नेहरू पर निशाना, बंगाल पर निगाहें

नीलांजन मुखोपाध्याय Updated Sun, 12 Apr 2015 07:42 PM IST
Target on Nehru, Eyes on west bengal
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इतिहास में नजर दौड़ाएं, तो सरकारें हमेशा जासूसी करती रही हैं। भारत में खुफिया व्यवस्था प्राचीन काल से ही अस्तित्व में रही है। मध्यकालीन भारतीय इतिहास में जासूसी का एक विराट तंत्र विकसित करने का श्रेय शिवाजी को जाता था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जीवनी में मैंने लिखा है कि वह शिवाजी के जासूसी के नेटवर्क से बेहद प्रभावित थे। पिछले लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान मोदी पर ये आरोप लगे थे कि उन्होंने एक महिला पर नजर रखी थी और उसके कॉल रिकॉर्ड तक पहुंच बनाने में सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया था। हालांकि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उस महिला ने यह कहते हुए उस मामले को बंद करने की गुजारिश की थी कि उससे उसकी निजता भंग नहीं हुई है।
देश में आज जासूसी की जो व्यवस्था और ढांचा है, वह अंग्रेजों द्वारा विकसित किया गया है। खासकर 1857 के बाद उन्हें राष्ट्रवादियों पर नजर रखने की आवश्यकता थी। आजादी के बाद ये खुफिया एजेंसियां नई सरकार के नियंत्रण में आ गईं। ये एजेंसियां प्रांतीय और राष्ट्रीय, दोनों स्तरों पर अस्तित्व में थीं। बीती सदी के साठ के दशक के अंत और सत्तर के दशक की शुरुआत में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रॉ (रिसर्च ऐंड एनालिसिस विंग) का गठन किया। रॉ का गठन विदेशों में जासूसी के लिए किया गया, जबकि आईबी (इंटेलीजेंस ब्यूरो) पहले की तरह अंदरूनी खुफिया व्यवस्था की जिम्मेदारी निभाता रहा। 1971 के युद्ध और बांग्लादेश के गठन में रॉ ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

आजादी के बाद के शुरुआती दो दशकों में सत्ता के केंद्रीकरण के वैसे उदाहरण सामने नहीं आए, जैसे बाद में इंदिरा गांधी के समय में दिखाई पड़े। जवाहरलाल नेहरू निस्संदेह आजादी के बाद के सबसे ताकतवर नेता थे, पर उनकी कैबिनेट के दूसरे लोग भी कमजोर नहीं थे। सरदार पटेल की मृत्यु के बाद सी राजगोपालाचारी, कैलाशनाथ काटजू, पंडित गोविंद वल्लभ पंत, लाल बहादुर शास्त्री और गुलजारी लाल नंदा जैसे लोग गृह मंत्री बने थे। इनमें से सभी कद्दावर नेता थे, इसलिए यह कल्पना करना कठिन है कि इनके विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री नेहरू अपने मन से कोई कदम उठा सकने में समर्थ थे। इसके अलावा नेहरू का जिन मुख्यमंत्रियों से सामना होता था, वे बेहद मजबूत क्षेत्रीय नेता थे।

इस पृष्ठभूमि की याद इसलिए दिलाई जा रही है, क्योंकि पिछले कुछ दिनों में इन तथ्यों को भुलाकर कुछ खास बिंदुओं पर जोर दिया जा रहा है। मसलन, यह बताया जा रहा है कि नेहरू ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिवारजनों की जासूसी का गोपनीय आदेश दिया था। यह भी कहा जा रहा है कि ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि नेहरू को लगा कि नेताजी की शायद विमान दुर्घटना में मृत्यु नहीं हुई है, और अगर वह जीवित हैं, तो उनके बारे में उनके परिवारजनों को किसी न किसी रूप में सूचनाएं मिल रही हैं। पचास और साठ के दशक में सूचनाओं का एकमात्र स्रोत पत्र हुआ करते थे। और कोलकाता में बोस परिवार के दो मकानों में पहुंचने वाली और वहां से निकलने वाली चिट्ठियां कॉपी की जाती थीं। कहा यह भी जा रहा है कि बोस परिवार की जासूसी से जुड़ी ये सूचनाएं गलती से सार्वजनिक कर दी गई हैं।

पहले आखिरी मुद्दे से शुरुआत करते हैं। भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार को यह बताना चाहिए कि इन फाइलों को सार्वजनिक करके क्या पिछली कांग्रेस सरकार ने गलती की है। जैसे ही मोदी सरकार ऐसा कहेगी, उसे इसका भी जवाब देना होगा कि इस मुद्दे पर उसने यू-टर्न क्यों लिया है। उसे दो मुद्दों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी पड़ेगी-चुनाव अभियान के दौरान नेताजी से जुड़ी तमाम फाइलों को सार्वजनिक करने का वायदा करने वाले राजनाथ सिंह अब खामोश क्यों हैं। दूसरा यह कि प्रधानमंत्री कार्यालय को इसका जवाब देना होगा कि फाइल सार्वजनिक होने से संबंधित देशों के साथ हमारे रिश्ते क्यों खराब हो जाएंगे। अगर यह मान भी लें कि प्रधानमंत्री कार्यालय जो कह रहा है, वह सच है, तो सवाल यह है कि हमारी सरकार को उस देश (या उन देशों) के साथ बेहतर रिश्ता क्यों बनाए रखना चाहिए, जिसने नेताजी के साथ ऐसा सुलूक किया। अगर सरकार इन सवालों के जवाब देती है, तो फिर इस पर राष्ट्रीय बहस होनी ही चाहिए कि क्या नेहरू ने बोस परिवारों की जासूसी इसलिए कराई, क्योंकि उन्हें सुभाषचंद्र बोस के अचानक एक दिन नाटकीय ढंग से प्रकट जाने का डर था?

अगर गैरकांग्रेसी पार्टियों का मानना है कि कांग्रेस ने 1945 में नेताजी की विमान दुर्घटना में मृत्यु के बारे में झूठ बोलकर पूरे देश को भ्रमित किया है, तो केंद्र की गैरकांग्रेसी सरकारों ने नेताजी से जुड़ी वे जानकारियां सार्वजनिक क्यों नहीं कीं? कम से कम तीन ऐसे मौके थे, जब वे यह काम कर सकती थीं। मसलन, 1977 से 1980 के बीच की जनता पार्टी की सरकार यह खुलासा कर सकती थी। 1989 से 1991 के बीच भी यह मौका आया था, जब वीपी सिंह और चंद्रशेखर की सरकारें थीं। उसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी के छह साल के प्रधानमंत्री काल में भी यह मौका आया था। पर उस सरकार ने मुखर्जी कमीशन बिठाकर वस्तुतः एक मौका ही गंवाया। पिछले साल सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार के पास भी यह मौका आया, लेकिन उसने नेताजी से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक करने से मना कर दिया।

पर अब जिस तरह से भाजपा ने यह विवाद उछाला है, उससे लगता है कि अगले साल पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव पर उसकी नजर है। संभव है कि भाजपा इस मुद्दे को जीवित रखे और विधानसभा चुनाव से पहले नेताजी से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक कर दे। इससे पश्चिम बंगाल में भाजपा को अचानक मजबूती मिल सकती है, पर उसके लिए जरूरी होगा कि वह बंगाल के चुनाव में ममता के मुकाबले बोस परिवार का कोई प्रत्याशी उतारे। यह नरेंद्र मोदी की पुरानी रणनीति है-वह सरदार पटेल से लेकर सुभाषचंद्र बोस जैसे राष्ट्रनायकों को अपनी पार्टी का नायक बनाकर सीमित करना चाहती है!

वरिष्ठ पत्रकार, और नरेंद्र मोदी, द मैन, द टाइम्स के लेखक

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