
अनिल प्रकाश जोशी
अनिल प्रकाश जोशी Updated Fri, 30 Sep 2016 07:20 PM IST
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The only way to save the village yield
अनिल प्रकाश जोशी

राज्य का दर्जा मिलने से बहुत पहले ही उत्तराखंड अपनी एक अलग पहचान रखता है। बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम तथा गंगा और यमुना के  उद्गम के कारण ही नहीं, अपनी नैसर्गिकता के कारण इसका विशिष्ट पहचान है। फूलों की घाटी, औली, पिढर जैसे अद्भुत स्थल इसी क्षेत्र के हिस्से में आए। यही नहीं, पहले के नीतिकारों और अंग्रेजों ने इसके भौगोलिक महत्व को समझते हुए देश के प्रमुख संस्थान भी यहां स्थापित किए। भारतीय सैन्य अकादमी, लाल बहादुर प्रशासनिक अकादमी, भारतीय वन्य संस्थान जैसे प्रमुख संस्थानों को उत्तराखंड में जगह मिली। उत्तराखंड जब उत्तर प्रदेश का हिस्सा था, तब भी इन्हीं विशिष्टताओं के कारण उसे तवज्जो दी जाती रही। पर इसका मतलब यह नहीं था कि इसे राज्य का दर्जा नहीं चाहिए था।

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उत्तराखंड आंदोलनों की भी जमीन है। राज्य के लिए हुए आंदोलन के साथ ही चिपको आंदोलन ने सारी दुनिया का ध्यान खींचा था। इसके साथ ही जल, जंगल और जमीन के लिए होने वाले आंदोलनों की वजह से ही इस क्षेत्र को एक जागरूक समाज का भी दर्जा दिया गया। इस प्रदेश ने केसी पंत, हेमवती नंदन बहुगुणा और नारायण दत्त तिवारी जैसे कद्दावर नेता भी दिए हैं।
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इतने गुणों, प्राकृतिक संसाधनों और विशिष्टताओं से लैस शायद ही कोई और प्रदेश है। अलग राज्य की मांग के पीछे इस क्षेत्र की विषम भौगोलिक परिस्थितियां एक बड़ा कारण थी। राज्य बनने के सोलह वर्षों बाद आज हालात बदतर दिखाई देते हैं, ऐसा लगता है कि राज्य अपनी विशिष्टताओं के प्रति उदासीन हो गया है। परिस्थितियां पूरी तरह से बदल गई हैं। जो पहले था, वह भी नहीं बचा। राज्य बनने की सारी लड़ाई और बलिदान सब ढेर-सा हो गया है। वे सारे मूल्य और सपने जो उत्तराखंडियों ने देखे थे, धाराशायी हो गए। राज्य 16 वर्षों में पूरी तरह बदल गया। एक अजीब-सी लूट-खसोट का महौल तैयार हुआ। शराब, खनन, रियल स्टेट जैसे बड़े धंधेबाजों की जमीन मजबूत हुई है। इस राज्य की शक्ल तेजी से बदली है। अनजाने चेहरों ने बड़ी पकड़ बना ली और पुरानी पहचानी शक्लें अनजान हो गईं। नैतिकता ने सबको छोड़ दिया, इनमें मात्र राजनेता ही पहली पंक्ति में नहीं थे, बल्कि उनके नारों ने लोगों को भी बांट दिया। देवभूमि में नई पीढ़ी के दैत्यों ने जगह बना ली। जातिवाद और क्षेत्रवाद जैसे मुद्दे जो राज्य आंदोलन के दौरान भी थे, अब एक नए कलेवर में गहरी पैठ बना चुके हैं। हालात इतने बदतर हो चुके कि यहां के लोगों को यह राज्य अपना-सा नहीं लगता। बल्कि अब निराशाएं इस हद तक बढ़ चुकी हैं कि लोगों ने उत्तर प्रदेश के ही हिस्से को ज्यादा हितकारी मानना शुरू कर दिया।
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पहाड़ मुरझा गया है। राजनीतिक दलों ने हर बार सपने दिखाए और अपना उल्लू सीधा किया। निराश गांव सारी तरह की आशाएं छोड़ चुके और अब उनकी आखों में कोई सपने नहीं उतरते। छल-कपट की राजनीति ने हर तरह के विश्वास छीन लिए। टूटते और वीरान पड़ते गांवों पर इसी दौरान हर तरह की मार पड़ी। प्रकृति का कहर भी इन्हीं के पल्ले पड़ता गया और राज्य को आपदा राज्य का भी दर्जा मिल गया। आपदाओं में केंद्र या अन्य जगह की सहायताओं के हश्र की कहानी सभी जानते हैं, कि किस तरह से अनैतिक लूट हुई। हालात ये है कि गांव-गरीबों की कोई सुनवाई नहीं। जिन्हें खदेड़-खदेड़कर राज्य आंदोलन में जनशक्ति के प्रदर्शन के लिए जुटाया गया था, वे आज पहले से भी बदतर हालात में पहुंच गए, और अपने ही राज्य में अनजाने हो गए। सुनवाई की गुहार जिनसे करनी थी, वे आश्वासनों और घोषणाओं से बाहर निकल नहीं पाए। राज्य को एक भी ऐसा नेतृत्व नहीं मिला, जिस पर भरोसा किया जा सकता हो। सबने अपनी-अपनी बारी में लूट में कोई कसर नहीं छोड़ी।

इन सबके बीच असंतुष्ट नेताओं ने या अवसरवादियों ने नए विकल्प की ताल ठोकने की कोशिश की और देखते ही देखते कई राजनीतिक दल भी खड़े हो गए। इनमें से कई तरह के ऐसे चेहरे भी नेता बनने के लिए आगे आए, जिन्हें शायद यह भी पता नहीं कि इस राज्य का इतिहास क्या है, और यहां कितने गांव हैं और कैसी परिस्थितियां हैं। फिर इन नए राजनीतिक दलों में दो बातें साफ दिखाई देती हैं। पहला यह कि ये पहाड़ की पीड़ा से ज्यादा महत्वाकांंक्षाओं से उपजे हैं और दूसरा इनमें जन मुद्दों की समझ का अभाव है। सबसे बड़ी बात यह है कि ये एकजुट होकर एक आवाज नहीं बनना चाहते। ये लोगों का विश्वास जुटा पाएंगे, इसमें पूरी शंका बनी है। पर एक स्थानीय विकल्प की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता।

इन सब बातों के बीच एक बड़ा सवाल फिर भी है कि इस राज्य के जागरूक संगठन, व्यक्ति व समाजसेवी कैसे मूक रह सकते है? सोलह वर्षों में यह राज्य कहां से कहां पहुंच गया? ऐसे में उनकी चुप्पी के कौन से मतलब निकाले जाने चाहिए? उत्तराखंड की राजनीति व जागरूक लोग कई सवालों से घिरे हैं। इनमें सबसे बड़ा सवाल यह ही है कि उत्तराखंड राज्य किसके लिए मांगा था? आज के हालात के लिए किसे जिम्मेदार माना जाए और देवभूमि के लोग कैसे मूकदर्शक बने हुए हैं? राज्य जरूर बन गया, पर आज भी लड़ाई जारी है। पहले लखनऊ और केंद्र की सरकारों की आलोचना होती थी, अब अपने ही गैरों से बदतर निकले। अब जनता का इनसे ही लड़ाई का मूड भी तैयार हो रहा है। पहली लड़ाई फिर भी सरल थी, क्योंकि उत्तराखंड के लोग अवहेलना के शिकार थे, पर अब यह लड़ाई इसलिए कठिन है, क्योंकि अपनों से ही जूझना है, जिसमें हम दुनिया में उपहास के भी कारण बनेंगे।


एक बार फिर राज्य चुनाव की तैयारी में है। दोनों ही मुख्य दलों ने कमर कस ली है। छोटी-मोटी अन्य पार्टियां भी होड़ में लगी हैं। फिर घोषणाएं, वायदे, सौदे की शुरुआत हो चुकी है। तमाम तरह के दावे शुरू हो गए हैं। एक बार फिर गांवों से छल-कपट की राजनीति रास्ता बना रही है। अब ऐसा ही चलता रहा, तो फिर एक बार कोई जीतेगा, पर हर बार की तरह हार लोगों की ही होगी। फिर रास्ता किधर है? रास्ता गांधी के पास है। उत्तराखंड के लोग एक बार फिर दो अक्टूबर (गांधी जयंती) से गांव बचाओ यात्रा पर निकल रहे हैं।

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