करवट लेती तमिलनाडु की राजनीति
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जयललिता अपने खिलाफ अदालत का फैसला सुनते ही अस्वस्थ हो गईं, और अब अत्यंत कातर अवस्था में जेल में बंद, कैदी नंबर 7402 का तमगा ढोती, इस बात का इंतजार कर रही हैं कि उनके कानूनदां कानून की कौन-सी दरार से उन्हें बाहर निकाल पाते हैं। जयललिता का राजनीतिक व शारीरिक डीलडौल जैसा है, उसमें यह काम आसान नहीं है। सुब्रह्मण्यम स्वामी खुश हो रहे होंगे कि भले उनका दांव सोनिया गांधी पर ठीक नहीं बैठा, तो जयललिता ही सही! तमाम तरह की राजनीतिक व नैतिक जिम्मेदारियों से मुक्त और तमाम तरह से नरेंद्र मोदी को अपनी उपयोगिता बताने में जुटे स्वामी के लिए यह सबसे बड़ा राजनीतिक मौका है। उन्होंने मोदी के लिए एक बार फिर से तमिलनाडु का दरवाजा खोल दिया है, और जैसा कि सभी जानते हैं, स्वामी जैसे लोग दूसरों के लिए एक दरवाजा भी तभी खोलते हैं, जब उससे उनके अपने लिए चार दरवाजे खुलते हों। इसलिए तमिलनाडु में भारतीय जनता पार्टी की राजनीति आने वाले दिनों में खासी दिलचस्प होने वाली है, क्योंकि अच्छे दिन आने वाले हैं -फिर नरेंद्र मोदी भी तो अमेरिका जीतकर लौट आए हैं।
पर जयललिता के लिए अब खुले और बंद दरवाजे का क्या मतलब? आज वह 66 साल की हैं, और अस्वस्थ हैं। मधुमेह की पुरानी शिकार हैं। दस साल बाद वह उम्र के जिस मोड़ पर होंगी, वह तो जीवन समेटने का मोड़ होगा। उस वक्त राजनीति का रूप-स्वरूप कैसा होगा और उसमें अपने पांव जमाना कितना आसान या कठिन होगा, कोई नहीं कह सकता है। इसलिए हम तो यही मानकर चलते हैं कि उनका राजनीतिक रसूख खत्म हुआ। वे ऊपरी अदालतों से यहां-वहां थोड़ी छूट पा भी लें कहीं, तो वह उसका इस्तेमाल अपने घाव सेंकने से अलग या अधिक तो कुछ कर नहीं पाएंगी।
आज की राजनीति का यह प्राथमिक पाठ है कि यहां सब कुछ भले ही आप करें, पर ऐसा भ्रम बनाए रखें कि यह सब सामूहिक जिम्मेदारी में किया जा रहा है। अत्यधिक व्यक्तिकेंद्रित राजनीतिज्ञों की यही दिक्कत उन्हें खा जाती है। वे सब कुछ अपने इर्द-गिर्द चाहते ही हैं, साथ ही, यह बताना भी चाहते हैं कि यहां सब कुछ वही हैं। लालू प्रसाद हों, ए. राजा हों, या मधु कोड़ा या फिर इन जैसे कई दूसरे, सभी इसी के मारे हैं। और इसलिए जब अपने बुलाए संकट में ये फंसे, तो दूसरा कोई अपनी गर्दन आगे करने नहीं आया। जयललिता को जेल के बाद जिन 16 लोगों के मरने की खबर आई है, वे सभी सामान्य पार्टी कार्यकर्ता या समर्थक हैं, जयललिता का रोज पांव छूने वालों में से कोई नहीं है। वे सब अब देख रहे हैं कि उनके पांव के नीचे अब कोई जमीन बची नहीं है। जयललिता की दिक्कत यह भी है कि उनके पास कोई राबड़ी देवी नहीं हैं। वह अपने ‘खानदान’ के साथ जेल गई हैं। उन्होंने पार्टी या सरकार में कभी, किसी योग्य व्यक्ति को उभरने ही नहीं दिया, जिससे तमिलनाडु का राजनीतिक प्रशासन एकदम खोखला हो गया था।
अपनी गिरफ्तारी और आगे विधायक बन सकने की योग्यता खोकर जयललिता ने भारतीय राजनीति को बड़े दिलचस्प मोड़ पर ला खड़ा किया है। सौ करोड़ रुपये का जुर्माना वह कैसे और कहां से भरती हैं, और उसके लिए उनका पोश गार्डन का महल, साड़ियों और जूतियों का उनका भंडार बिकता है या नहीं, यह देखना है। आखिर कोई नागरिक, जिसका व्यापारिक साम्राज्य नहीं है (या कि ज्ञात नहीं है) वह सौ करोड़ की रकम कहां से लाएगा, यह देखना हमारी राजनीति के चेहरे को एक बार फिर से साफ करेगा। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जयललिता न केवल ऐसी पहली मुख्यमंत्री हैं, जो कुर्सी से जेल पहुंचाई गई हैं, बल्कि अब तक दूसरे किसी को घोटाले की सजा के रूप में, अपनी ‘कमाई’ वापस करने की सजा भी नहीं मिली थी।
लेकिन उनकी एक कमाई और भी है, जो भारतीय राजनीति का चेहरा बना या बिगाड़ सकती है। लोकसभा की, तमिलनाडु की 39 में से 37 सीटों पर उनका कब्जा है, मतलब लोकसभा में, उनके तरकश में 37 बाण हैं। आंकड़ों की भाषा में बात करें, तो पूरे देश में सोनिया-राहुल-प्रियंका की तिकड़ी ने जितनी सीटें जीती हैं, उससे केवल सात सीटें कम जयललिता ने अकेले तमिलनाडु में जीती हैं। फिर उनके पास राज्यसभा की भी ग्यारह सीटें हैं। लोकसभा की ये 37 सीटें कांग्रेस को पुनर्जीवन दे सकती हैं। मोदी की पार्टी संभवत: लोकसभा में इसकी जरूरत महसूस न करे, लेकिन राज्यसभा में वह अल्पमत में है। वहां जयललिता की ग्यारह सीटें उसे बड़ा सहारा दे सकती हैं। मतलब जेल से जयललिता अपने 48 बाणों का इस्तेमाल कैसे करती हैं, उस पर भारतीय राजनीति का भविष्य निर्भर करेगा, और वह ऐसी स्थिति में हैं कि एक साथ कांग्रेस और मोदी की पार्टी, दोनों को शह दे सकती हैं। दिल्ली की राजनीति पर उनका यह दबाव, उन्हें तमिलनाडु की राजनीति का संचालन करने में मदद करेगा।
मोदी की पार्टी जरूर चाहेगी कि जयललिता जेल में रहें, और उनकी दोस्ती कुबूल करें। लेकिन प्रांतीय राजनीति की खिड़की से देखें, तो यह सांप को दूध पिलाने जैसा होगा। राज्यसभा में जयललिता की मदद पाने की मोदी कितनी कीमत अदा करते हैं, यह देखना होगा। कांग्रेस को लोकसभा और राज्यसभा में अपनी बेशर्त मदद देकर जयललिता को कुछ भी हासिल नहीं होता है। फिर एक रास्ता बचता है कि वह अपनी इस ताकत का इस्तेमाल कांग्रेस-भाजपा से अलग, जिस राजनीतिक समीकरण की तलाश की जा रही है, उसके साथ करें। अब, जबकि वह इस नए समीकरण का नेतृत्व मांग ही नहीं सकती हैं, इसके दूसरे घटकों को वह ज्यादा स्वीकार्य होंगी। मगर सबसे बड़ा सवाल यह है कि जेल में बंद, राजनीतिक प्रतिबंधों से घिरी और आर्थिक रूप से कमजोर जयललिता के 48 बाण और उनकी पार्टी उनका साथ किस तरह देती है। वह जैसे अकारण ही तमिलनाडु की राजनीतिक का केंद्र बन गई थीं, वैसे ही अचानक एक शून्य में बिला जाएंगी, या कोई नया अवतार लेंगी, यह देखना भारतीय राजनीति को नए सिरे से समझने जैसा होगा।