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आतंक के ठिकाने: पाकिस्तान को किसी भी नए प्रमाण की जरूरत नहीं, भारत के लिए भी संदेश स्पष्ट

Wed, 26 Aug 2026 08:49 AM IST
न्यूज डेस्क अमर उजाला, नई दिल्ली।
अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: न्यूज डेस्क Updated Wed, 26 Aug 2026 08:49 AM IST
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सार
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना का निशाना बने आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के मुख्यालय का दोबारा खड़ा होना दर्शाता है कि आतंकवाद को लेकर इस्लामाबाद की नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। आतंक के ठिकाने अगर फिर खड़े किए जा रहे हैं, तो भारत के लिए भी संदेश स्पष्ट है।
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Terror Havens Pakistan needs no new evidence message for India also clear on terrorism
आतंकवाद पर पाकिस्तान की नीति में बदलाव नहीं - फोटो : अमर उजाला प्रिंट-ग्राफिक्स

विस्तार

वैसे तो भारत के खिलाफ आतंकवाद को हथियार बनाने की पाकिस्तान की नीति को लेकर किसी भी नए प्रमाण की जरूरत नहीं है, लेकिन बहावलपुर स्थित जैश-ए-मोहम्मद के मुख्यालय का फिर से खड़ा हो जाना इस नीति की निरंतरता का एक ऐसा प्रतीक जरूर है, जिसे नजरअंदाज करना कठिन है। उल्लेखनीय है कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना ने जैश के इस ठिकाने पर हमला किया था, जिसमें इसके सरगना मसूद अजहर के परिवार के सदस्यों समेत कई आतंकी भी मारे गए थे।



भारतीय कार्रवाई का उद्देश्य केवल किसी इमारत को ध्वस्त करना नहीं था, बल्कि उस आतंकवादी ढांचे को चोट पहुंचाना था, जो लंबे समय से भारत के खिलाफ हिंसा और आतंक की साजिशों का केंद्र रहा है। ऐसे में, उसका पुनर्निर्माण किया जाना इस बात का संकेत है कि पाकिस्तान में आतंकवाद का ढांचा केवल जीवित ही नहीं है, बल्कि उसे दोबारा खड़ा करने के लिए समर्थन और संसाधन भी उपलब्ध हैं। पाकिस्तान लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने खुद को आतंकवाद से पीड़ित बताते हुए इसके खिलाफ कार्रवाई का दावा करता रहा है, लेकिन जमीन पर उसके व्यवहार और दावों में दिखाई देने वाला अंतर अब भी बना हुआ है।


दरअसल, भारत के संदर्भ में आतंकवाद पाकिस्तान की सुरक्षा और विदेश नीति के उस पुराने ढांचे का हिस्सा रहा है, जिसमें भारत के खिलाफ प्रत्यक्ष युद्ध के बजाय छद्म युद्ध को अधिक सुविधाजनक हथियार माना गया। गौरतलब है कि जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र ने वैश्विक आतंकी घोषित कर रखा है। रिपोर्टों के अनुसार, जैश के मुख्यालय के पुनर्निर्माण पर तकरीबन 25 करोड़ पाकिस्तानी रुपये खर्च किए गए हैं। ये तथ्य इसलिए भी गंभीर हैं कि आर्थिक संकट से जूझ रहा पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के कर्ज पर निर्भर है और हाल में अमेरिका से पश्चिम एशिया में अपनी मध्यस्थता के बदले 10 अरब डॉलर की मांग तक कर चुका है।

ऐसे में, आतंकवादी ढांचे के पुनर्निर्माण पर संसाधन खर्च होना उसकी प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यह विडंबना ही है कि आर्थिक बदहाली, राजनीतिक अस्थिरता और आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों से घिरा पाकिस्तान अब भी आतंकवाद को रणनीतिक हथियार मानता है। आतंकवादी संगठनों को संरक्षण देकर कोई देश लंबे समय तक आर्थिक विकास और सामाजिक शांति की उम्मीद कर भी नहीं सकता। आतंक के ठिकाने अगर फिर खड़े किए जा रहे हैं, तो यह मानने का कोई कारण नहीं कि इस्लामाबाद की नीति बदली है। ऐसे में, भारत के लिए बहावलपुर से मिलने वाला संदेश स्पष्ट है, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लंबी हो सकती है, लिहाजा इसमें ढिलाई की कोई गुंजाइश नहीं है।

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