{"_id":"581b274f4f1c1bc132437762","slug":"the-battle-to-gain-equality","type":"story","status":"publish","title_hn":"बराबरी का हक पाने की लड़ाई","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
बराबरी का हक पाने की लड़ाई
सुभाषिनी सहगल अली
Updated Thu, 03 Nov 2016 05:32 PM IST
विज्ञापन
सुभाषिनी सहगल अली
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
तमिलनाडु के डिंडीगल जिले के जिला समाज कल्याण अधिकारी को कुछ दिन पहले एक पत्र मिला। पत्र जिले में स्थित एक टेक्सटाइल कारखाने में काम करने वाली छह महिला मजदूरों ने लिखा था। उसमें उन्होंने एक मर्द निरीक्षक के खिलाफ लिखा कि वह हर वक्त हमारा शरीर छूने का काम करता है। अगर कोई महिला विरोध करती है, तो उसका वेतन काटा जाता है। हमें इस नौकरी की जरूरत है। कृपया हमारी मदद करें।
विज्ञापन
तमिलनाडु में ही नहीं, समूचे देश के उन हजारों कारखानों, दुकानों और अन्य कार्यस्थलों पर महिलाओं और नवयुवतियों के साथ इसी तरह का और इससे भी बुरा व्यवहार होता है, लेकिन ऐसे व्यवहार के खिलाफ शिकायत कम ही महिलाएं करती हैं। इलाके की तिव्याकरनी, जो तमिलनाडु की टेक्सटाइल यूनियन चलाती हैं, आश्चर्य के साथ कहती हैं, यह पहला मौका है, जब इस तरह के शोषण की बिलकुल स्पष्ट शिकायत हमें मिली है। अक्सर पीड़ित महिलाएं ऐसी शिकायतें नौकरी छोड़ने के बाद ही करती हैं।
विज्ञापन
जिस कारखाने में ये छह महिलाएं काम करती हैं, वहां के वरिष्ठ अधिकारी केआर शन्मुगावेल ने कहा कि इसी निरीक्षक पर एक महिला मजदूर ने एक साल पहले बेबुनियाद आरोप लगाए थे। तब निरीक्षक को चेतावनी दी गई थी और उस महिला को नौकरी से निकाल दिया था, ताकि बवाल न बढ़े। अक्सर औरतों द्वारा होने वाली शिकायतों की सजा उन्हें ही दे दी जाती है। कारण वही है-ताकि बवाल न बढ़े। न्याय प्राप्त करने की उनकी लड़ाई तो तब शुरू होती है, जब वे फैसला कर लेती हैं कि बवाल चाहे कितना ही क्यों न बढ़े, वे शिकायत करेंगी। हाजी अली में मुस्लिम महिलाओं का प्रवेश तभी संभव हो पाया, जब तमाम तोहमत बर्दाश्त करने के बाद उनमें से कुछ साहसी बहनों ने न्यायालयों के सामने अधिकार की गुहार लगाई। जब उन्होंने पहला कदम आगे बढ़ाया, तो तमाम लोगों ने उनका साथ दिया और सर्वोच्च न्यायालय ने भी उनके पक्ष को सही ठहराया। हो सकता है कि शबरीमला में भी महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध कुछ महिलाओं के प्रयास और केरल की नई वामपंथी सरकार के सहयोग से खत्म हो जाएगा।
विज्ञापन
इन महिलाओं की श्रेणी में, और शायद उनसे आगे की कतार में, वे मुस्लिम महिलाएं हैं, जिन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के सामने ‘एक बार में तीन तलाक’ को समाप्त करने की मांग की है। इस मामले की सुनवाई का इंतजार हो ही रहा था कि दो चिंताजनक घटनाएं घट गईं। पहली घटना यह थी कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने एक बहुत ही आपत्तिजनक हलफनामा न्यायालय के सामने पेश किया, जिसमें उसने कहा कि अगर तीन तलाक को खत्म कर दिया गया, तो मुस्लिम पति अपनी पत्नियों को जलाकर मार डालने के लिए मजबूर हो जाएंगे। ठीक इसी समय, केंद्र सरकार के न्यायिक आयोग ने एक अजीब प्रश्नावली सार्वजनिक की, जिसमें उसने आम नागरिक संहिता से संबंधित कुछ सवालों के जवाब लोगों से मांगे। जबकि खुद न्यायिक आयोग के अध्यक्ष ने स्वीकारा है कि आम नागरिक संहिता क्या है और कैसी होनी चाहिए, इसका उन्हें पता नहीं है।
लगता है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और न्याय आयोग, दोनों ने ही सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने का काम किया है। इसमें कुछ लोगों को राजनीतिक लाभ मिलता है और सबको औरतों द्वारा बढ़ाए जाने वाले बवाल से छुटकारा पाने का भी। लेकिन औरतों ने ठान लिया है कि वे बवाल करेंगी, अपनी आवाज सुनवाएंगी और बराबरी का हक पाने की ओर बढ़ेंगी।