फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   the elephant whisperer book in Booker race after winning Oscar

समाज: बुकर और ऑस्कर में दिखती विविधता, 'द एलिफेंट व्हिस्परर्स' को सम्मान स्वागतयोग्य

Shyoraj Singh Bechain श्यौराज सिंह बेचैन
Updated Sun, 02 Apr 2023 09:15 AM IST
विज्ञापन
सार
तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन की किताब के अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार की दौड़ में आने और लघु डॉक्यूमेंटरी 'द एलिफेंट व्हिस्परर्स' को ऑस्कर दिए जाने की घटनाएं सामाजिक विविधता समुचित मूल्यांकन की दृष्टि से स्वागतयोग्य हैं।
loader
the elephant whisperer book in Booker race after winning Oscar
the elephant whisperers - फोटो : Agency

विस्तार

तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन की किताब अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार की दौड़ में आते ही बुकर की वैश्विक दृष्टि भी चर्चा में आ गई है। मुरुगन तमिल के गैर-ब्राह्मण लेखकों में से हैं। उनका संबंध कोंगू बेल्लाना समुदाय से है। मुरुगन को अंतरजातीय दंपति की कथा पर आधारित उनके उपन्यास के लिए, जिसका अंग्रेजी अनुवाद पाइर नाम से आया है, नामित किया गया है। ध्यातव्य है कि मुरुगन का अर्धनारीश्वर उपन्यास जब प्रकाशित होने के बाद समाज के एक बड़े हिस्से ने इसके खिलाफ सुनियोजित अभियान छेड़ दिया था, तब लेखक का एक बयान 'लेखक मुरुगन मर गया', बहुत चर्चित हुआ था। अपने लेखन को जीवन को पर्याय समझने वाले मुरुगन के बयान से उनके अस्मिता विमर्श विषयक लेखन का महत्व जाहिर था। वह अपनी किताबों में जाति आधारित घृणा का नकार दर्शाते रहे हैं।



ऐसे ही, ऑस्कर ने वर्ष 2020 के बाद आत्मविश्लेषण किया और पाया कि सम्मानित करने की उसकी व्यवस्था में विविधता का अभाव है और यह नस्ल, रंग और जातियों की दृष्टि से पूर्ण समावेशी नहीं हैं। अत: बुकर का भांति ऑस्कर ने भी विविधता पर ध्यान दिया और सम्मान के लिए योग्यता के मानक तय करते हुए  विभिन्न सामाजिक समूहों की कलात्मकता व रचनात्मकता को प्रतिनिधित्व दिया जाना तय किया। इनमें साहित्य, कला और सिनेमा के क्षेत्र में रंग, लैंगिक और जातिगत विविधता को संज्ञान में लिया गया। भारत की भांति अमेरिका औप इंग्लैंड में बाहरी और स्थानीय अनेक धर्म जाति और समुदायों की प्रतिभाएं निवास करती हैं। उनके बीच कला, साहित्य, और अन्य प्रकार की ज्ञान संपदा पैदा होती है। मानवता के विकास को प्रोत्साहित करने व स्वस्थ स्पर्धा को जन्म देने के लिए सम्मान देना सार्थक और सकारात्मक परंपरा है।

  
लघु डॉक्यूमेंटरी, 'द एलिफेंट व्हिस्परर्स' को ऑस्कर दिया जाना सिद्ध करता है कि इसने उपेक्षित विषय पर आम कलाकारों द्वारा बनाई गई कृति को चुना। मीडिया और साहित्य के छात्रों के लिए यह ज्ञान का विषय है। कला और साहित्य में मानवीय संवेदना का विशेष महत्व होता है। मनुष्य के जीवन से जुड़े पशु-पक्षियों, जीव-जंतुओं, पर्यवरण और प्रकृति प्रेम के प्रति भी कला संवेदना का विस्तार इस लघु फिल्म में हुआ दिखाई पड़ता है। सामाजिक यथार्थ की कथा को प्रकार भेद के कारण उसकी गुणवत्ता को ही सिरे से नकार दिया जाता है।

पंडित जवाहर लाल नेहरू की साहित्य-सिनेमा को लेकर प्रगतिशील दृष्टि थी। देश में उन्होंने राष्ट्रीय साहित्य अकादमी जैसी संस्थाएं स्थापित कीं। पर वह दृष्टि साहित्य क्षेत्र में इतनी दूर तक नहीं जा सकी कि दूर अंधेरे में बैठे अस्पृश्य लेखकों पर भी जा पड़ती। देश में वंचितों के प्रतिनिधित्व का एक मात्र रास्ता आरक्षण रहा है, जो राजकीय क्षेत्रों के दायरे में आंशिक रूप से लागू होता है। साहित्या, सिनेमा, कला, मीडिया की स्वायत्त संस्थाएं स्वेच्छया समावेशी नीति नहीं अपनातीं। यहां एक प्रकार की अघोषित अस्पृश्यता व्यवहृत हो रही होती है। बुकर यदि भारतीय साहित्य की नीति पर चल रहा होता तो गैर ब्राह्मण लेखक मुरुगन साहित्य अकादमी की सूची में भी जगह नहीं पा सकता था।

चयन समिति की दृष्टि वस्तपुरक नहीं, जातिपरक होती है। संस्था के अध्यक्ष सदस्य जिन जातियों से आते हैं, वे लेखक भी उन्हीं से चुन पाते हैं। जो वंचितों की परछाई से दूर रहे, जिन्होंने उनकी बस्तियों तक में प्रवेश नहीं किया, वे उनकी रचनात्मकता को कैसे समझें। उन्होंने कसौटियां तो अपनी जाति साक्षेप बनाई है। दलित समाज ने स्वयं को भी कहां बदला? पूछा जा सकता है कि खासकर महिलाओं के संदर्भ में बेटों की तुलना में बेटियां शिक्षा से वंचित क्यों हैं? बहुएं पर्दे में क्यों हैं? शादियों में ऋण आधारित प्रदर्शनप्रियता क्यों बढ़ रही है?

जब तक अश्वेत लेखकों को प्रतिनिधत्व निर्णायकों में नहीं था, उनकी रचनाओं का महत्व समझा नहीं जा सकता था। गोरे लोग जीवन संदर्भ से कटे होने के कारण रचना का मर्म नहीं समझ पाते थे। उसी तरह भारत में बहिष्कृत-वंचित समाजों से आ रहे साहित्य के वर्चस्ववादी जातियों के वर्ण विशेष विशेषज्ञ-निर्णायक न तो उसे समझ पाते हैं,  न स्वीकार पाते हैं। उनमें जातिगत बहिष्कार की प्रवृत्ति सक्रिय रहती है। वे सामाजिक स्थिति की तरह साहित्यिक यथास्थिति भी बनाए रखते हैं।

विगत 16 मार्च को इन पंक्तियों के लेखक ने सामाजिक यथार्थ और आत्मकथाएं विषय पर राजस्थान विश्वविद्यालय में एकल व्याख्यान दिया। प्रश्नोत्तर सत्र में टिप्पणी आई कि अब जाति तो इतिहास की चीज रह गई है। अगले दिन वहीं के एक दैनिक पत्र में खबर पढ़ी कि 'पुत्र-पुत्री ने अंतरजातीय विवाह किए तो माता-पिता समाज से बहिष्कृत।' एक दूसरे अखबार का सर्वे कहता है कि एसटी/एससी छात्र कैंपस में जातिभेद का शिकार होने के कारण मानसिक रूप से अस्वस्थता-समस्या का सामना करते हैं और मनोवैज्ञानिक रूप से उनमें डर व हीनता घर करने लगती है। यह स्थिति बदलनी चाहिए। 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed