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पाकिस्तान में बदलता सत्ता समीकरण

Maroof Razaमारूफ रजा Updated Wed, 11 Dec 2019 05:24 AM IST
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जुल्फिकार अली भुट्टो और जनरल अयूब
जुल्फिकार अली भुट्टो और जनरल अयूब - फोटो : a
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पाकिस्तान में पारंपरिक रूप से तख्तापलट तब हुए हैं, जब वहां के राजनेताओं ने भ्रष्टाचार करके या सांविधानिक मानदंडों की अवहेलना करके या दोनों के जरिये लोगों के धैर्य को पूरी तरह खत्म कर दिया। ऐसे में सेना को पाकिस्तान की समस्याओं का बेहतर हल माना जाता है और उसे मुल्क की बागडोर संभालने के लिए बुलाया जाता है, जैसा कि पहली बार 1958 में अयूब खान ने किया था। वहां अब भी वैसा ही है, भले ही सेना वहां अपने राजनीतिक मुखौटे (इमरान खान जैसे) के जरिये नकली लोकतंत्र का नाटक कर रही हो। लेकिन पाकिस्तानी सेना के इस दखल में उसके अधिकारियों की हमेशा महत्वपूर्ण भूमिका रही है, इनमें पंजाबियों का प्रभुत्व होता है और आमतौर पर वे एकमत होते हैं। जिस नियम का वे हमेशा सम्मान करते हैं, वह यह है कि अधिकारियों के ऐसे समूह की अगुआई वरिष्ठतम अधिकारी करता है, भले ही उसने आगे बढ़ने के लिए दूसरों को किनारे क्यों न कर दिया हो, जैसा कि अयूब, जिया और मुशर्रफ ने किया, हालांकि इनमें से कोई पंजाबी नहीं था।
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पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल बाजवा हाल में सुर्खियों में रहे हैं, क्योंकि पाकिस्तान की शीर्ष अदालत ने एक वकील की याचिका पर उनके तीन साल के सेवा विस्तार को रोक दिया। यह सैन्य प्रमुख के लिए एक असामान्य चुनौती थी, जिसने कई पर्यवेक्षकों को भी हिला दिया। यहां तक कि पाकिस्तान में नागरिक-सैन्य गतिरोध की आशंकाएं भी पैदा हो गईं। पर इस बार सैन्य प्रमुख को चुनौती न्यायपालिका की तरफ से मिली, जैसा कि पूर्व प्रधान न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी और जनरल मुशर्रफ के मामले में हुआ था, न कि सरकार से, जैसा कि अतीत में नवाज शरीफ, बेनजीर और उनके पिता जुिल्फकार अली भुट्टो को मिली थी। हालांकि इमरान खान की कैबिनेट ने बिगड़ती 'राष्ट्रीय सुरक्षा' स्थितियों का हवाला देते हुए बाजवा को सेवा विस्तार दिया था। पाकिस्तान में राष्ट्रीय सुरक्षा का तब-तब हवाला दिया जाता है, जब कोई स्पष्टीकरण नहीं सूझता है। सच्चाई यह है कि इसे इमरान खान को प्रधानमंत्री बनने में मदद करने वाले जनरल बाजवा का एहसान चुकाने के तौर पर देखा गया। हालांकि अतीत के कई अन्य पाकिस्तानी सैन्य प्रमुखों की तरह जनरल बाजवा को अपने लिए खतरा न मानते हुए नवाज शरीफ ने सावधानीपूर्वक चुना था, लेकिन वह बाजवा ही थे, जिन्होंने यह सुनिश्चित किया कि भ्रष्टाचार के लिए पहले और एकमात्र जिम्मेदार नवाज शरीफ हैं, जबकि पाकिस्तान एक ऐसा मुल्क है, जहां ईमानदार राजनेताओं को ढूंढ़ना हमेशा मुश्किल रहा है। पाकिस्तान के अतीत का एक दिलचस्प तथ्य भविष्य के लिए एक मजबूत संदेश देता है। पाकिस्तान के तीनों सैन्य शासक-जनरल अयूब खान, जिया उल हक और परवेज मुशर्रफ को शुरू में अराजनीतिक माना गया और तीनों को उत्तराधिकार के लिए कतार में खड़े अन्य जनरलों को हटा कर नियुक्त किया गया। लेकिन जब पाकिस्तान के चुने हुए राजनेता अयोग्य दिखे या शासन करने के लिए अपनी वैधता खो चुके, तो उन्होंने दखल दिया और नागरिकों द्वारा उनका स्वागत किया गया।

मौजूदा हालात में हाशिये पर चल रहे जनरल बाजवा के नेतृत्व में तख्तापलट की आशंकाओं को नजरंदाज किया जा सकता है, जिनका कार्यकाल अब एक बार फिर छह महीने से आगे बढ़ने की संभावना नहीं है, जैसा कि न्यायालय द्वारा निर्देश दिया गया है। बाजवा की उम्मीदें उनके अपने सहयोगियों द्वारा ही ध्वस्त कर दी गई हैं, क्योंकि अगर उन्हें तीन साल का सेवा विस्तार दिया गया, तो कई अधिकारियों के प्रोन्नति का अवसर बाधित हो जाएगा। इसलिए भले ही इमरान-बाजवा का गठजोड़ शीर्ष अदालत के आदेश को चुनौती देना चाहे, लेकिन सेना में ऐसे लोग ज्यादा नहीं होंगे, जो उनका समर्थन करेंगे। हालांकि सिर्फ यही वजह नहीं कि भारत की गैर-राजनीतिक सेना ने कभी तख्तापलट की पहल नहीं की। हमारे यहां कई सेना प्रमुख हैं, जो स्वतंत्रतापूर्वक काम करते हैं, और वे कभी तख्तापलट की कोशिश नहीं करना चाहेंगे।

पाकिस्तान के राजनेताओं को सामने आए अवसरों से भटकने की कुख्यात आदत है। वे इतने असुरक्षित हैं कि सभी शक्तियां अपने हाथों में रखना चाहते हैं, जैसा कि बीती सदी के सत्तर के दशक के मध्य में जुल्फिकार भुट्टो ने किया था और नब्बे के दशक के उत्तरार्ध में नवाज शरीफ ने। और उन्होंने रक्षा एवं विदेश मुद्दे, जिसे सैन्य प्रतिष्ठान पारंपरिक रूप से अपना चारागाह मानता है, में हाथ डाला या वे अपनी ऊर्जा और समय शासन, अर्थव्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं आदि के निर्माण के बजाय अपने विरोधियों का शिकार करने में खर्च करते हैं।

लेकिन एक ऐसे मुल्क में जहां सैन्य बल बहुत मजबूत है और राजनेता कमजोर हैं, वहां तख्तापलट एक वास्तविक संभावना है। वहां अब भी कई वरिष्ठ सार्वजनिक हस्ती हैं, जिन्हें अपने सामंती तरीकों को त्यागने और लोकतांत्रिक व्यवस्था को सफल बनाने की आवश्यकता है, अन्यथा पाकिस्तान अपने अतीत की तरफ जा सकता है। यह देखना होगा कि क्या इमरान खान पाकिस्तानी राजनेताओं के सांचे से अलग हो सकते हैं, चूंकि वह ईमानदार राजनेता माने जाते हैं और उनकी एक प्रभावशाली आभा है। इसके अलावा, इसकी क्या गारंटी है कि एक बार बाजवा के पद से हटने के बाद उनके उत्तराधिकारी द्वारा इमरान को प्रभावशाली ढंग से शासन नहीं चलाने के कारण बाहर नहीं निकाला जाएगा?

पाकिस्तान पहले ही 'रणनीतिक दबाव' में फंसा हुआ है। भारत से खतरे (हाल की घोषणा के अनुसार भारत पाक अधिकृत कश्मीर को वापस लेना चाहता है!) को लेकर उसके भीतर बैठी सनक के अलावा भारत से कथित हमले की स्थिति में अफगानिस्तान को अपना रणनीतिक पिछवाड़ा मानकर बचाव करने का खुमार बाकी है। लेकिन वहां की सरकार को एक दीर्घकालीन चुनौती बलूची, सिंधी और पख्तून जनजातीय राष्ट्रवादियों से मिलेगी। ऐसे में मुल्क फिर से सेना को सत्ता में वापस ला सकता है, जिसे स्थिरता की सख्त जरूरत है। और फिर 'राष्ट्रीय सुरक्षा' की चिंता को पर्याप्त कारण के रूप में उद्धृत किया जा सकता है।
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