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Inflation: घटती महंगाई का संदेश,  मुद्रास्फीति की दर न्यूनतम स्तर पर

Sat, 14 Jan 2023 05:34 AM IST
Prahlad Sabnani प्रहलाद सबनानी
Updated Sat, 14 Jan 2023 05:34 AM IST
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सार
केंद्र सरकार ने भी कई आवश्यक वस्तुओं के निर्यात को रोकने के उद्देश्य से निर्यात करों में वृद्धि की है, ताकि इन पदार्थों की घरेलू बाजार में उपलब्धता बनी रहे।
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The message of decreasing inflation, inflation rate at the lowest level
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

विस्तार

दिसंबर, 2022  में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति की दर पिछले 12 माह के न्यूनतम स्तर 5.72 प्रतिशत पर आ गई है। यह मुख्य रूप से सब्जियों की दरों में आई कमी के चलते संभव हो सका है। राष्ट्रीय सांख्यिकीय कार्यालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, खाद्य पदार्थों में महंगाई दर दिसंबर, 2022 में 4.19 प्रतिशत रही, जो नवंबर, 2022 में 4.67 प्रतिशत थी। दरअसल भारत का कृषक अब जागरूक हो गया है और नई तकनीक का उपयोग करके उत्पादन करने लगा है। अब आवश्यकतानुसार पदार्थों का उत्पादन बढ़ाया जा रहा है, जिससे बाजार में पदार्थों की आपूर्ति बढ़ रही है एवं मुद्रास्फीति पर अंकुश लग रहा है। सब्जियों के अलावा अन्य खाद्य पदार्थों में भी महंगाई दर दिसंबर, 2022 में कम हुई है। भारत में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति दर लगातार दूसरे महीने में छह प्रतिशत के नीचे रही।



केंद्र सरकार ने भी कई आवश्यक वस्तुओं के निर्यात को रोकने के उद्देश्य से निर्यात करों में वृद्धि की है, ताकि इन पदार्थों की घरेलू बाजार में उपलब्धता बनी रहे। कुल मिलाकर बाजार  में उत्पादों की पर्याप्त उपलब्धता पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, ताकि वस्तुओं के दाम न बढ़ें। लगातार बढ़ रही मुद्रास्फीति दर से विश्व के लगभग सभी देश परेशान हैं और कई विकसित देश तो इस पर नियंत्रण करने के लिए ब्याज दरों में लगातार वृद्धि करते जा रहे हैं, ताकि नागरिकों के हाथ में कम धन रहने पर बाजार में उत्पादों की मांग कम हो। उत्पादों की मांग में कमी के चलते उत्पादन में कमी होती दिखाई दे रही है, जिसके चलते कंपनियां कर्मचारियों की छंटनी करने में लग गई हैं।


सामान्यतः बाजार में जब किसी वस्तु की उपलब्धता बढ़ जाती है, तो उसका मूल्य घट जाता है और कीमत के घटने पर उस वस्तु का निर्माण करने वाली कंपनियों के लाभ पर विपरीत असर दिखाई देने लगता है। इसलिए पूंजीवादी विकसित देश यह प्रयास करते हैं कि वस्तुओं की उपलब्धता बाजार में नियंत्रित रहे, ताकि इन वस्तुओं की कीमत कम होने पर लाभ पर विपरीत असर न पड़े। मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए भी बाजार में वस्तुओं की उपलब्धता बढ़ाने के बजाय वस्तुओं की मांग कम करने के प्रयास किए जा रहे हैं। इस तरह के प्रयासों से बाजार में मंदी फैलती है, बेरोजगारी बढ़ती है। मध्यम वर्ग के लाखों परिवार इस कारण से गरीबी रेखा के नीचे फिसल जाते हैं। 

लेकिन भारतीय आर्थिक चिंतन में विपुलता की अर्थव्यवस्था के बारे में सोचा गया है, अर्थात अधिक से अधिक उत्पादन करो। विपुलता की अर्थव्यवस्था में नागरिकों को उपभोक्ता वस्तुएं आसानी से उचित मूल्य पर मिलती हैं, और उत्पादों के मूल्य बढ़ने के स्थान पर घटते रहते हैं। वर्ष 1929-30 में पश्चिमी देशों में मंदी आने पर वस्तुओं के मूल्य गिर गए थे। मूल्य गिरने से इन उत्पादों का निर्माण करने वाली कंपनियों के लाभ कम हो गए। बाजार में वस्तुओं के दाम कम होने से सर्वसामान्य नागरिक की सुविधा बढ़नी चाहिए और वह बढ़ती भी है। परंतु पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में सामान्य नागरिक की सुविधा के बारे में विचार नहीं किया जाता है, केवल कंपनियों के लाभ बढ़ने-घटने पर विचार किया जाता है। इस प्रकार भारतीय आर्थिक चिंतन एवं  पूंजीवादी आर्थिक चिंतन धाराओं में बहुत अंतर है। आज यदि सर्वे भवंतु सुखिनः का लक्ष्य पूरा करना है, तो विपुलता की अर्थव्यवस्था अधिक ठीक है, न कि जानबूझकर अकाल का निर्माण करने वाली पूंजीवादी अर्थव्यवस्था। 

इसलिए विकसित देशों को ब्याज दरों में वृद्धि करके मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के बजाय बाजार में वस्तुओं की उपलब्धता बढ़ाकर मुद्रास्फीति पर नियंत्रण करना चाहिए। भारतीय आर्थिक चिंतन को अपनाकर पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में आ रही विभिन्न समस्याओं पर भी काबू पाया जा सकता है।

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