अपनों के निशाने पर
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बावजूद इसके कि वह कांग्रेस के पुराने प्रहरी रहे हैं, राहुल गांधी पर निशाना लगाने वालों में उनका नाम सबसे पहले आया। दरअसल कभी राहुल के प्रमुख सलाहकार रहे दिग्विजय सिंह ने यह कहते हुए इसकी शुरुआत की कि जरूरी मुद्दों पर राहुल की चुप्पी ने पार्टी की छवि को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया। उनके मुताबिक इसी वजह से कांग्रेस 'धारणा की लड़ाई' हार गई। इसके जवाब में ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी (एआईसीसी) के 14 वफादार सचिवों ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से सार्वजनिक तौर पर ऐसे बयान देते समय थोड़ी सतर्कता बरतने की अपील की थी। आखिरकार जनार्दन द्विवेदी ने पार्टी के युवा और वरिष्ठ नेताओं से मीडिया के सामने खुलकर एक दूसरे से टकराव से बचने की अपील की। उनका यह संदेश साफ तौर पर कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों, पदाधिकारियों और वरिष्ठ नेताओं के लिए था। स्वाभाविक रूप से ऐसा उन्होंने पार्टी के महासचिव (संगठन) की हैसियत से और कांग्रेस अध्यक्ष के कहने से किया।
दरअसल लोकसभा चुनाव में मिली पराजय के बाद से राहुल गांधी पर हो रहे हमलों को चुप कराने के लिए सोनिया ने यह तरीका अख्तियार कर रखा है। ऐसे में यह मानना मुश्किल है कि राहुल ब्रिगेड के 14 सचिवों ने कांग्रेस उपाध्यक्ष की मंजूरी के बगैर यह बयान जारी किया होगा। और यह भी नहीं माना जा सकता कि इस मुहिम को सोनिया की मंजूरी के बिना राहुल ने हरी झंडी दिखाई होगी। साफ है कि पार्टी की इस आंतरिक गहमागहमी को सोनिया और राहुल की टीम की लड़ाई मानना गलत होगा। सोनिया और राहुल गांधी एक ही नीति पर चल रहे हैं।
दूसरी ओर, 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की दुर्दशा के बाद राहुल गांधी की कार्यशैली और वरिष्ठों से उनकी बढ़ती दूरी को लेकर पार्टी के बुजुर्गों की नाराजगी अब खुलकर सामने आने लगी है। यहां दिग्विजय सिंह की टिप्पणी गौर करने लायक है। यह सच है कि अपनी पहचान बनाने का राहुल के पास वह मौका था, जिसका सपना हर नेता देखता है। अफसोस की बात है कि आज भी वह लोकसभा में कांग्रेस का नेतृत्व करने के इच्छुक नहीं दिखते। मजे की बात है कि उत्तर प्रदेश में बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा का सदन में विरोध करने वह वेल तक पहुंच गए, मगर सांप्रदायिक हिंसा विधेयक पर बोलने में संकोच करते रहे। मगर इस कहानी का एक दूसरा पहलू भी है। राहुल के नजदीकी माने जाने वाले मधुसूदन मिस्त्री ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उनके मुताबिक, दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ नेताओं ने राहुल को यह सलाह तब क्यों नहीं दी, जब उनके पास मौका था। आखिर ये नेता निर्णय लेने की प्रक्रिया का हिस्सा थे। चाहे कुछ भी हो, अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस में सार्वजनिक तौर पर जो मारा-मारी मची है, वह अविश्वसनीय है। कांग्रेस के लिए खतरा इसलिए और भी ज्यादा है, क्योंकि उसके विरोध में नरेंद्र मोदी के रूप में ऐसा दुर्जेय नेता खड़ा है, जो भाजपा की बहुमत सरकार का नेतृत्व तो कर ही रहा है, साथ ही, उसने राजनीति के सारे तौर-तरीके बदल कर रख दिए हैं।
वैसे युवाओं और वरिष्ठों के बीच वर्चस्व को लेकर चल रही लड़ाई केवल कांग्रेस के भीतर की बात नहीं है। नेशनल कॉन्फ्रेंस में ऐसा हुआ था, जब फारूक अब्दुल्ला अपने पुत्र उमर अब्दुल्ला के लिए जगह बना रहे थे। दो वर्ष पहले समाजवादी पार्टी के भीतर भी यही हालात थे। हां, यह अलग बात है कि कांग्रेस में इसकी प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है, और मुलायम सिंह यादव ने पार्टी या सरकार पर से अपनी पकड़ अब तक ढीली नहीं होने दी। दूसरी ओर भाजपा में बदलाव का यह चक्र पूरा हो चुका है। सरकार पर मोदी का पूरा नियंत्रण है, और भाजपा की कमान उनके भरोसेमंद अमित शाह के हाथों में है। दरअसल मोदी और उनकी टीम की असल तैयारी दिसंबर, 2012 से ही शुरू हो गई थी, जब मोदी ने तीसरी बार गुजरात का चुनाव जीता था। नरेंद्र मोदी के लिए यह आसान नहीं था, मगर उन्होंने पहले आरएसएस को अपने पक्ष में किया, और फिर उन्होंने अपने विरोधियों को किनारे लगाना शुरू किया। गौरतलब है कि लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे 75 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग नेताओं को हाशिये पर लाने के लिए उन्होंने उस दिन तक इंतजार किया, जब तक उनकी अपनी स्थिति बेहद मजबूत नहीं हो गई।
दूसरी ओर राहुल गांधी पार्टी के बुजुर्ग नेताओं को दरकिनार करने की कोशिश तब कर रहे हैं, जब वह बेहद कमजोर स्थिति में हैं। यह समझा जा सकता है कि वे अपनी टीम के जरिये काम करना चाहते हैं, न कि उन लोगों के साथ, जिन्हें वह पार्टी की वर्तमान दुर्दशा का जिम्मेदार मानते हैं। मगर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उपाध्यक्ष के तौर पर पार्टी का पुनर्गठन करते वक्त उनकी यह जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वह युवाओं को प्रोत्साहन देने के साथ वरिष्ठ नेताओं को भी अपने साथ जोड़े रखें। गौरतलब है कि अपने नाम पर स्पष्ट जनादेश पाने के बावजूद मोदी को अपनी कैबिनेट में राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज जैसे वरिष्ठ नेताओं को जगह देनी पड़ी। फिर जब आप कमजोर होते हैं, तो पार्टी के हर व्यक्ति तक पहुंच बनाने की जरूरत ज्यादा बढ़ जाती है।
यही वजह है कि पार्टी के भीतर और बाहर के लोग मानते हैं कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी की वर्तमान हालत को देखते हुए यह जरूरी है कि सोनिया गांधी यूपीए-दो के वक्त की तुलना में कुछ ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाएं। 1998 में जब वह सक्रिय राजनीति में आई थीं, तो पार्टी टूटने के कगार पर थी। पार्टी को एकजुट बनाए रखने और युवा व वरिष्ठ नेताओं के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए आज फिर उन्हें वैसी ही भूमिका निभाने की जरूरत है। यह पार्टी के लिए और लोकतंत्र के लिए भी जरूरी है, जिसे एक प्रभावी विपक्ष की जरूरत है।