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नेपाल के रास्ते आता आतंकी खतरा!

Wed, 11 Dec 2013 07:02 PM IST
भीम सिंह
भीम सिंह Updated Wed, 11 Dec 2013 07:02 PM IST
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Terror threat via Nepal

नवंबर, 2010 में जबसे जम्मू-कश्मीर में पुनर्वास और समर्पण नीति को संशोधित किया गया है, तब से अब तक 282 पूर्व उग्रवादी नेपाल के रास्ते जम्मू-कश्मीर में प्रवेश कर चुके हैं- यह तथ्य जम्मू-कश्मीर सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल एक हलफनामे में स्वीकार किया है। राज्य सरकार ने यह भी माना है कि उग्रवादियों की 134 पत्नियों और पाकिस्तान में पैदा हुए 432 बच्चों का भी जम्मू-कश्मीर में स्वागत किया गया है। उसने यह स्वीकारोक्ति जम्मू-कश्मीर नेशनल पैंथर्स पार्टी द्वारा दायर एक याचिका के जवाब में की थी।

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पिछले महीने सुरक्षा बलों ने दस पाकिस्तानी नागरिकों को, जिनमें एक महिला और सात बच्चे भी थे, उस वक्त हिरासत में लिया था, जब वे नेपाल की सीमा से भारत में प्रवेश कर रहे थे। कुछ महीने पहले खुद मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने स्वीकार किया था कि नेपाल के रास्ते 241 आतंकी जम्मू-कश्मीर में प्रवेश कर चुके हैं, जबकि कोई भी पूर्व उग्रवादी चिह्नित रास्तों के मार्फत वापसी और पुनर्वास नीति के अधीन प्रदेश में प्रवेश नहीं कर पाया है।
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वर्ष 2004 में तत्कालीन मुफ्ती मोहम्मद सईद की गठबंधन सरकार ने समर्पण करने वाले पूर्व उग्रवादियों के पुनर्वास की नीति घोषित की थी। इसके तहत ऐसे युवाओं के मामलों पर गौर किया जाना था, जो प्रशिक्षण के लिए सीमापार चले गए थे, पर वापस आकर मुख्यधारा से जुड़ना चाहते हैं। गृह मंत्रालय के परामर्श के बाद ऐसे युवाओं के मामलों पर गौर किया जाना था। इसके तहत समर्पण की अर्जी पाकिस्तान में भारतीय उच्चायुक्त के समक्ष पेश की जा सकती है, ताकि जम्मू-कश्मीर में समर्पण करने के इच्छुक व्यक्ति के लिए प्रवेश परमिट जारी किया जा सके।
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सरकार ने समर्पण के इच्छुक आतंकियों के प्रवेश के लिए चार प्रवेश-रास्ते चुने थे- पुंछ-रावलाकोट (पुंछ), उड़ी-मुजफ्फराबाद (उड़ी), वाघा (पंजाब) और इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, नई दिल्ली। भारत में प्रवेश करने के इच्छुक आतंकी अथवा पूर्व उग्रवादी के लिए यह अनिवार्य था कि उन्हें प्रवेश बिंदु पर हिरासत में लिया जाएगा और फिर परामर्श केंद्रों पर लाया जाएगा। एक उपयुक्त कानूनी अदालत के समक्ष पेश किया जाएगा, ताकि पता चल सके कि उनके खिलाफ कोई मामला बाकी तो नहीं है।

नेपाल के रास्ते जम्मू-कश्मीर में पूर्व आतंकियों अथवा उग्रवादियों को प्रवेश करने देना राज्य की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है। समर्पण और पुनर्वास नीति में यह प्रावधान था कि सभी समर्पित उग्रवादियों का अदालती परीक्षण किया जाएगा कि सीमा पार जाने से पहले उन्होंने कोई अपराध तो नहीं किया था। इस नीति में अपवाद स्वरूप एक टिप्पणी में स्पष्ट किया गया है कि, ‘कोई भी समर्पित व्यक्ति अगर किसी जघन्य अपराध जैसे हत्या, बलात्कार, धोखाधड़ी आदि में लिप्त है, तो उन्हें इस नीति का तभी फायदा मिलेगा, जब उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई पूरी हो गई हो, अदालती मामलों का फैसला हो गया हो और उस व्यक्ति को निर्दोष घोषित कर दिया गया हो।'

जम्मू-कश्मीर सरकार ने अभी तक एक भी एफआईआर किसी भी उग्रवादी के खिलाफ दर्ज नहीं की है। इसके बजाय उनके खिलाफ एफआईआर तभी दर्ज की गई, जब वे घर पहुंच गए। दिलचस्प है कि कुछ अपवादों के बाद तमाम एफआईआर निकास एवं प्रवेश गतिविधि (नियंत्रण) अध्यादेश के प्रावधानों के अंतर्गत दर्ज की गईं। यह जम्मू-कश्मीर सरकार की नीयत दर्शाता है। राज्य सरकार ने इन पूर्व उग्रवादियों अथवा आतंकवादियों को उनकी राष्ट्रीयता का उल्लेख किए बिना ‘स्टेट सब्जेक्ट’ बताया है, जैसे कि वे भारतीय नागरिक हैं अथवा राज्य के स्थायी निवासी।


यह भी एक त्रासदी है कि न तो भारत सरकार और न ही जम्मू-कश्मीर सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ के इन प्रश्नों का जवाब दिया, ‘हालात को मद्देनजर रखते हुए दोनों सरकारों, यानी केंद्र और जम्मू-कश्मीर सरकार से यह जानना जरूरी है कि उपर्युक्त पुनर्वास नीति अभी जारी है अथवा नहीं, और अगर उसमें संशोधन किया गया है, तो उसका भी विवरण दिया जाए।' अदालत ने यह भी सफाई मांगी कि इस नीति के तहत किन लोगों को और किस कानून के तहत 'आतंकी', 'उग्रवादी' और 'कट्टर आतंकवादी' माना गया था। दोनों ही सरकारें इस नीति के फायदे और परिणाम को समझे बिना नीति का गुणगान कर रही हैं।

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