तब आ रहे थे, अब जा रहे हैं
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इन दिनों डाक्टर ने मुझे सलाह दी है कि सुबह तेज चाल से घूमने जाओ और तेज चाल से ही लौटो। मेरे साथ दिक्कत यह है कि मैं तेज चाल से जा तो सकता हूं, मगर लौट नहीं सकता। धीमी चाल से चलने वाला व्यक्ति तमाम बातें सोचता हुआ चलता है। कई बार तो धीमी चाल वाला व्यक्ति इतना चिंतनशील हो उठता है कि उसे घूमना ही निरर्थक लगने लगता है। वह उल्टे पांव लौट पड़ता है। पैसेंजर ट्रेन में बैठा यात्री इतना बोर हो जाता है कि वह किसी बड़े स्टेशन पर उतरकर एक्सप्रेस ट्रेन से वापसी कर लेता है। इसलिए ज्ञानी जन तेज चाल पर जोर देते हैं।
हमारे स्वर्गीय पिता जी हमारी हड़बड़ी और तेजी से परेशान होकर कहते थे, बेटा ठंडा करके खाओ। यानी हर काम धीरे-धीरे करो। यह नहीं कि एक धरना चांदनी चौक पर ठोंक दिया और दूसरा जनपथ पर। पिताजी की बातें मानकर हम इतने धीमे हो गए कि लेखक समुदाय में ओबीसी की श्रेणी में आ गए।
दिल्ली में एक सियासी दल का इतनी तेजी से उदय हुआ कि राजनीति के पंडित हक्के-बक्के रह गए। कुछ महीने पहले तक इस दल में शामिल होने की होड़ लगी थी। लोग-बाग नौकरी छोड़कर पार्टी में जा रहे थे। कोई विदेश से लौटा था, तो कोई एनजीओ छोड़कर आया था। गरीब आदमी को लगने लगा कि देश से भ्रष्टाचार का सफाया होकर ही रहेगा। विश्वास इसलिए भी करना पड़ा, क्योंकि पार्टी का चुनाव चिह्न ही कुछ ऐसा था। इस दल के लोग पलक झपकते शिखर पर चढ़ गए थे। पर अब इसकी फिसलन को सभी देख रहे हैं। भीड़ भरी ट्रेन में खडे़ होकर सफर करने वाले ट्रेन खाली होने पर भी सफर करने से कतरा रहे हैं।
कुछ लोगों का कहना है कि पार्टी में भगदड़ मची है। पार्टी में भाग-दौड़ जरूर हो रही है। मगर इसे भगदड़ कहना उचित नहीं। जो भी आया, अपनी मर्जी से आया। जो जा रहा है, वह अपनी मर्जी से जा रहा है। जितनी तेजी आने में रही, उतनी ही तेजी जाने में है। लोग मफलर, झाड़ू आदि पार्टी में ही छोड़कर जा रहे हैं।