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शर्म मगर उन्हें क्यों नहीं आती

Sun, 04 Nov 2012 12:34 AM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 04 Nov 2012 12:34 AM IST
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tavlin singh reports on corruption

केजरीवाल के किस्सों के इस मौसम में हम भूल गए हैं कि भ्रष्टाचार के कई रूप होते हैं, अपने इस भारत महान में। अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों की नजरें इतनी तंग हैं भ्रष्टाचार के मामले में कि उनको सिर्फ वही तथाकथित भ्रष्टाचार दिखता है, जिसमें राजनेता और उद्योगपति लिप्त हों। और हम मीडियावाले उनके इतने मुरीद हो गए हैं कि हमारी नजरें भी तंग हो गई हैं।

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सो, पिछले सप्ताह जब उच्चतम न्यायालय ने यमुनाजी की सफाई पर खरचे गए तकरीबन 5,000 करोड़ रुपये पर सवाल उठाए, तो हमने इस बात को ऐसे पेश किया अपने पाठकों और दर्शकों के सामने जैसे कि यह बहुत छोटी बात हो। यह छोटी बात बिलकुल नहीं है। इस नदी का अगर वह हाल हो गया भविष्य में जो वजीराबाद और ओखला के दरमियान हम दिल्ली वालों ने किया है, तो संभव है कि कई करोड़ लोगों का जीवन बरबाद हो जाएगा।
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बड़ी-बड़ी बस्तियां और विशाल नगर वीरान हो जाएंगे। यह बात क्या केजरीवाल साहब के आरोपों से ज्यादा गंभीर नहीं है? क्या यह बात शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पर नरेंद्र मोदी की टिप्पणी और उस पर किए गए एतराज से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं है? होनी चाहिए लेकिन पिछले सप्ताह के अखबारों और समाचार चैनलों पर इन चीजों को यमुना जी से कहीं ज्यादा अहमियत दी गई।
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हर चैनल ने लगातार केजरीवाल साहब के नए आरोपों का जिक्र किया। और हर चैनल पर दिखीं श्रीमती सुनंदा जिन्होंने सबको 'एक्सक्लूसिव' बातचीत में गुजरात के मुख्यमंत्री को नसीहत दी कि अगर वह मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं, तो उनको औरतों की इज्जत करनी चाहिए। इस बीच, दिल्ली शहर की नालियों द्वारा कई हजार लीटर गंदगी और बह गई यमुना नदी में। विशेषज्ञों के मुताबिक यमुनोत्री से लेकर वजीराबाद तक नदी का पानी काफी हद तक साफ है, लेकिन यहां से लेकर ओखला तक 15 नालियों का मैल अपने में समाकर यमुना जी खुद गंदी नाली बन जाती हैं।

इस पवित्र नदी के गंदे पानी को स्वच्छ करने के बहाने पिछले 18 वर्षों में औपचारिक तौर पर दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने 4439 करोड़ का निवेश किया है। लेकिन नदी के पानी में इन करोड़ों रुपयों का बिलकुल असर नहीं दिखता है और इसी बात पर अब सुप्रीम कोर्ट ध्यान दे रहा है।

काश कि देश के उच्चतम न्यायालय की निगरानी में यमुना जी और गंगा जी की सफाई शुरू से रखी गई होती तो, शायद जनता का पैसा इस तरह बरबाद न होता, जैसा हुआ है। गंगा जी की सफाई में निवेश हो रहा है, 1986 से जब प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गंगा एक्शन प्लान नाम की योजना शुरू की थी, लेकिन 15 वर्षों और 901 करोड़ रुपये खरचे जाने के बाद देखा गया कि गंगा जी के पानी में थोड़ी सी भी सफाई नहीं आई है, तो यह योजना समाप्त कर दी गई।
 
उस समय वाराणसी की नगरपालिका ने संकट मोचन मंदिर के महंत वीरभद्र मिश्र, से एक नई योजना बनवाई। महंत जी उन लोगों में से हैं, जिन्होंने गंगा जी की सफाई के लिए सबसे ज्यादा प्रयास किए हैं। कुछ वर्ष पहले जब मैंने उनसे वाराणसी में गंगा किनारे स्थित प्राचीन मंदिर में मुलाकात की तो वह मायूस हो चुके थे। इसलिए कि जब वाराणसी नगरपालिका ने उनकी योजना पर अमल करने की कोशिश की तो, उत्तर प्रदेश सरकार ने उसे रोक दिया। मामला अदालतों में कई वर्ष अटका रहा है और महंत जी के सुझाव भुला दिए गए।

मेरी जब उनसे भेंट हुई तो उन्होंने कहा, 'गंगा जी तभी स्वच्छ हो सकती हैं, जब उसके अंदर मल न फेंका जाए। मेरी योजना के तहत बनारस की गंदी नालियों का रुख बदल डालने का प्रावधान है। मल अगर गंगा जी में डाला ही न जाए, जैसे अंगरेजों के जमाने से पहले था, तो समस्या का आधा हल अपने आप हो जाएगा। ' महंत जी ने गंगा एक्शन प्लान वालों को भी यह सुझाव दिया था, लेकिन उन्होंने अपनी योजना पर अमल किया। सो, बन गए नदी किनारे कई सारे सीवेज प्लांट, लेकिन कोई फर्क नहीं आया।


सच तो यह है कि हमारे आला अधिकारी, हमारे बड़े राजनेता गंभीरता से लेते ही नहीं है इस काम को, वरना कब का साफ हो गया होता गंगा-यमुना का पानी। लानत है उन पर, जो एक तरफ तो पूजा करते हैं इन पवित्र नदियों की और दूसरी तरफ उन्हीं के पानी पर नींव रखते हैं अपने गंदे नापाक व्यवसाय की। पाप तो लगेगा उनके सिर कभी न कभी, लेकिन जब तक यह होगा, जब तक हमारे अति सतर्क पर्यावरण मंत्रालय को होश आएगा, मुमकिन है कि भारत की सबसे पवित्र नदियां हमेशा हमेशा के लिए बरबाद हो गई होंगी और जिस दायरे में बहती हैं, वहां के लोग भी बरबाद हो गए होंगे।

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