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आर्थिक पुनरुत्थान की बुनियाद, 2020 रहा भारत के लिए आपदाओं का साल

Fri, 25 Dec 2020 03:44 AM IST
वरुण गांधी वरुण गांधी, भाजपा सांसद
वरुण गांधी, भाजपा सांसद Published by: वरुण गांधी Updated Fri, 25 Dec 2020 03:44 AM IST
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सार
  • इस साल को आपदाओं का साल कहा जा सकता है। लेकिन इस वर्ष कुछ ऐसी शुरुआतें हुई हैं, जो आर्थिक पुनरुत्थान की बुनियाद बनेगी। इस तरह के ढांचागत सुधारों ने हमें अपने सपनों के भारत के पुनरुद्धार और नवीनीकरण के लिए अच्छा मौका दिया है।
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The foundation of economic revival, 2020 is a year of disasters for India
लॉकडाउन के दौरान हैदराबाद - फोटो : PTI

विस्तार


यह साल भारत के लिए आपदाओं का साल कहा जा सकता है-बुरी खबरों की भरमार और कहीं उम्मीद की किरण नहीं। हालांकि, करीब से देखने पर हमें यह भी दिखता है कि इस साल कुछ ऐसी शुरुआतें हुई हैं, जो आर्थिक पुनरुत्थान की बुनियाद बनेंगी। आइए, इनमें से तीन प्रमुख मुद्दों-श्रम कानून, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा पर बात करते हैं। सबसे पहले श्रम क्षेत्र में वास्तविक ढांचागत सुधारों के लिए किए गए उपायों पर विचार करते हैं-नई औद्योगिक संबंध संहिता 300 कर्मचारियों वाली कंपनियों को बिना पूर्व-अनुमति के श्रमिकों को काम से हटाने की छूट देती है, जो नियोक्ताओं को ज्यादा लचीलापन देगा। इस कानून में पहले के तीन कानूनों को एक साथ मिला दिया गया है, जो सामूहिक सौदेबाजी और विवादों के समाधान के बारे में थे; साथ ही यह नौकरी से हटाए गए कर्मचारियों के लिए एक रि-स्किलिंग फंड बनाने का मौका देता है; इसके अलावा अब हड़ताल के लिए 14 दिन का नोटिस देना जरूरी होगा। व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और काम की स्थितियां संहिता, 2019  में 13 कानूनों को समाहित कर दिया गया है, जो कामगारों के लिए स्वास्थ्य, सुरक्षा और काम करने की स्थितियों को निर्देशित करते थे-यह राज्य सरकारों को नई फैक्टरियों को संहिता के प्रावधानों से छूट देने का अधिकार देती है, साथ ही, महिलाओं को नाइट शिफ्ट में काम करने का अधिकार देती है। प्रवासी कामगारों को भी अधिक सुरक्षा दी गई है, क्योंकि राज्य सरकारों के लिए अब ऐसे कामगारों का रिकॉर्ड रखना जरूरी होगा और उनको सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) का लाभ देना होगा। 

सामाजिक सुरक्षा दायरे के लिए जरूरी रजिस्ट्रेशन भी सिर्फ एक फॉर्म में सिमट गया हैं। संकट की घड़ी में ये अच्छे सुधार हैं। इस तरह के सुधारों से मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी, जिससे मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में ग्रीनफील्ड निवेश (नई शुरुआत के साथ उद्योग की स्थापना) को बढ़ावा मिलेगा। अब स्वास्थ्य के मोर्चे पर वैश्विक महामारी कोविड-19 से निपटने की चर्चा करते हैं। मार्च, 2020 में भारतीय समाचार जगत 'विशेषज्ञों' की बुरी भविष्यवाणियों से भरा हुआ था कि कुछ ही महीनों के भीतर भारत की लगभग 60 फीसद आबादी (करीब 70 करोड़ लोग) संक्रमित हो जाएगी (आधिकारिक तौर पर हम इस समय भी एक करोड़ की गिनती पर हैं; यहां तक कि अगर यह भी मान लें कि सभी मामलों की गिनती नहीं हुई, तो भी इसकी आशंका नहीं है कि हम उस चिंताजनक स्तर पर पहुंचें)।  इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के साथ काम करते हुए केंद्र सरकार ने राज्यों के साथ मिलकर अर्थव्यवस्था के लॉकडाउन से संभावित नुकसान के बावजूद 'कठोर लॉकडाउन' (दुनिया में सबसे सख्त) लागू किया। इसका फायदा मिला, क्योंकि भारत हेल्थकेयर सेवा और उत्पाद (जैसे कि मास्क, पीपीई किट आदि) मुहैया कराने की अपनी क्षमता का विस्तार करने में कामयाब हुआ। इससे सरकार की क्षमता बढ़ाने के वास्ते नीतिगत उपाय करने के लिए भरपूर समय भी मिल गया-यह याद रखना चाहिए कि भारत में आबादी के अनुपात में कोविड-19 मामलों की संख्या बड़े देशों से कम है।


वैक्सीन तैयारी के मोर्चे पर भी भारत किसी से पीछे नहीं है। सरकार ने तत्परता से विनियामक मंजूरी (क्लिनिकल ट्रायल प्रक्रियाओं के लिए जरूरी) देने के साथ जरूरी वैक्सीन तैयार करना मुमकिन बनाने के लिए सभी उपाय किए। इस दौरान भारतीय फर्मों को क्लिनिकल ट्रायल करने वाले प्रमुख अनुसंधान संस्थानों के साथ गठजोड़ करने के लिए प्रोत्साहित किया गया, और वैक्सीन उत्पादन क्षमता का इस्तेमाल दुनिया के लिए करने के वास्ते देश में वैक्सीन तैयार करने पर जोर दिया गया। इस तरह की कई वैक्सीनों को विनियामक मंजूरी मिल जाने के बाद भारत अब दुनिया को वैक्सीन आपूर्ति करने की तैयारी कर रहा है। हमें शिक्षा क्षेत्र में होने वाले दूरगामी सुधारों को देखना चाहिए। भारत के शिक्षा क्षेत्र में हमेशा बड़ी ढांचागत समस्याएं रही हैं-ग्रामीण भारत में आम तौर पर शिक्षक किसी विषय के विशेषज्ञ नहीं होते और ज्यादातर उनके पास सिर्फ स्नातक की डिग्री होती है, और किस्मत अच्छी हुई, तो कुछ शिक्षकों के पास प्रशिक्षण का भी अनुभव होता है। लंबे अरसे से छात्र-शिक्षक संबंधों में जवाबदेही तय करने की जरूरत थी, आधुनिक शिक्षण विज्ञान में गुणवत्ता वाले शिक्षा परिणाम देने पर समग्र रूप से ध्यान केंद्रित करते हुए शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के लिए बड़े बदलाव की जरूरत थी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी), 2020 शिक्षकों पर दूरगामी असर डालने वाली है-इसमें प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों को बदलने के साथ-साथ ढांचागत सुधारों (जैसे बीएड को पढ़ाने के लिए न्यूनतम डिग्री तय करने) पर बहुत जरूरी ध्यान दिया गया है; इसके अलावा, शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) को विद्यालय सामग्री के हिसाब से चार हिस्सों-फंडामेंटल (बुनियादी), प्रीपरेटरी (प्रारंभिक), मिडिल (पूर्व माध्यमिक) और सेंकेडरी (माध्यमिक) में बांटा गया है।

प्राथमिक रूप से स्थानीय क्षेत्र में रोजगार देने पर ध्यान केंद्रित करने के साथ स्थानीय प्रतिभाओं को शिक्षण के पेशे में आने के वास्ते प्रेरित करने के लिए कई मेरिट-आधारित छात्रवृत्तियां भी शुरू की जा रही हैं। अंत में, शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) द्वारा गाइडलाइंस के तौर पर नया राष्ट्रीय व्यावसायिक मानक तैयार किया जाएगा। हम आखिरकार इन सबके साथ शिक्षकों के लिए कार्यकाल, पदोन्नति और वेतन के लिए ज्यादा योग्यता आधारित ढांचे की उम्मीद कर सकते हैं। जीडीपी का छह फीसदी शिक्षा बजट आवंटित किए जाने के सबसे आदर्श लक्ष्य को हासिल करने को और अधिक धन आवंटित करने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति केंद्र और राज्यों को प्रेरित करेगी। नई नीति में उच्च शिक्षा में वर्ष 2035 तक नामांकन 50 प्रतिशत बढ़ाने का लक्ष्य है। कुल मिलाकर, यह साल कई बार आशाहीन और बिना रोडमैप का लगा। लेकिन सौभाग्य से, भारत अपने शक्तिशाली नेता के नेतृत्व में इस अवधि का उपयोग बड़े बुनियादी सुधारों को शुरू करने के लिए करने में कामयाब रहा। इस तरह के ढांचागत सुधारों ने हमें अपने सपनों के भारत के पुनरुद्धार और नवीनीकरण के लिए अच्छा मौका दिया है।

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