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दो ध्रुवीय नहीं रही तमिल सियासत
Wed, 26 Feb 2020 06:51 PM IST
Raman Singh
एम भास्कर साई
एम भास्कर साई
Published by: Raman Singh
Updated Wed, 26 Feb 2020 06:51 PM IST
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के पलानीस्वामी
- फोटो : a
पिछले कई दशकों से तमिलनाडु की सियासत दो चीजों के लिए जानी जाती रही है-द्विध्रुवीयता और व्यक्तित्व का वर्चस्व। 1972 तक कांग्रेस और द्रमुक के बीच में ही प्रतिद्वंद्विता रही, अभिनेता एम जी रामचंद्रन द्वारा अपनी पार्टी बनाने के बाद यह अन्नाद्रमुक और द्रमुक के बीच प्रतिद्वंद्विता में तब्दील हो गई, जो आज भी जारी है। इसके साथ ही कामराज, अन्नादुरई, करुणानिधि, एमजीआर और जयललिता जैसे कद्दावर नेताओं के प्रति लोग आकर्षित हुए।
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हालांकि पहली बार अब तमिलनाडु की राजनीति न तो दो-ध्रुवीय है और न ही व्यक्तित्व से संचालित हो रही है। हाल के वर्षों में करुणानिधि और जयललिता की मृत्यु के बाद उनकी पार्टियों के पास अब कोई करिश्माई नेता नहीं है, जिनके प्रति कार्यकर्ताओं की निर्विवाद निष्ठा हो। और तमिल सिनेमा के सुपरस्टार रजनीकांत के राजनीति में प्रवेश के साथ राज्य की राजनीति केवल दो द्रविड़ पार्टियों के बीच का खेल नहीं रह गई है। मुख्यमंत्री एडापडी के पलानीस्वामी ने अभी 17 फरवरी को अपने कार्यकाल के तीन साल पूरे किए हैं। वह उप मुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेलवम के साथ अन्नाद्रमुक का नेतृत्व करते हैं, और इन 36 महीनों में उन्होंने साबित कर दिया है कि वह मुश्किलों से निपटने में उस्ताद हैं।
वर्ष 2017 में विधानसभा में विश्वासमत हासिल करने से लेकर पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट द्वारा 11 विधायकों को अयोग्य ठहराने के मामले में द्रमुक द्वारा दायर याचिका को खारिज कर मामले को राज्य विधानसभा के अध्यक्ष पी. धनपाल के पास वापस भेजने तक, उन्होंने सफलतापूर्वक सभी बाधाओं को पार किया और उम्मीद है कि उनका मुख्यमंत्रित्व काल अगले वर्ष खत्म होने वाले मौजूदा शासन के कार्यकाल के अंत तक जारी रहेगा। अन्नाद्रमुक सरकार के खिलाफ कोई बड़ी शिकायत नहीं है और जयललिता (जिनका 2016 में चुनाव जीतने के कुछ ही महीनों बाद निधन हो गया था) द्वारा शुरू की गई कल्याणकारी योजनाओं को उनके समर्थक पलानीस्वामी ने जारी रखा है।
लेकिन ये बातें इस बात की गारंटी नहीं देतीं कि 2021 के विधानसभा चुनाव में पलानीस्वामी और पन्नीरसेलवम सफल होंगे। पिछले दस वर्षों से सत्ता से बाहर रही द्रमुक इस बार जीत का स्वाद चखना चाहती है और इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए वह सभी संभव कदम उठाएगी। उसने पहले ही राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर की सेवाएं ली हैं और एक मजबूत गठबंधन का नेतृत्व कर रही है, जिसमें कांग्रेस, एमडीएमके, माकपा, भाकपा, वीसीके और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग शामिल हैं। इसके अलावा एमजीआर जैसे लोकप्रिय अभिनेता द्वारा स्थापित और जयललिता जैसी अभिनेत्री द्वारा पोषित अन्नाद्रमुक को अगले वर्ष के विधानसभा चुनाव में सुपरस्टार रजनीकांत से व्यक्तित्व की लड़ाई भी लड़नी होगी। इसलिए पलानीस्वामी और पन्नीरसेलवम को लगातार काम करना होगा और सत्ता में बने रहने के लिए रणनीतियों और समाधानों के साथ सामने आना होगा।
द्रमुक की बात करें, तो वर्ष 2011 से लगातार हार का सामना कर रही इस पार्टी ने पिछले वर्ष जोरदार वापसी की, जब उसने लोकसभा चुनाव में 39 में से 38 सीटों पर जीत हासिल की। इससे यह साबित हुआ कि अपने पिता करुणानिधि की मृत्यु के बाद पार्टी के शीर्ष पद पर पहुंचे स्टालिन द्रमुक को जीत की ओर ले जाने में सक्षम हैं। वह भाजपा के कटु आलोचक रहे हैं और केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का उन्होंने नेतृत्व किया है।
हाल ही में उन्होंने नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ बड़ा हस्ताक्षर अभियान चलाया। इससे उम्मीद है कि अल्पसंख्यक समुदायों का वोट उनकी पार्टी को मिलेगा। मजबूत गठबंधन बनाने के अलावा उन्होंने हाल ही में चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को अपने साथ शामिल किया है, जिन्होंने नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार, जगमोहन रेड्डी और अरविंद केजरीवाल को चुनावी सफलता हासिल करने में मदद की है। इन तमाम सकारात्मक बातों के बावजूद वंशवादी राजनीति (स्टालिन के बेटे उदयनिधि स्टालिन को हाल ही में पार्टी की युवा इकाई का प्रमुख बनाया गया है), अन्नाद्रमुक एवं उसके सहयोगी दलों (भाजपा, पीएमके, डीएमडीके) से कड़ी चुनौती, हिंदू विरोधी छवि और अतीत में उनके नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप के साथ-साथ रजनीकांत का राजनीति में प्रवेश द्रमुक के खिलाफ जाता है।
रजनीकांत की बात करें, तो पिछले चार दशकों से तमिल सिनेमा में बॉक्स ऑफिस के बादशाह रहे रजनीकांत राजनीति में भी अपनी सफलता दोहराने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन वह खुद इस हकीकत से वाकिफ हैं कि राजनीति बहुत मुश्किल क्षेत्र है और केवल पर्दे की लोकप्रियता राजनीति में छाप छोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं है। रजनी अथवा थलाइवा (जैसा कि उनके प्रशंसक उन्हें कहते हैं) ने आध्यात्मिक राजनीति का वादा किया है। यह तमिलनाडु की पारंपरिक राजनीति से कुछ अलग है, जो मंदिरों और महान आस्तिकों की भूमि होने के बावजूद नास्तिक नेताओं के प्रभुत्व में था।
हालांकि उन्होंने अपनी पार्टी की औपचारिक शुरुआत नहीं की है (उन्हें उम्मीद है कि अगले कुछ महीने में वह अपनी पार्टी लॉन्च करेंगे), लेकिन उन्होंने पहले ही वादा किया है कि वह अपने सभी वादे पूरे करेंगे और सत्ता में आने के तीन वर्षों के भीतर व्यवस्था को बदल देंगे, अगर विफल रहे, तो मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे देंगे।
भले ही उनके प्रशंसक और उनका करिश्माई व्यक्तित्व उनकी ताकत बन सकता है, लेकिन उन्हें दो दिग्गज पार्टियों-अन्नाद्रमुक और द्रमुक का सामना करना पड़ेगा, जो पचास वर्षों से ज्यादा समय से बारी-बारी से राज्य की सत्ता पर काबिज रहे हैं। उनका धनबल और बाहुबल फिल्मों में रजनीकांत द्वारा हराए गए खलनायकों से ज्यादा ताकतवर है।
इन तीनों (अन्नाद्रमुक, द्रमुक और रजनीकांत) और उनके मौजूदा सहयोगी दलों के अलावा मैदान में टीटीवी दिनाकरण और कमल हासन जैसे खिलाड़ी भी हैं। इसलिए 2021 का विधानसभा चुनाव न केवल राजनेताओं के लिए, बल्कि राज्य के लोगों के भी अलग रहने वाला है। जाहिर है, आगे दिलचस्प समय आने वाला है।