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अमेरिका के हाथ से निकलती बाजी

Fri, 19 Jul 2013 09:09 PM IST
कुलदीप तलवार
कुलदीप तलवार Updated Fri, 19 Jul 2013 09:09 PM IST
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tension of america

अफगानिस्तान से जैसे-जैस नाटो फौज के निकलने का समय निकट आ रहा है, अमेरिका की चिंता बढ़ रही है। अफगान सरकार व तालिबान के साथ शांति वार्ता के लिए दोहा में खोला गया दफ्तर तालिबान ने बंद कर दिया है। इससे व्हाइट हाउस की चिंता और बढ़ गई है। तालिबान की तरफ से अस्थायी तौर पर दफ्तर बंद करने की घोषणा दफ्तर की इमारत पर झंडा लगाने की इजाजत न मिलने के विरोध के रूप में सामने आई है।

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अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता ने कहा है कि प्रक्रिया में आ रही कठिनाइयों के बावजूद हम इसे आगे बढ़ाने के प्रयास में हैं। दरअसल जब पिछले माह दफ्तर खोला गया था, तो झंडा लगाने के झगड़े के कारण शांति वार्ता के लिए की जाने वाली कोशिशों को धक्का लगा था। कतर प्रशासन के दबाव पर तालिबान ने झंडा उतार लिया था, लेकिन कुछ देर बाद एक छोटे पोल पर दोबारा झंडा लगा दिया गया था।
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दोहा में दफ्तर बंद होने के और भी बहुत से कारण हैं। जैसे तालिबान का उन शर्तों को नहीं मानना, जिन शर्तों को अमेरिका ने तालिबान के सामने रखा है। इनमें प्रमुख है कि वे अफगानिस्तान के संविधान को मानेंगे, अल कायदा के साथ संबंध खत्म कर देंगे और महिलाओं के अधिकारों का पूरा सम्मान करेंगे। बल्कि तालिबान ने उल्टे अपनी शर्तें रख दीं, जिसमें कहा गया कि अमेरिका से बातचीत तभी होगी, जब अमेरिका अफगानिस्तान से निकल जाए और उसे पूरी तरह अफगानियों यानी तालिबान के सुपुर्द कर दे। दरअसल तालिबान अच्छी तरह जानते हैं कि हर लिहाज से पिछले दस साल से जारी जंग ने अमेरिका की कमर तोड़ दी है। अमेरिका द्वारा खरबों डालर खर्च करने और भारी जानी नुकसान उठाने के बावजूद वे मजबूत हुए हैं।
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अमेरिका के पास दूसरा विकल्प है  पाकिस्तान पर दबाव बनाकर अफगानिस्तान में जंग को खत्म कराना। हाल में अफगानिस्तान के सेनाध्यक्ष करीमी ने कहा ही है कि पाकिस्तान चाहे तो अफगानिस्तान में जंग चंद सप्ताह में ही खत्म हो सकती है। काबिले गौर है कि अफगानिस्तान में तालिबान ने राष्ट्रपति नजीब से खूनी क्रांति के बाद सत्ता पर कब्जा किया था, उस समय भी पाक ने ही तालिबान जैसे क्रूर शासकों की सरकार को मान्यता सबसे पहले दी थी। पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ इन दिनों बेशक दूसरी राजनीतिक पार्टियों से व कानून लागू करने वाली और गुप्त एजेंसियों से आतंकवाद को खत्म करने के लिए मशवरे कर रहे हैं, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा नीति बनाई जा सके, पर उनकी सफलता संदिग्ध है।

अमेरिका के सामने तीसरा विकल्प है कि अफगानिस्तान को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दे और वहां से फरारी हासिल कर ले। तालिबान ने अफगानिस्तान में राष्ट्रपति भवन पर हमला करके बता दिया है कि इस समय वे इतनी बड़ी संख्या में मौजूद हैं कि नाटो सेना के हटते ही अफगानिस्तान के कई हिस्सों पर कब्जा करके अपनी सरकार कायम करने में सफल हो जाएंगे। वैसे आम ख्याल यही है कि नाटो सैनिकों के हटते ही अफगानिस्तान गृहयुद्ध का शिकार हो जाएगा। अफगान फौज जिसकी संख्या इस समय 3.5 लाख है और जिसे अमेरिका ने प्रशिक्षण दिया है, वह भी हालात को सुधारने में मददगार साबित नहीं होगी, क्योंकि इस फौज में हजारों तालिबान घुसपैठ कर गए हैं।


कुछ खबरें ऐसी भी आती रहती हैं कि जब वे छुट्टी पर जाते हैं, तो वापस नहीं लौटते, क्योंकि तालिबान उनके व उनके परिवार के लोगों को फौज छोड़ने के लिए धमकाते हैं, सवाल उठने लगे हैं कि अमेरिका को दहशतगर्द तालिबान से बातचीत करनी थी, तो कथित आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध में हजारों लोगों की जान गंवाने की क्या जरूरत थी? क्या एक बार फिर यह साबित नहीं होगा कि अमेरिका किसी का मित्र नहीं है? देखना है कि अगले कुछ दिनों में अफगानिस्तान के हालात किस करवट बैठते हैं? भारत को हालात पर अपनी पैनी नजर रखनी होगी, क्योंकि अफगानिस्तान में भारत का बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। भारत को रूस, ईरान और मध्य एशियाई देशों के साथ भी वार्ता शुरू कर देनी चाहिए।

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