{"_id":"5d054a918ebc3e57f539951c","slug":"the-future-of-hong-kong-and-freedom","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"हांगकांग और आजादी का भविष्य : लोग इतने भी मूर्ख नहीं हैं कि चीन की चालाकी न समझ पाएं","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया","slug":"opinion"}}
हांगकांग और आजादी का भविष्य : लोग इतने भी मूर्ख नहीं हैं कि चीन की चालाकी न समझ पाएं
Sun, 16 Jun 2019 01:14 AM IST
Avdhesh Kumar
ब्रेट स्टीफेंस
ब्रेट स्टीफेंस
Published by: Avdhesh Kumar
Updated Sun, 16 Jun 2019 01:14 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
हॉन्ग कॉन्ग-झुहाई-मकाउ पुल
- फोटो : social media
इसकी कल्पना करें कि ट्रंप प्रशासन ने अगर 2018 में ऐसा कोई कानून बनाया होता, जिसके तहत सरकार के पास ऐसे किसी भी अमेरिकी को गिरफ्तार करने और उसके खिलाफ मुकदमा चलाने का अधिकार होता, जो संदिग्ध अवस्था में अश्वेतों की आबादी के आसपास मंडराते पाए जाते, तो क्या होता। यह भी कल्पना करें कि अमेरिकी उस कानून का विरोध करते, लेकिन बदले में उनका सामना आंसू गैस और रबड़ की गोलियों से होता, तो क्या होता। और अंत में यह भी कल्पना करें कि अमेरिका में उस कानून को रोकने और संविधान की भावना को बचाए रखने के लिए प्रभावी न्यायपालिका नहीं होती, तो क्या होता।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
इसकी कल्पना करें कि ट्रंप प्रशासन ने अगर 2018 में ऐसा कोई कानून बनाया होता, जिसके तहत सरकार के पास ऐसे किसी भी अमेरिकी को गिरफ्तार करने और उसके खिलाफ मुकदमा चलाने का अधिकार होता, जो संदिग्ध अवस्था में अश्वेतों की आबादी के आसपास मंडराते पाए जाते, तो क्या होता। यह भी कल्पना करें कि अमेरिकी उस कानून का विरोध करते, लेकिन बदले में उनका सामना आंसू गैस और रबड़ की गोलियों से होता, तो क्या होता। और अंत में यह भी कल्पना करें कि अमेरिका में उस कानून को रोकने और संविधान की भावना को बचाए रखने के लिए प्रभावी न्यायपालिका नहीं होती, तो क्या होता।
हांगकांग में इस सप्ताह यही हुआ। लगभग दस लाख लोग उस कानून के खिलाफ सड़कों पर उतर आए, जो स्थानीय अधिकारियों को किसी भी ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार करने और चीन में प्रत्यर्पित करने का अधिकार देता है, जो कुल 37 तरह के अपराधों में से किसी एक को अंजाम देता है। हालांकि राजनीतिक अपराध को इस सूची में नहीं रखा गया है, लेकिन हांगकांग के लोग इतने भी मूर्ख नहीं हैं कि चीन की चालाकी न समझ पाएं। राजनीतिक विरोधियों पर आपराधिक आरोप लगाना बीजिंग के लिए बाएं हाथ का खेल है। बल्कि वह इस तरह के लोगों को तब तक के लिए गायब करवा देता है, जब तक कि वे अपना अपराध न स्वीकार कर लें।
वर्ष 2015 में ही चीनी अधिकारियों ने हांगकांग के पांच पुस्तक विक्रेताओं का अपहरण कर लिया और महीनों तक उन्हें गोपनीय जगह में छिपाकर रखा, जब तक कि उन्होंने अपना अपराध स्वीकार नहीं कर लिया। उन पुस्तक विक्रेताओं पर चीन-विरोधी संवेदनशील किताबें अपने पास रखने और बेचने का आरोप था। ऐसे ही वर्ष 2017 में चीनी अधिकारियों ने अपने ही एक अरबपति कारोबारी जियाओ जिन्हुआ का हांगकांग से अपहरण कर लिया। तब से उन्हें देखा नहीं गया है।
ताजा प्रत्यर्पण कानून चीन के दमनकारी शासन का ताजा उदाहरण है, हालांकि यह हांगकांग में उसकी तानाशाही का आखिरी उदाहरण नहीं है। चूंकि बहुलतावाद को बीजिंग अपने लिए खतरा मानता है, इसलिए वह ऐसी कोई गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहता, जिससे हांगकांग को लगे कि वह स्वतंत्र है और अपना शासन खुद चला सकता है।
हांगकांग में इस सप्ताह यही हुआ। लगभग दस लाख लोग उस कानून के खिलाफ सड़कों पर उतर आए, जो स्थानीय अधिकारियों को किसी भी ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार करने और चीन में प्रत्यर्पित करने का अधिकार देता है, जो कुल 37 तरह के अपराधों में से किसी एक को अंजाम देता है। हालांकि राजनीतिक अपराध को इस सूची में नहीं रखा गया है, लेकिन हांगकांग के लोग इतने भी मूर्ख नहीं हैं कि चीन की चालाकी न समझ पाएं। राजनीतिक विरोधियों पर आपराधिक आरोप लगाना बीजिंग के लिए बाएं हाथ का खेल है। बल्कि वह इस तरह के लोगों को तब तक के लिए गायब करवा देता है, जब तक कि वे अपना अपराध न स्वीकार कर लें।
वर्ष 2015 में ही चीनी अधिकारियों ने हांगकांग के पांच पुस्तक विक्रेताओं का अपहरण कर लिया और महीनों तक उन्हें गोपनीय जगह में छिपाकर रखा, जब तक कि उन्होंने अपना अपराध स्वीकार नहीं कर लिया। उन पुस्तक विक्रेताओं पर चीन-विरोधी संवेदनशील किताबें अपने पास रखने और बेचने का आरोप था। ऐसे ही वर्ष 2017 में चीनी अधिकारियों ने अपने ही एक अरबपति कारोबारी जियाओ जिन्हुआ का हांगकांग से अपहरण कर लिया। तब से उन्हें देखा नहीं गया है।
ताजा प्रत्यर्पण कानून चीन के दमनकारी शासन का ताजा उदाहरण है, हालांकि यह हांगकांग में उसकी तानाशाही का आखिरी उदाहरण नहीं है। चूंकि बहुलतावाद को बीजिंग अपने लिए खतरा मानता है, इसलिए वह ऐसी कोई गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहता, जिससे हांगकांग को लगे कि वह स्वतंत्र है और अपना शासन खुद चला सकता है।
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने जब तत्कालीन सोवियत संघ को 'आधुनिक विश्व की बुरी ताकत' कहा था, तब एक चर्चित उदारवादी लेखक ने उनकी घोर आलोचना करते हुए उन्हें आदिम कहा था। रीगन की आलोचना ने तब उनके विरोधियों और सपने देखने वालों को नई ताकत दे दी थी। तब के मुक्त विश्व की आज की दुनिया से तुलना करें, तो निराशा होती है। विगत बुधवार को पोलिश राष्ट्रपति एंड्रजेज द्यूजा के साथ बैठे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हांगकांग में हुए आंदोलन पर बस इतना कहा कि मुझे पूरा विश्वास है, वे इस संकट से खुद को बाहर निकाल ले जाएंगे।
ट्रंप और द्यूजा, दोनों नए राष्ट्रवाद के चैंपियन हैं, जिसका एक सिद्धांत यह है कि आप दूसरों के मामले में हस्तक्षेप न करो, तो दूसरे भी आपके कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। ट्रंप ने इस सिद्धांत का अब तक खूब इस्तेमाल किया है, चाहे वह सऊदी अरब का अपने संजीदा और स्टैंड लेने वाले पत्रकारों के साथ सुलूक रहा हो या उत्तर कोरिया का सभी के प्रति आक्रामक व्यवहार।
हांगकांग में नागरिक अधिकारों पर खुलेआम जिस तरह डाका डाला गया, उस पर ट्रंप ने कुछ ठोस क्यों नहीं कहा? क्योंकि ट्रंप को लगता है कि यह चीन का घरेलू मामला है। हांगकांग से संबंधित चीन का ताजा फैसला 1984 के ब्रिटिश-चीन साझा घोषणा का उल्लंघन है। इसके बावजूद ट्रंप चुप क्यों रहे? इसलिए कि उन्हें लगता है, यह उनका काम नहीं है, और 1984 की उस घोषणा का मसौदा तैयार करने वाले लोग स्वर्ग सिधार चुके हैं। इसका सीधा-सीधा मतलब यही है कि शी जिनपिंग बाहरी देशों की परवाह किए बगैर हांगकांग के मामले में जो चाहे फैसला कर सकते हैं।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हांगकांग को उम्मीदें छोड़ देनी चाहिए। जैसा कि विलियम मैकगर्न ने वॉल स्ट्रीट जर्नल के अपने कॉलम में लिखा, चीन का ताजा कदम कानून का पालन करने वाले लाखों हांगकांग वासियों को चीन का विरोधी बना देगा। यानी हांगकांग में चीन के विरोधियों की संख्या में भारी बढ़ोतरी होने जा रही है। लोकतंत्र को भले ही गलत नेतृत्व मिल जाए, लेकिन उसके पास तानाशाही व्यवस्था को शर्मसार करने का नैतिक विकल्प तो हमेशा रहेगा।
तानाशाही सत्ता के पास यह विकल्प नहीं होता। लचीला न होने के कारण वह लोगों के लिए डरावना तो है, लेकिन उसके टूटकर बिखरने का खतरा भी है। आज पूरी दुनिया लोकतांत्रिक मूल्यों का पतन देखने के लिए अभिशप्त है। मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति की अज्ञानता ने इस पूरे परिदृश्य को और भी दयनीय बना दिया है। लेकिन यह स्थिति हमेशा नहीं रहने वाली।
चीन अपनी जिस तानाशाही पर गर्व करता है, और जो उसके वैश्विक उत्थान का कारण है, उसकी कलई भी खुल गई है- इतना ताकतवर एक देश उन लोगों से डर रहा है, जो हांगकांग की सड़कों पर उसके तानाशाही तौर-तरीके के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।
ट्रंप और द्यूजा, दोनों नए राष्ट्रवाद के चैंपियन हैं, जिसका एक सिद्धांत यह है कि आप दूसरों के मामले में हस्तक्षेप न करो, तो दूसरे भी आपके कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। ट्रंप ने इस सिद्धांत का अब तक खूब इस्तेमाल किया है, चाहे वह सऊदी अरब का अपने संजीदा और स्टैंड लेने वाले पत्रकारों के साथ सुलूक रहा हो या उत्तर कोरिया का सभी के प्रति आक्रामक व्यवहार।
हांगकांग में नागरिक अधिकारों पर खुलेआम जिस तरह डाका डाला गया, उस पर ट्रंप ने कुछ ठोस क्यों नहीं कहा? क्योंकि ट्रंप को लगता है कि यह चीन का घरेलू मामला है। हांगकांग से संबंधित चीन का ताजा फैसला 1984 के ब्रिटिश-चीन साझा घोषणा का उल्लंघन है। इसके बावजूद ट्रंप चुप क्यों रहे? इसलिए कि उन्हें लगता है, यह उनका काम नहीं है, और 1984 की उस घोषणा का मसौदा तैयार करने वाले लोग स्वर्ग सिधार चुके हैं। इसका सीधा-सीधा मतलब यही है कि शी जिनपिंग बाहरी देशों की परवाह किए बगैर हांगकांग के मामले में जो चाहे फैसला कर सकते हैं।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हांगकांग को उम्मीदें छोड़ देनी चाहिए। जैसा कि विलियम मैकगर्न ने वॉल स्ट्रीट जर्नल के अपने कॉलम में लिखा, चीन का ताजा कदम कानून का पालन करने वाले लाखों हांगकांग वासियों को चीन का विरोधी बना देगा। यानी हांगकांग में चीन के विरोधियों की संख्या में भारी बढ़ोतरी होने जा रही है। लोकतंत्र को भले ही गलत नेतृत्व मिल जाए, लेकिन उसके पास तानाशाही व्यवस्था को शर्मसार करने का नैतिक विकल्प तो हमेशा रहेगा।
तानाशाही सत्ता के पास यह विकल्प नहीं होता। लचीला न होने के कारण वह लोगों के लिए डरावना तो है, लेकिन उसके टूटकर बिखरने का खतरा भी है। आज पूरी दुनिया लोकतांत्रिक मूल्यों का पतन देखने के लिए अभिशप्त है। मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति की अज्ञानता ने इस पूरे परिदृश्य को और भी दयनीय बना दिया है। लेकिन यह स्थिति हमेशा नहीं रहने वाली।
चीन अपनी जिस तानाशाही पर गर्व करता है, और जो उसके वैश्विक उत्थान का कारण है, उसकी कलई भी खुल गई है- इतना ताकतवर एक देश उन लोगों से डर रहा है, जो हांगकांग की सड़कों पर उसके तानाशाही तौर-तरीके के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।