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परखी दोस्ती परवान चढ़ी: पीएम मोदी को रूस यात्रा के दौरान मिलीं दो बड़ी उपलब्धियां

Wed, 04 Sep 2019 07:31 PM IST
SHASHANK KUMAR शशांक, पूर्व विदेश सचिव
शशांक, पूर्व विदेश सचिव Published by: SHASHANK KUMAR Updated Wed, 04 Sep 2019 07:31 PM IST
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Tested Friendship with Russia
Pm Modi and Vladimir Putin - फोटो : ANI

रूस के शहर व्लादिवोस्तोक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने को लेकर जो सहमति बनी है, वह महत्वपूर्ण है। रूस और भारत के रिश्ते बहुत पुराने रहे हैं। एक ऐसा भी जमाना था, जब हमारे करीब 70 फीसदी रक्षा उपकरण रूस से ही आते थे। इसके अलावा ऊर्जा के क्षेत्र में भी हमारा रिश्ता बहुत बढ़िया था। जब कभी हमें डीजल या ऊर्जा के अन्य क्षेत्रों में जरूरत महसूस हुई, तो रूस हमेशा हमारी मदद करने आगे आया। खासकर परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में रूस के साथ हमारा बहुत अच्छा कार्यक्रम चलता रहा है। रूस में हमने अपना निवेश बढ़ाया है, जो करीब दस अरब डॉलर का हो गया है। रूस ने भी हमारे यहां करीब बारह अरब डॉलर का निवेश किया है।


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रूस के शहर व्लादिवोस्तोक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने को लेकर जो सहमति बनी है, वह महत्वपूर्ण है। रूस और भारत के रिश्ते बहुत पुराने रहे हैं। एक ऐसा भी जमाना था, जब हमारे करीब 70 फीसदी रक्षा उपकरण रूस से ही आते थे। इसके अलावा ऊर्जा के क्षेत्र में भी हमारा रिश्ता बहुत बढ़िया था। जब कभी हमें डीजल या ऊर्जा के अन्य क्षेत्रों में जरूरत महसूस हुई, तो रूस हमेशा हमारी मदद करने आगे आया। खासकर परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में रूस के साथ हमारा बहुत अच्छा कार्यक्रम चलता रहा है। रूस में हमने अपना निवेश बढ़ाया है, जो करीब दस अरब डॉलर का हो गया है। रूस ने भी हमारे यहां करीब बारह अरब डॉलर का निवेश किया है।

रक्षा क्षेत्र या ऊर्जा के क्षेत्र में तो निवेश ठीक-ठाक हुआ, लेकिन बाकी क्षेत्रों में बात बहुत आगे बढ़ नहीं पाई, खासकर जबसे रूस ने रुपये और रूबल की पुरानी व्यवस्था को खत्म कर दिया और कहा कि अब सौदे फ्री फॉरेन करेंसी में होंगे। भारत ने भी रक्षा सौदों में ऑफसेट और प्रौद्योगिकी को उन्नत बनाने की जरूरत का मुद्दा उठाया, तो हमने देखा कि धीरे-धीरे रक्षा सौदों में रूस के साथ हमारी खरीदारी घट गई। ऑफसेट का मतलब होता है कि किसी देश के साथ हमने जितने का सौदा किया, उसका पचास फीसदी निवेश वह देश भारत में करेगा।

इसलिए यह आवश्यक हो गया था कि रूस के साथ हमारे संबंधों का जो नया चरण शुरू हुआ है, उसमें हम निजी क्षेत्रों को भी आगे बढ़ाएं। इसलिए फिक्की का काफी बड़ा शिष्टमंडल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ रूस की यात्रा पर गया है। दोनों देशों के बीच तेल और गैस, खनन, रक्षा और सुरक्षा, हवाई और समुद्री कनेक्टिविटी, परमाणु ऊर्जा, ट्रांसपोर्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर, व्यापार और निवेश संबंधी विषयों पर बात हुई। दोनों देशों के बीच रक्षा, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा समेत तेरह समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। पुतिन ने महात्मा गांधी की 150वीं जयंती का जिक्र करते हुए उन पर डाक टिकट जारी करने की बात की। लेकिन दोनों नेताओं में से किसी ने बातचीत में नेहरू का जिक्र नहीं किया, जबकि नेहरू के दौर में ही रूस के साथ हमारे रिश्ते परवान चढ़े थे। नेहरू के दौर से ही रूस भारत को रक्षा, ऊर्जा और अंतरिक्ष के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सहयोग देता रहा है। इसकी वजह यह समझ में आती है कि सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस के नेताओं ने नेहरू ही नहीं, भारत पर से भी अपना ध्यान हटा दिया था। पुतिन के आने के बाद ही फिर से संबंधों में गति आई है।

रूस का जो पूर्वी इलाका है, वहां आबादी काफी कम है। यदि व्लादिवोस्तोक को ही देखें, तो पिछले आठ-दस साल में वहां रूसियों की मात्र दस हजार आबादी बढ़ी है। इसके अलावा यह भी देखने में आया है कि वहां काम करने और बसने के लिए काफी चीनी नागरिक आ गए हैं। इससे रूस की चिंता बढ़ गई है। चूंकि भारत हमेशा से प्रोफेशनल मूवमेंट की बात करता रहा है, इसलिए उम्मीद है कि भारत भी ऐसा कोई समझौता करेगा, जिससे कि भारत की कंपनियां वहां जरूरत के क्षेत्रों में कुशल श्रमिक उपलब्ध करा सकें। इससे भारत के लिए बहुत बड़ा क्षेत्र खुल सकता है और इसके रणनीतिक परिणाम भी हो सकते हैं, क्योंकि चीन और रूस के रिश्ते में अगर किसी तरह की संकीर्णता आती है, तो भारत बहुत उपयोगी भूमिका निभा सकता है। हमारे प्रधानमंत्री ने कहा कि रूस के साथ हमारे बहुत पुराने रिश्ते रहे हैं, लेकिन हम उसे नए आयामों पर पहुंचाना है, और नए-नए क्षेत्रों में ले जाना है। अगर हम वाकई इसमें सफल होते हैं, तो यह एक बड़ी बात होगी।

जहां तक रूस के साथ हमारी प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, प्रौद्योगिकी को उन्नत बनाने की बात है, तो उसमें भारत अपने अनुकूल शर्तों के अनुसार ही बात आगे बढ़ाएगा। हालांकि हमें ध्यान रखना होगा कि अमेरिका ने रूस से हथियार खरीदने पर प्रतिबंध लगा रखा है। लेकिन भारत ने इसके बावजूद रूस से एस-400 एंटी मिसाइल का सौदा किया है। इसलिए ऐसी व्यवस्था की जाएगी कि अमेरिकी प्रतिबंध का हम पर असर न पड़े।

भारत के लिए यह सौदा जरूरी था, क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण है। भारत को अमेरिका को यह संदेश देना होगा कि जब राष्ट्रीय सुरक्षा की बात आएगी, तो हम सबसे पहले भारत की नीति को ही ध्यान में रखेंगे, क्योंकि अमेरिका भी तो पहले अपने हित को ही देखता है। रूस हमारा पुराना और जांचा-परखा मित्र रहा है, इसलिए हम अमेरिका के डर से रूस से अपने संबंधों को बिगाड़ तो नहीं सकते, बल्कि हमें दोनों देशों के साथ संतुलन बनाकर ही चलना चाहिए।

रूस ने मुख्य अतिथि के रूप में हमारे प्रधानमंत्री को ईस्टर्न इकोनोमिक फोरम के मंच पर बुलाया है, यह बहुत खुशी की बात है। रूस का सुदूर पूर्वी इलाका बहुत बड़ा है। वहां आबादी बहुत कम है और खनिज संसाधन की बहुतायत है। रूस चाहता है कि अपने पड़ोसी देशों के साथ अच्छे रिश्ते बनाकर उस क्षेत्र को आर्थिक रूप से समृद्ध बनाए। उसके पड़ोसी देशों के साथ भारत के भी अच्छे रिश्ते हैं और भारत भी एशिया में शांति चाहता है, इसलिए इसमें भारत की भागीदारी का अपना महत्व है।

इसमें रूस और भारत दोनों का भी फायदा है। अगर रूस के सुदूर पूर्वी इलाके में हमें निवेश का अवसर मिलता है और वहां हमारा उत्पादन होता है, तो उस क्षेत्र में हमें एक बड़ा बाजार भी मिल सकता है। वहां कई क्षेत्रीय समूहों के साथ भी बातचीत हो रही है, उन समूहों ने नेताओं के साथ भारत को संवाद करने और दक्षिण एशिया के मौजूदा हालात के बारे में अपने विचार साझा करने का मौका मिलेगा।
 
मेरे विचार से रूस ने भारत को अच्छा मौका दिया है। प्रधानमंत्री ने कहा भी है कि पुतिन के साथ उनके व्यक्तिगत रूप से अच्छे संबंध हैं। अन्य देशों के नेताओं के साथ भी उन्होंने अच्छी कैमिस्ट्री बनाई है, जिसका द्विपक्षीय रिश्तों में बहुत फायदा होता है। हालांकि द्विपक्षीय रिश्तों में सभी देश अपने राष्ट्रहित को ही देखते हैं, लेकिन मोदी-पुतिन की व्यक्तिगत कैमिस्ट्री का द्विपक्षीय संबंध पर सकारात्मक असर पड़ेगा।
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