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लीमा में बनी सहमति का मतलब

Wed, 17 Dec 2014 08:23 PM IST
कोरल डेवेनपोर्ट
कोरल डेवेनपोर्ट Updated Wed, 17 Dec 2014 08:23 PM IST
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The meaning of Leema agreement

यह इतिहास में पहली बार हुआ है। विगत रविवार को लीमा में वार्ताकार इस पर राजी हो गए कि सभी देश ग्रीन हाउस गैस की उत्सर्जन दर को कम करने का प्रयास करेंगे। हालांकि अब भी यह ग्लोबल वार्मिंग के खतरनाक और खर्चीले प्रभाव से खुद को बचाने का छोटा प्रयास ही होगा। मगर लीमा में 196 देशों के प्रतिनिधियों ने उस मसौदे को कुबूल कर लिया है, जिस पर अगले वर्ष पेरिस में हस्ताक्षर होने हैं।

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संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी इस मसौदे को शुक्रवार को ही सार्वजनिक करने वाले थे, लेकिन अमीर और गरीब देशों के बीच तकरार की वजह से रविवार तक मामला टलता रहा। नए मसौदे के अनुसार, अगले छह महीने के अंदर सभी देशों को ग्लोबल वार्मिंग कम करने को लेकर घरेलू नीतियां बनानी होंगी। यही नीतियां 2015 के पेरिस समझौते का आधार होंगी, जो 2020 में प्रभावी होंगी। यह एक बेहतर ग्लोबल वार्मिंग समझौते को लेकर उस राजनीतिक गतिरोध का टूटना है, जिसे खत्म करने के लिए संयुक्त राष्ट्र पिछले 20 वर्षों से प्रयास कर रहा था। अब तक सारी चर्चाएं क्योटो प्रोटोकॉल के आधार पर ही होती रही थीं, जिसे लेकर विकसित और विकासशील देशों में मतभेद रहा है। इसमें विकसित देशों को बाध्य किया गया था, मगर चीन और भारत जैसे दो बड़े ग्रीन हाउस उत्सर्जक देश इससे मुक्त थे।
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शोध करने वाली एक अंतरराष्ट्रीय संस्था द वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट से जुड़ी जेनिफर मॉर्गन कहती हैं, 'यह नया समझौता अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक ऐसा नया रूप है, जिसमें सभी देश शामिल हैं। इसलिए कहना अतिशयोक्ति नहीं कि पेरिस का नया वैश्विक समझौता बस मुट्ठी में ही है।' हालांकि लीमा की राजनीतिक सफलता से भी समझौते का यह घोषित लक्ष्य स्वतः नहीं पाया जा सकता कि महज वैश्विक उत्सर्जन को कम करने से ही 3.6 डिग्री फारेनहाइट से ज्यादा बढ़ रही वैश्विक गर्मी से धरती को बचाया जा सकता है। यही वजह है कि समुद्री जलस्तर बढ़ने, समुद्री बर्फ के पिघलने, बाढ़ और अकाल बढ़ने, खाद्यान्न और जल की कमी और अत्यधिक तूफान जैसे खतरनाक और अपरिवर्तनीय प्रभावों में धरती के डूबने की आशंका वैज्ञानिक जता रहे हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि जिन प्रतिबद्धताओं की बात मसौदे में कही गई है, वे उन प्रयासों के आधे हैं, जो 3.6 डिग्री फारेनहाइट की वृद्धि रोकने के लिए जरूरी हैं। इसलिए समझौते में तापमान में हो रही वृद्धि को रोकने के लिए उत्सर्जन कम करने का स्तर दोगुना करना होगा। हालांकि लीमा समझौते के बाद अब गेंद देशों की संसदों तथा ऊर्जा, आर्थिक और पर्यावरण मंत्री अथवा मंत्रालयों के पाले में है कि वे कार्बन कटौती को लेकर अपना दायित्व कितना पूरा कर पाते हैं।
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पर्यावरण को लेकर काम करने वाली कुछ संस्थाओं ने नए मसौदे की 'नरम' भाषा की आलोचना की है। उनका कहना है कि इस दिशा में कठोर पारदर्शी प्रयासों की जरूरत है। मसलन, उत्सर्जन में जब से कटौती की जाएगी, उसका एक ही टाइम टेबल और एक ही बेस लाइन वर्ष होगा। लीमा समझौते में सरकारों को इन मापकों के इस्तेमाल की बात तो कही गई है, लेकिन इसे जरूरी नहीं बताया गया है। इसलिए यूनियन ऑफ कंसर्न्ड साइंटिस्ट्स के प्रमुख अल्डेन मेयर कहते हैं, 'हमें जितने प्रयासों की आवश्यकता है, उस लिहाज से यह काफी कम है। मगर इन समझौतों के साथ ही हम बढ़ना चाहेंगे, ताकि दबाव बन सके।' मेयर और अन्य विशेषज्ञ गैर सरकारी समूहों, अनुसंधान संस्थानों और विश्वविद्यालयों की वकालत करते हैं, ताकि वे देशों की कार्बन कटौती नीतियों की स्वतंत्र समीक्षा कर यह बता सकें कि तुलनात्मक रूप से उनकी नीति कितनी तर्कसंगत है।

बहरहाल, इससे इन्कार नहीं कि अमेरिका और चीन में हुआ पर्यावरण समझौता ही लीमा समझौते के लिए उत्प्रेरक बना। ग्रीन हाउस गैसों के दो सबसे बड़े उत्सर्जक देशों के मुखिया अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने को लेकर पिछले दिनों समझौता किया था। इसी समझौते ने तय किया कि गरीबों की बड़ी आबादी होने के बाद भी विकासशील देशों को कार्बन कटौती के गंभीर प्रयास करने चाहिए। इसलिए लीमा में चीन के राष्ट्रीय विकास और सुधार आयोग के उप मंत्री शी जेन्हुआ ने कहा कि इसकी सफलता ने पेरिस की सफलता के लिए एक अच्छी नींव रख दी है।

ग्रीन हाउस गैस के तीसरे सबसे बड़े उत्सर्जक देश भारत ने भी लीमा समझौते की तारीफ की है। पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का कहना है, भारत इसे लेकर सहमत है। हालांकि बढ़ रहे कार्बन प्रदूषण में शुद्ध कटौती को लेकर प्रतिबद्धता जताने से भारत ने इन्कार किया है। उसका कहना है कि सस्ते कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के इस्तेमाल में कटौती नहीं होनी चाहिए, क्योंकि लाखों गरीब भारतीय अब भी बिजली के बिना रहते हैं। लेकिन उसने यह संकेत जरूर दिया है कि उत्सर्जन की अपनी दर को कम करने के लिए वह योजना बनाने का इरादा रखता है।


हालांकि लीमा समझौते के बाद सभी देशों के लिए यह जरूरी हो जाएगा कि उत्सर्जन को कम करने को लेकर वे योजना प्रस्तुत करें, पर उनकी अर्थव्यवस्था के आकार के मुताबिक योजनाओं का चरित्र अलग-अलग हो सकता है। अमेरिका जैसे विकसित देशों से यह उम्मीद है कि वे इन योजनाओं के साथ सामने आएंगे कि आखिर कैसे 2020 के बाद वे अपने उत्सर्जन का स्तर नीचे ले जाएंगे। इसी तरह चीन जैसी बड़ी, लेकिन विकासशील अर्थव्यवस्था वह वर्ष स्पष्ट करेगी, जो उत्सर्जन के लिहाज से उनका शिखर होगा। जबकि गरीब अर्थव्यवस्था से ऐसी योजनाओं की उम्मीद होगी, जिसमें उनके प्रदूषण बढ़ाने की बात तो होगी, पर उसकी दर धीमी रहेगी।

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