{"_id":"59ccf97e4f1c1b65548b4cc2","slug":"test-of-pakistani-democracy","type":"story","status":"publish","title_hn":"पाकिस्तानी लोकतंत्र की परीक्षा","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
पाकिस्तानी लोकतंत्र की परीक्षा
मरिआना बाबर
Updated Fri, 29 Sep 2017 05:27 PM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
मरियम एवं कुलसूम नवाज
इसी महीने पाकिस्तान की नेशनल एसेंबली की एक सीट के लिए उपचुनाव हुए थे। यह सीट सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को अयोग्य ठहराए जाने के कारण रिक्त हुई थी। यह संसदीय क्षेत्र एनए-120 लाहौर के मध्य में स्थित है और यहां से पारंपरिक रूप से पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) जीतती आई है। इस बार इस सीट से अपने पति की जगह कुलसूम नवाज ने चुनाव लड़ा, लेकिन वह कैंसर की मरीज हैं और लंदन में उनका इलाज चल रहा है, इस वजह से वह प्रचार नहीं कर सकीं। इसके बावजूद एनए-120 सीट पीएमएल-एन ने जीत ली, जिसके लिए नवाज शरीफ की बेटी मरियम नवाज को कड़ी मेहनत करनी पड़ी।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
सबसे ताज्जुब करने वाली बात यह है कि चुनाव आयोग, प्रांतीय सरकार और रेंजर, जिनके अधीन यह चुनाव कराया गया, ये सब प्रतिबंधित उग्रवादी गुटों को इसमें हिस्सा लेने से नहीं रोक सके। ये कट्टरपंथी पंजाबी गुट हैं और उन्होंने मतदाताओं से कट्टर और जेहादी इस्लाम के आधार पर वोट की अपील की। पारंपरिक रूप से इस्लामिक पार्टियों का चुनावों में प्रदर्शन बहुत खराब रहा है, क्योंकि पाकिस्तानी मतदाता उन्हें खारिज करते रहे हैं। संसद में उनकी मौजूदगी बहुत कम है। लेकिन यह परिदृश्य अब ऐसा नहीं रह जाएगा, क्योंकि जब राज्य ही चुनावों में गड़बड़ी करने लगे और प्रतिबंधित गुटों को इसमें शामिल करेगा, तो इससे खासतौर से पंजाब में पीएमएल-एन, पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) और पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ (पीटीआई) जैसी लोकतांत्रिक पार्टियां कमजोर हो सकती हैं। इन प्रतिबंधित गुटों का सिंध, बलूचिस्तान या खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में कुछ खास प्रभाव नहीं है।
उपचुनाव में खड़ा एक उम्मीदवार मिल्ली मुस्लिम लीग पार्टी (एमएमएल) का था, यह ऐसी पार्टी है, जिसके कार्यकर्ता लश्कर-ए तैयबा, जमात उद दावा और फलाहे इंसानियत जैसे आतंकी संगठनों से आते हैं, और ये हाफिज सईद के विचारों का प्रचार करते हैं। एक अन्य उम्मीदवार का संबंध तहरीक ए लब्बैक या रसूल अल्लाह से था, जोकि एक बरेलवी समूह है और जिसकी स्थापना मुमताज कादरी का समर्थन करने के लिए की गई थी। कादरी पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर का सुरक्षा कर्मी था। 2011 में कादरी ने तासीर को गोली मार दी, क्योंकि वह ईशनिंदा कानून में संशोधन की अपील कर रहे थे। कादरी को गिरफ्तार कर लिया गया और फिर उसे हत्या का दोषी पाया गया और 2016 में उसे फांसी पर लटका दिया गया।
पाकिस्तान में इन दिनों बहस चल रही है कि आखिर कौन प्रतिबंधित गुटों को मुख्यधारा की राजनीति में लाने की कोशिश कर रहा है, खासकर तब, जब 2018 में होने वाले आम चुनावों को कुछ महीने ही रह गए हैं। हाल ही में सीनेटर शेरी रहमान की अध्यक्षता में संसदीय मामलों की सीनेट की स्थायी समिति की बैठक हुई, जिसमें चुनाव आयोग से पूछा गया कि आखिर एक प्रतिबंधित संगठन के उम्मीदवार को कैसे चुनाव चिह्न आवंटित कर किया गया। जैसी कि उम्मीद थी, समिति को कोई जवाब नहीं मिला।
पीटीआई का उम्मीदवार इस उपचुनाव में दूसरे स्थान पर रहा, मगर तीसरे स्थान पर इन्हीं प्रतिबंधित पार्टियों और गुटों का उम्मीदवार था, जिसे पीपीपी और जमाते इस्लामी से अधिक वोट मिले। वास्तव में पीपीपी और जमाते इस्लामी का तो इस चुनाव में एकदम सफाया ही हो गया।
अब यह साफ दिख रहा है कि आने वाले आम चुनाव में अधिक फंडिंग और योजना के साथ ये प्रतिबंधित पार्टियां पंजाब के चुनावों को बुरी तरह से प्रभावित कर सकती हैं। यह उपचुनाव तो सिर्फ एक सीट के लिए हुआ था, पर कल्पना कीजिए कि तब क्या होगा, जब पंजाब में, जिसके बारे में कहा जाता है कि वहीं से देश की सरकार बनती या बिगड़ती है, ये पार्टियां इस प्रांत की सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ी कर देंगी।
अंग्रेजी दैनिक डॉन ने इसकी कड़ी निंदा की और लिखा कि, 'यदि राज्य का एक वर्ग तथाकथित मुख्यधारा के ऐसे उग्रवादी गुटों के साथ प्रयोग करता है, जिन्होंने पाकिस्तान राज्य के खिलाफ हथियार नहीं उठाए हैं, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इसकी शर्त एकदम स्पष्ट और लोकतांत्रिक होगी। अभी जिस चालाकी के साथ उग्रवादी गुटों के साथ प्रयोग किया गया, वह पूरी तरह से अस्वीकार्य है।'
यहां पाकिस्तान के भीतर हमला करने वाले पाकिस्तान तालिबान जैसे गुटों और देश के बाहर हमले करने वाले गुटों में अंतर किया जा रहा है, लेकिन ऐसे गुट देश में नस्लीय हिंसा में लिप्त रहे हैं। कुछ लोगों का कहना है कि यदि उग्रवादी गुट अपने हथियार छोड़ देते हैं और देश के भीतर और बाहर उग्रवादी गतिविधियों में हिस्सा नहीं लेने की शपथ लेते हैं, तो उसके बाद राज्य को उनकी गतिविधियों की नियमित जांच करनी चाहिए और उसे सार्वजनिक भी करना चाहिए। ऐसे गुटों को रोकने का एकमात्र रास्ता यही है कि उन्हें मिलने वाली हर तरह की वैचारिक और रणनीतिक मदद पर रोक लगाई जाए। इसमें संसद को भी शामिल होना होगा, ताकि यह देखा जा सके कि लोकतांत्रिक तरीके से और संविधान के दायरे में विभिन्न विचारधारा के लोग कैसे शामिल हो सकें। ऐसे गुटों को मुख्यधारा में जोड़ने की नीति स्पष्ट होनी चाहिए कि कानून तोड़ने की इजाजत किसी को नहीं दी जाएगी और यह प्रक्रिया पारदर्शी होगी।
यहां अफगान योद्धा गुलबुद्दीन हिकमतयार और उत्तरी आयरलैंड के उदाहरण दिए जा रहे हैं कि कैसे अफगानिस्तान और आयरलैंड में उग्रवादियों और आतंकवादियों को मुख्यधारा से जोड़ा गया, जिससे वे राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा बनेे। प्रतिबंधित गुटों को आजाद घूमने और उपचुनाव लड़ने की इजाजत देने के फैसले की विदेश में आलोचना हो रही है और अब यदि उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश होगी, तो यही माना जाएगा कि राज्य चरमपंथी विचारधारा का समर्थन करता है। अभी यहां कोई भी प्रतिबंधित गुटों को मुख्यधारा से जोड़ने के पक्ष में नहीं है।