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शेयर बाजार में आया उछाल क्या बताता है

Tue, 11 Mar 2014 08:26 PM IST
जयंतीलाल भंडारी
जयंतीलाल भंडारी Updated Tue, 11 Mar 2014 08:26 PM IST
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The meaning of swing in share market

केंद्र में नई सरकार के बारे में स्थिति तो चुनावी नतीजे आने के बाद ही पता चलेगी, पर 16वीं लोकसभा के चुनाव की घोषणा और चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों से केंद्र में बिजनेस फ्रेंडली स्थिर सरकार बनने के संकेतों ने बाजार में आर्थिक उत्साह पहले ही बना दिया है। इसी कारण सेंसेक्स के साथ निफ्टी ने भी आसमानी छलांग लगाई है। मुंबई शेयर बाजार का सेंसेक्स 10 मार्च को कारोबार के दौरान उछलकर 22,000 के स्तर को पार कर गया था। सेंसेक्स को बने 28 साल हुए हैं, तब से अब तक की यह सबसे बड़ी ऊंचाई है। इसी तरह नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का मुख्य सूचकांक निफ्टी भी पहली बार 6,500 के पार चला गया। विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) द्वारा शेयरों की ताबड़तोड़ लिवाली किए जाने से ही घरेलू बाजारों में ट्रेडिंग की जबरदस्त तरंग दौड़ने लगी है। विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले एक महीने में अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले भारतीय शेयर बाजार के प्रति विदेशी संस्थागत निवेशक कहीं ज्यादा आकर्षित हैं। खासकर रुपये की सुधरती सेहत और चालू खाता घाटे में आई कमी ने उनका मनोबल बढ़ा दिया है।

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बार-बार सुझाव दिया जा रहा है कि तेज विकास के लिए नई सरकार को मैन्यूफैक्चरिंग, ऊर्जा, कृषि, निर्यात और सेवा क्षेत्र में सुधार के बड़े कदम उठाने होंगे। आर्थिक सुधारों के बाद का अनुभव यह है कि जब-जब केंद्र में मजबूत सरकार बनी है, विकास दर तेजी से बढ़ी है। राजग और उसके बाद यूपीए के पहले कार्यकाल में त्वरित आर्थिक फैसलों के कारण अर्थव्यवस्था की विकास दर करीब सात फीसदी से अधिक पर पहुंची। लेकिन यूपीए का दूसरा कार्यकाल हताशाजनक ही रहा। ऐसे में देश का उद्योग और कारोबार जगत विकास के लिए बिजनेस फ्रेंडली सरकार की संभावनाओं के लिए अपना समर्थन देते हुए दिखाई दे रहे हैं।
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इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च ने इस महीने की अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि 2014-15 में देश की अर्थव्यवस्था 5.6 फीसदी की दर से आगे बढ़ेगी। हालांकि इस वर्ष तो विकास दर पांच फीसदी से कम रहने का ही अनुमान है। दरअसल यूपीए के शुरुआती सात वर्षों में जो कुछ विकास देखने को मिला, वह वैश्विक अर्थव्यवस्था में उस समय व्याप्त तेजी और 2004 से पहले उठाए गए आर्थिक सुधार संबंधी कदमों के कारण था। उसके बाद लोकसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में यूपीए के लोकलुभावन कदमों की वजह से राजकोषीय और राजस्व घाटे का स्तर बढ़ा। दरअसल 2003-08 के दौरान हासिल की गई ऊंची वृद्धि मुख्यतः उससे पहले दस-बारह वर्षों में किए गए प्रयासों का परिणाम थी। अब लोकसभा चुनाव के बाद बनने वाली नई सरकार द्वारा विकास को गति देने के लिए संरचनात्मक सुधारों के तेज कदम उठाने होंगे। कारोबारी माहौल में सुधार लाना होगा। विकास दर की दयनीय स्थिति को देखते हुए ब्याज दरों में वृद्धि पर अब विराम लगाना चाहिए।
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नई सरकार को संस्थागत विदेशी निवेशकों का रुख और सकारात्मक बनाना होगा। देश में मौजूद कुल शेयर पूंजी का तकरीबन 90 फीसदी हिस्सा ऐसे निवेशकों के पास है, जिनका भारत में निवेश लाभ-हानि की कसौटी पर निर्भर करता है। लिहाजा नई सरकार को आर्थिक जोखिमों से अवगत रहते हुए ऐसे काम करने होंगे, जिनसे विदेशी निवेशकों का विश्वास कायम रहे। पिछले कुछ समय से कई विदेशी कंपनियां भारत में अधिग्रहण करने को लालायित हैं। उनके सामने नई सरकार की नीतियों को लेकर स्थिति स्पष्ट होगी, तभी देश में अधिग्रहण एवं विलय गतिविधियों में तेजी की संभावना बनेगी। जाहिर है, आर्थिक मोर्चे पर ठोस कदम उठाने से ही देश फिर उच्च विकास दर की डगर पर आगे बढ़ेगा।

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