बदलाव की ओर तमिल राजनीति
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चेन्नई के एक विधानसभा क्षेत्र के चुनावी नतीजे से तमिलनाडु की राजनीति में भारी बदलाव आने की संभावना है। उस विधानसभा क्षेत्र का नाम आरके नगर है। अन्नाद्रमुक सुप्रीमो जयललिता ने जब अंतिम सांस ली, तो वह यहां की विधायक थीं। इस निर्वाचन क्षेत्र के परिणाम पर ही तमिलनाडु सरकार का भविष्य निर्भर करेगा। आरके नगर का चुनावी नतीजा राज्य में जयललिता के नाम पर चल रहे शासन के अंत की शुरुआत साबित हो सकता है। गुटों में बंटा सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक यहां कमजोर है। चुनाव प्रचार अभी चरम पर है और द्रमुक का विपक्षी उम्मीदवार न केवल मजबूत है, बल्कि सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक को कड़ी टक्कर देने में भी सक्षम है। आरके नगर का परिणाम निश्चित रूप से सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक के आंतरिक समीकरण को बदल देगा। मुख्यमंत्री ई. के. पलानीस्वामी मृदुभाषी हैं और जयललिता के निधन के बाद से राज्य का शासन चला रहे हैं।
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चुनाव के लिए चिर-परिचित चुनाव चिह्न महत्वपूर्ण होता है। सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक पार्टी के पलानीस्वामी-पन्नीरसेल्वम गुट ने कानूनी लड़ाई लड़कर निर्वाचन आयोग से पार्टी का चुनाव चिह्न ‘दो पत्ती’ हासिल कर लिया है। यह अपने-आप में आधी जीत है, क्योंकि दो पत्ती का मतलब गरीबों की दयनीयता है और यह एमजी रामचंद्रन और जयललिता की विरासत की प्रतिकृति है।
आरके नगर का चुनाव राज्य की राजनीति में बदलाव ला सकता है, लेकिन असली राजनीतिक खेल केंद्र और भाजपा खेल रही है। पन्नीरसेल्वम और पलानीस्वामी, दोनों के नरेंद्र मोदी से अच्छे रिश्ते हैं। जयललिता के निधन के बाद पिछले एक वर्ष के दौरान भाजपा और नरेंद्र मोदी के सक्रिय समर्थन के बिना अन्नाद्रमुक खत्म हो गई होती। पन्नीरसेल्वम और पलानीस्वामी, दोनों ने व्यक्तिगत चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री को यह बताया कि दिनाकरन और शशिकला का धनबल अन्नाद्रमुक सरकार की निरंतरता के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इन दोनों नेताओं ने बहुत-सी अंदरूनी कहानियां केंद्र को बताईं, जिसने केंद्र को शशिकला गुट के काले धन संग्रह का पता लगाने के लिए प्रेरित किया। मोदी सरकार ने बेहद चतुराई के साथ एक के बाद एक छापा डलवाकर दिनाकरन की कमर तोड़ दी और शशिकला द्वारा जमा किए गए काले धन को उजागर कर दिया। जयललिता के जीवनकाल से ही नरेंद्र मोदी अन्नाद्रमुक की आंतरिक राजनीति को बखूबी समझते हैं। खुद जयललिता ने कई बातें मोदी से साझा की थीं, जो उनके दिमाग में ताजा हैं।
प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा तमिलनाडु को 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए तैयार कर रही है। सबसे दिलचस्प बात है कि हाल में जब मोदी बीमार करुणानिधि को देखने गए, तो काफी लोगों को संदेह हुआ। क्या भाजपा 2019 के लोकसभा चुनाव में द्रमुक के साथ गठबंधन करेगी? ऐसा करके भाजपा न केवल कांग्रेस को हाशिये पर कर सकती है, बल्कि उसे कोई फायदा भी नहीं उठाने देगी। यही मुख्य वजह है, जिसके चलते इन पंक्तियों के लेखक को लगता है कि आरके नगर के चुनाव में राष्ट्रीय राजनीति महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। और मतदाता निश्चित रूप से अन्नाद्रमुक को वोट देने से पहले दो बार सोचेंगे।
लेकिन अन्नाद्रमुक और पलानीस्वामी की सरकार को असली चुनौती उनके धुर विरोधी दिनाकरन से मिल रही है, न कि द्रमुक के एमके स्टालिन से। दिनाकरन के पास अब भी बहुत ज्यादा नकदी है। हालांकि लगातार आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय के छापे से दिनाकरन की छवि धूमिल हुई है। दिनाकरन अन्नाद्रमुक के एक गुट के नेता भी हैं, लेकिन वह थेवर समुदाय से ताल्लुक रखते हैं, जिसका अन्नाद्रमुक में वर्चस्व है। जयललिता की मुंहबोली बहन शशिकला भी थेवर समुदाय से हैं। शशिकला और थेवर समुदाय के गठबंधन को मन्नारगुडी माफिया (एक छोटा-सा साम्राज्य) कहा जाता है। मन्नारगुडी शशिकला के शहर का नाम है। इसी कारण सुब्रमण्यम स्वामी ने उन्हें मन्नारगुडी माफिया कहा, क्योंकि उनके पास आयकर विभाग के सितंबर, 2017 की आंतरिक रिपोर्ट के मुताबिक, तकरीबन तीस हजार करोड़ रुपये हैं।
आरके नगर विधानसभा चुनाव के बाद पलानीस्वामी-पन्नीरसेल्वम गुट की अन्नाद्रमुक सरकार के सामने बाधाएं आ सकती हैं। तमिलनाडु का भविष्य अंधेरे में है, वहां फिलहाल राजनीतिक स्थिरता के आसार नजर नहीं आ रहे। श्रीलंका का सीमावर्ती राज्य होने के कारण उसे बाहर से भी खतरा है। इसके अलावा माओवादी और लिट्टे जैसे प्रतिबंधित संगठन भी सक्रिय हैं, जिन्हें सिर उठाने के लिए राष्ट्र विरोधी ताकतों का समर्थन मिलता है। रजनीकांत और कमल हासन जैसे फिल्मी दुनिया के नायक भी वोटों का बंटवारा करेंगे। राज्य में राष्ट्रवादी ताकतें ढलान की तरफ हैं। न तो राहुल गांधी का कोई जनाधार है और न ही कांग्रेस का, जबकि तमिलनाडु में कांग्रेस का यह स्वर्ण जयंती वर्ष है। जयललिता के निधन के बाद तमिलनाडु को प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। भारी सूखा भारी चक्रवाती बारिश, प्राकृतिक आपदा जैसी चुनौतियों से राज्य के मुख्यमंत्री पलानीस्वामी बाहर निकल आए हैं। लेकिन उनकी असली चुनौती दिनाकरन और पन्नीरसेल्वम थे। हालांकि पन्नीरसेल्वम गुट के साथ उनका विलय हो गया है, लेकिन कार्यकर्ताओं के दिमाग में कोई तालमेल नहीं है। जमीनी वास्तविकता यह है कि अन्नाद्रमुक के कार्यकर्ता पूरी तरह से किसी भी एक गुट के साथ नहीं हैं। बहुत से विधायक पन्नीरसेल्वम की तरफ हैं। अन्नाद्रमुक के भीतर छह से सात छोटे-छोटे समूह हैं, जो जिला स्तर पर जाति आधारित आंतरिक राजनीति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जैसे थेवर गौंडर और नाडार। चाहे जो भी कहा और किया जाए, आरके नगर विधानसभा चुनाव तमिलनाडु की राजनीति के लिए एक बड़ी चुनौती बनेगी। और उसका लाभ नरेंद्र मोदी जैसे राजनेता को मिलेगा।