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टीम इंडिया के 'मनमोहन'

Wed, 19 Dec 2012 12:39 AM IST
नीरज पांडे
नीरज पांडे Updated Wed, 19 Dec 2012 12:39 AM IST
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team indias manmohan

उस दिन सचिन तेंदुलकर सस्ते में निपट गए, तो मेरे मित्र तनाव में आने लगे। इससे पहले कि मैं सचिन की शान में कोई गुस्ताखी करता, मित्र प्रसंग बदलते हुए सर्दी के मौसम में हो रही बरसात पर हैरान होने लगे। वह सचिन के घनघोर प्रशंसक हैं, लिहाजा मैं उनकी दिक्कत ताड़ गया। मैंने कहा, जब आप इतना तनाव महसूस कर रहे हैं, तो खुद सचिन कितना...। मित्र ने बात बीच में ही काट दी और दार्शनिक हो गए-तनाव जीनियस बनने की प्रक्रिया में उत्प्रेरक का काम करता है। महान लोग ऐसे प्रेशर से परे होते हैं। वे पराजय की पीड़ा को पी-पीकर इतने भरे हुए होते हैं कि आलोचना की बूंदों के लिए जगह ही नहीं बचती।

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मित्र के तर्क की काट में मैं रिकी पोंटिंग की शानदार विदाई की चर्चा छेड़ने ही वाला था कि उन्होंने चैनल बदल डाला। अब टीवी स्क्रीन पर सचिन की जगह मनमोहन सिंह दिखाई पड़ने लगे। पोंटिंग की महानता पर कुछ कहने की हसरत अधूरी रह गई, सो मुझे कुढ़न होने लगी। मैंने टीवी पर प्रधानमंत्री को देखते हुए कहा-टाइमिंग का बड़ा महत्व होता है। आप सही समय पर सही फैसला नहीं लेते, तो सम्मान खो देते हैं। तब नए-नए दावेदारों के नाम तो उछलने ही लगते हैं। वेटिंग में चल रहे बेचारे भी आखिर कितना इंतजार करें! मित्र ने शंका भरी नजरों से देखते हुए कहा-आप किसकी बात कर रहे हैं?
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मैंने कहा, बात व्यक्ति विशेष की नहीं, हालात की है। रिटायरमेंट भी कोई चीज होती है, आखिर कब तक...?
मित्र ने सचिन का स्वयंभू प्रवक्ता बनते हुए मुझे बीच में ही रोका- पारी घोषित करते हुए लोग कहते हैं कि मैं रिटायर्ड हूं, टायर्ड नहीं। लेकिन मेरा मानना है कि ऐसे बयान वीरोचित नहीं होते। बहादुर वे होते हैं, जो कहते हैं कि मैं न टायर्ड होऊंगा, न रिटायर्ड।
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मित्र को अतिशय इमोशनल होता देख मैंने सफाई दी-भाई साहब, मैं सचिन की नहीं, मनमोहन सिंह की बात कर रहा था। मित्र बिफर पड़े-मैं भी मनमोहन सिंह की ही बात कर रहा हूं। सचिन सही मायने में टीम इंडिया के मनमोहन सिंह हैं। मैंने कहा-सचिन और मनमोहन की क्या तुलना, दोनों अलग-अलग पिच पर हैं। मित्र बोले-गलत, दोनों की पिच एक जैसी है। दोनों राज्सभा के सदस्य हैं और सबसे बड़ी बात यह कि दोनों के खिलाफ अविश्वास मत हमेशा गिर जाता है। चर्चा के दौरान मित्र पहली बार कॉन्फिडेंट दिखे। उनकी आंखों में चमक थी और फ्लोर मैनेज कर लेने का दंभ भी।


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