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ठंडी चाय गरम...
अनूप वाजपेयी
Updated Wed, 04 Dec 2013 07:05 PM IST
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बचपन में देशभक्ति के एक गीत की पैरोडी गुनगुनाता था। उसी की एक लाइन याद आती है, ठंडी चाय गरम, वंदे मातरम। इन पंक्तियों की रचना किस सिरफिरे ने कैसे की, इसका तो पता नहीं। लेकिन बचपन में हम स्टेशन पर चायवालों को देखते ही इसे गुनगुनाने लगते थे। कई बार चायवाले इस पर नाराज हो जाते थे, तो कभी हमारी शरारत समझकर हंस पड़ते थे।
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गुलामी के दौरान चाय की लत डलवाने के लिए अंग्रेज इसे जगह-जगह बंटवाते थे। स्टेशनों पर तो खासकर इसकी व्यवस्था की जाती थी। हमारे पुरखों में चाय पीने की आदत तो अंग्रेजों ने ही डाली। हां, मूल स्वाद को बदलने का काम हमारे देसी चाय वालों ने किया है। कहीं मसाला चाय मिलती है, तो कहीं लेमन टी, किसी को कड़क अदरक वाली चाय का हुनर आता है, तो किसी को डिप-डिप की चुस्की का सटीक मेजरमेंट पता है। उबलते पानी में खूब चीनी और दूध डालकर बनी चाय अगर अंग्रेज देख लें, तो हो सकता है, बेहोश हो जाएं।
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चाय गर्म ही अच्छी लगती है। हां, कॉफी कोल्ड भी पी सकते हैं। चाय वालों की भी अलग-अलग श्रेणी होती है। हालांकि वैसे चाय बेचने वाले अब नहीं दिखते। ठंड के दिनों में ट्रेन के स्लीपर क्लास के डिब्बे में खटकेदार शीशे वाली खिड़की बंद होने के बाद भी उसकी कर्कश करुण पुकार जब कानों में पड़ती थी, तब नींद भाग खड़ी होती थी। सरियों के बीच से उसके कुल्हड़ टिकाने की कला भी धीरे-धीरे लुप्त हो रही है। चलती ट्रेन में पाई-पाई हिसाब उसकी ईमानदारी बयां करता था। अब न तो वैसी चाय रह गई है और न वैसे चाय वाले, जो पूरे प्लेटफॉर्म को चाय-चाय की आवाज से गुंजायमान रखते थे। अब स्टेशनों पर बटन दबाने पर मशीन चाय उगल रही हैं।
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चाय की तरह ही चुनाव की भी अपनी गर्मी होती है। बस इन्हीं दिनों नेताओं के चेहरे पर पसीना दिखता है। राजनीति के गुण भी गरम चाय की तरह हैं। तमाम गड़े मुद्दे, बैकग्राउंड, दादा-नाना की गलतियां, चरित्र का कीचड़ चाय की तरह उबाल मारने लगता है और मतदाता चुस्की लेता रहता है। कोई कहता है, पुरानी पत्ती में उबली चाय है। कोई ठंडी चाय को गरमाने की बात करता है। इस चुनाव में भी कोई खालिस दूध की चाय पिलाने का तैयार है, तो कोई बागानों की साबुत पत्तियों का लालच दे रहा है। ऐसे में मतदाताओं को विशेष ध्यान रखना होता है कि चाय ऐसी हो, जो ताजगी भर दे।