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कश्मीर में मोदी की परीक्षा
नीलांजन मुखोपाध्याय
Updated Mon, 10 Nov 2014 07:40 PM IST
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अब जल्दी ही जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, उनमें से दिल्ली के चुनावी नतीजे का जहां राष्ट्रीय राजनीति पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा, वहीं जम्मू-कश्मीर के चुनाव का आंतरिक सुरक्षा पर व्यापक असर पड़ने वाला है। दिल्ली के चुनाव से जुड़े दो बड़े सवाल ये हैं-राष्ट्रीय राजधानी में मोदी का जादू चलेगा या विफल हो जाएगा। दूसरा यह कि क्या कांग्रेस चुनावी लड़ाई में वापसी कर दिल्ली में मुख्य विपक्षी पार्टी बन पाएगी?
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जहां तक जम्मू-कश्मीर की बात है, तो बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा वहां मिशन-44 में सफल हो पाएगी। अगर जम्मू-कश्मीर में त्रिशंकु विधानसभा बनती है, तो क्या भाजपा पीडीपी या दूसरी छोटी पार्टियों के साथ मिलकर सत्ता साझा करेगी? अगर भाजपा वहां दूसरी पार्टियों के साथ सरकार बनाती है, तो क्या वहां मुख्यमंत्री पद गठबंधन सहयोगियों के पास बारी-बारी से रहेगा, और क्या ऐसे में जम्मू-कश्मीर को पहला हिंदू मुख्यमंत्री मिलेगा? अगर ऐसा होता है, तो देश की आंतरिक सुरक्षा पर इसका असर पड़ेगा। भाजपा घाटी में विरोध के डर से सूबे में अपना मुख्यमंत्री बनाने के अभियान पर भले ही अंकुश न लगाए, पर इसके नतीजे भीषण होंगे। भाजपा को यह फैसला करना होगा कि जम्मू-कश्मीर में वह अपने राजनीतिक हितों की परवाह करेगी या राष्ट्रीय हितों को अधिक तरजीह देगी।
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जहां तक दिल्ली की बात है, तो बमुश्किल पंद्रह महीनों में यह तीसरा चुनाव होगा। पिछले साल नवंबर-दिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव में हालांकि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई थी, लेकिन आम आदमी पार्टी विजेता के रूप में उभरी थी। इसी साल गर्मियों में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने दिल्ली की सातों सीटों पर कब्जा जमाया। दिल्ली स्थित डाटानेट इंडिया के आंकड़ों के विश्लेषण के मुताबिक, दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से 60 पर भाजपा आगे रही, जबकि आप 10 सीटों पर आगे थी। नौ विधानसभा सीटों पर भाजपा उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे, जबकि 60 सीटों पर आप के प्रत्याशी दूसरे स्थान पर थे। दिल्ली में 15 वर्षों तक सत्ता में रही कांग्रेस मात्र एक विधानसभा सीट पर ही आगे थी! यानी पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव के बाद से, जब कांग्रेस को आठ सीटें मिली थीं, दिल्ली में कांग्रेस की हालत खराब ही हुई है।
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हालांकि दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए लोकसभा जैसा प्रदर्शन करना कठिन है, पर इसकी प्रबल संभावना है कि उसका प्रदर्शन उसके आसपास ही रहे। हालांकि दो वजहों से दिल्ली में भाजपा की योजनाएं उतनी सफल नहीं भी हो सकतीं-अगर झारखंड और जम्मू-कश्मीर में भाजपा का प्रदर्शन उम्मीद के अनुरूप नहीं रहा, तो इसका असर दिल्ली में पड़ सकता है, या दिल्ली में आप अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने में सफल हो सकती है। बेशक आप ने दिल्ली में अपने मध्यवर्गीय समर्थकों का एक बड़ा हिस्सा खो दिया है, पर कामकाजी वर्ग का एक बड़ा हिस्सा अब भी केजरीवाल के पक्ष में है। लेकिन इन मतदाताओं का फॉर्मूला है-नीचे केजरीवाल, ऊपर मोदी। इसी कारण पिछले साल के विधानसभा चुनाव में आप को बड़ी संख्या में वोट मिले थे। लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों को देखें, तो अब भारतीय राजनीति एक ऐसे चरण में प्रवेश कर रही है, जिसमें मतदाता ताकतवर क्षेत्रीय नेताओं के हाथ मजबूत करने के बजाय केंद्र में एक शक्तिशाली नेता के पक्ष में वोट करना चाहेगा। हालांकि दिल्ली में यह देखना अभी शेष है।
पिछले नवंबर में जब दिल्ली में चुनाव हुए थे, तब भाजपा ने हर्षवर्धन को मुख्यमंत्री के तौर पर आगे कर चुनाव लड़ा था। एक साल बाद भाजपा किसी का चेहरा सामने किए बगैर भी मजबूती से चुनाव लड़ सकती है, तो यह पार्टी में मोदी के वर्चस्व का ही सुबूत है। एक समय भाजपा के तमाम चुनाव अभियान अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की त्रिमूर्ति पर निर्भर करते थे। लेकिन अब मोदी इकलौते वोट हासिल करने वाले नेता हैं। पर क्या वह भाजपा की जीत सुनिश्चित कर सकेंगे?
दिल्ली के विपरीत, जम्मू-कश्मीर में भाजपा मोदी लहर पर सवार हो, बेहतर प्रशासन का वायदा कर अपना जनाधार बनाना चाहती है। हालांकि भाजपा का मकसद वहां खुद को हिंदुत्व के रक्षक के रूप में और दूसरी पार्टियों को मुस्लिमों के हिताकांक्षियों के रूप में पेश करना है। इस तरह से देखें, तो राज्य में होने वाला आगामी विधानसभा चुनाव 1983 के बाद, जब इंदिरा गांधी ने राज्य को हिंदू जम्मू और मुस्लिम घाटी के रूप में बांट दिया था, सबसे महत्वपूर्ण चुनाव होने वाला है। और इस प्रक्रिया में भाजपा का चुनाव अभियान उन घावों को और गहरा ही करेगा, जो वहां बने हुए हैं। जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में कुल 87 सीटें हैं, जिनमें घाटी में 46, जम्मू में 37 और लद्दाख में चार हैं। वर्ष 2008 में भाजपा ने जम्मू में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 11 सीटें जीती थीं। इस साल हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जम्मू की दोनों और लद्दाख की इकलौती सीट जीत ली। शेष तीन सीटें पीडीपी के कब्जे में आईं।
भाजपा की रणनीति जम्मू और लद्दाख में अधिकतम सीटें जीतकर मोलभाव की स्थिति में आने और सरकार का हिस्सा बनने की है। उसकी योजना सज्जाद लोन की पीपुल्स कॉन्फ्रेंस जैसी छोटी पार्टियों के साथ चुनाव के बाद गठबंधन बनाने की भी है। भाजपा की चुनावी रणनीति आशंकाएं पैदा करने वाली हैं। अगर भाजपा पर्याप्त सीटें जीतकर वहां सरकार बनाने या सत्ता साझा करने की स्थिति में आ जाए, तो घाटी में दिल्ली-विरोधी भावनाओं का सीमापार आतंकवादी संगठन फायदा उठा सकते हैं। ऐसे में, मोदी के सामने चुनाव अभियान को संयमित बनाने की चुनौती है। समाज को बांटकर चुनावी तापमान बढ़ाने के खतरे ही होंगे।
(वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक)