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नाजुक मोड़ पर खड़ा सीरिया
निक कमिंग ब्रूस
Updated Fri, 29 Aug 2014 06:54 PM IST
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ऐसे वक्त में, जब इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक ऐंड लेवेंट (आईएसआईएल) का चेहरा दिनोंदिन बर्बर होता जा रहा है, सीरिया में जारी गृहयुद्ध की वजह से पलायन करने वाले लोगों का आंकड़ा भी नई ऊंचाइयों को छू रहा है। हाल ही में जारी संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी की रिपोर्ट बताती है कि सीरिया संकट की वजह से 30 लाख से अधिक लोगों ने पलायन किया है। पलायन रूपी इस संकट को एजेंसी ने 'हमारे युग का सबसे बड़ा मानवीय आपातकाल' बताया है।
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आंकड़े बताते हैं कि पिछले 12 महीनों में ही 10 लाख से अधिक लोग देश छोड़ने को मजबूर हुए हैं। यह आंकड़ा सिर्फ उन शरणार्थियों का है, जिनका रजिस्ट्रेशन हो सका है। अनुमान है कि पलायन करने वाले लोगों की वास्तविक संख्या इससे कहीं ज्यादा है। इस पलायन का नुकसान शरणार्थियों को उठाना तो पड़ ही रहा है, सीरिया के आसपास के देशों को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। इन देशों का अनुमान है कि आंकड़ों से कहीं ज्यादा हजारों सीरियाई नागरिक सीमाई सुरक्षा व्यवस्था को धता बताकर उनके देश में प्रवेश कर चुके हैं।
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सीरियाई नागरिकों के पलायन का यह चेहरा कितना स्याह है, इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि लेबनान में, जिसकी आबादी पचास लाख से कम है, ग्यारह लाख से अधिक सीरियाई नागरिक प्रवेश कर चुके हैं, तो जॉर्डन में शरणार्थियों की संख्या छह लाख से अधिक तथा तुर्की में आठ लाख से ज्यादा है। इतना ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र का यह भी आकलन है कि सीरिया में जारी इस्लामी अतिवादियों के हमलों से घबराकर पिछले तीन वर्षों में बड़ी संख्या में लोगों ने इराक का रुख किया है। राष्ट्रपति बशर असद और विद्रोहियों के बीच जारी हिंसक संघर्ष की वजह से विस्थापित हुई 65 लाख आबादी की चर्चा करते हुए संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी ने अपने बयान में बताया है कि सीरिया की कमोबेश आधी आबादी इन हमलों से जान बचाने के लिए अपना घर छोड़ने और पलायन करने को मजबूर हुई है।
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संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त एंटोनियो गुटेर्ज बताते हैं, 'सीरिया संकट हमारे युग की सबसे बड़ी मानवीय समस्या बन गई है। दुखद है कि यह दुनिया न सिर्फ शरणार्थियों की जरूरतें पूरी करने में विफल रही है, बल्कि उन्हें शरण देने वाले देशों की समस्याओं से भी नहीं निपट सकी है।' एंटोनियो का यह बयान सीरिया संकट की विभीषिका बताने के लिए काफी है। समस्या सिर्फ शरणार्थियों को मानवीय सुविधा पहुंचाने की ही नहीं, उन चुनौतियों से भी पार पाने की है, जिनसे सीरिया के पड़ोसी देश जूझ रहे हैं।
सीरिया अपनी सीमा पश्चिम में लेबनान और भूमध्यसागर, दक्षिण-पश्चिम में इस्राइल, दक्षिण में जॉर्डन, पूरब में इराक और उत्तर में तुर्की से साझा करता है। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी का मानना है कि तीस लाख लोगों के पलायन की वजह से इराक ने सीरिया से लगने वाली अपनी सीमा पर नाकेबंदी कर दी है, जबकि तुर्की और जॉर्डन की सरकारों ने भी राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर सीरियाई नागरिकों के बढ़ रहे पलायन से निपटने के लिए खास आदेश जारी किए हैं। बावजूद इसके सीरियाई नागरिकों का पलायन जारी है, तो इसकी वजह है।
असल में, संघर्ष के दिनोंदिन बर्बर होते चेहरे को देखते हुए पलायन करने वाले लोगों को सीमा पार करने के लिए या तो तस्करों की मदद लेनी पड़ रही है अथवा उन्हें सुरक्षा गार्डों (सीमा पर तैनात सैनिक) को 'खुश' करना पड़ रहा है। शरणार्थियों द्वारा पलायन के लिए इस्तेमाल किए जा रहे इन खतरनाक तरीकों को संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी 'चिंताजनक संकेत' मानती है।
शरणार्थी एजेंसी की प्रवक्ता मेलिसा फ्लेमिंग कहती हैं, इस संकेत का मानवीय पहलू है, जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। असल में, शरणार्थियों की पीड़ा कई तरह की है। एक गांव से दूसरे गांव और एक शहर से दूसरे शहर छिपते-भागते वे सीमा पार कर पाते हैं। एक सीरियाई महिला की तरफ इशारा करते हुए वह कहती हैं, लेबनान पहुंचने से पहले वह 20 बार जगह बदलने को मजबूर हुई है। ये ऐसे लोग हैं, जिन्होंने इस भरोसे यहां शरण लिया है कि अब उन्हें कहीं और नहीं जाना होगा। उनके पास कोई चारा नहीं बचा है। उनका सब कुछ पीछे छूट चुका है। वे बिल्कुल हताश हो चुके हैं। फ्लेमिंग की इन बातों से शरणार्थियों का मनोविज्ञान समझा जा सकता है कि आखिर वे किन दुश्वारियों में अपना जीवन बिता रहे हैं।
फ्लेमिंग आगे कहती हैं कि अगर वे युद्ध से सीधे प्रभावित नहीं भी हुए हैं, तब भी, सीरिया में खत्म हो चुकी स्वास्थ्य सेवाओं का उन्होंने भारी खामियाजा भुगता है। आखिर महीनों-महीनों तक डर के साये में जीने से शारीरिक ऊर्जा प्रभावित होती ही है। यही वजह है कि शरणार्थियों में बड़ी संख्या उन लोगों की है, जो हृदय रोग, कैंसर और मधुमेह जैसी बीमारियों से जूझ रहे हैं और उन्हें इसके तत्काल इलाज की जरूरत है। कई तो बुनियादी सुविधा नहीं मिल पाने की वजह से होने वाली बीमारियों से भी पीड़ित हैं। ऐसे में क्या इन लोगों का दर्द सीरिया में आमने-सामने डटे विद्रोहियों और सीरियाई सैनिकों को संघर्ष विराम की ओर प्रेरित करेगा?
बहरहाल, इस तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है, जो कोई कम चिंताजनक नहीं है। इससे पार पाने के लिए भी पूरे विश्व को एक साथ आना होगा। निश्चय ही सीरिया अपने 64 वर्षों के इतिहास में सबसे बड़े संकट से जूझ रहा है और वह एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है, लेकिन सीरियाई शरणार्थियों की लगातार बढ़ रही संख्या शरणार्थी एजेंसी के लिए भी मुश्किलें खड़ी कर रही हैं। शरणार्थियों की इतनी बड़ी संख्या तक सहायता पहुंचाने के लिए उसे भी आर्थिक संसाधनों की जरूरत है, जिससे पूरा करने में उसे मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। उसकी ऊर्जा तो दक्षिण सूडान और मध्य अफ्रीकी गणराज्य में जारी गृहयुद्ध और इराक में फिर से सिर उठा रहे संघर्ष में भी खत्म हो रही है, जहां से पलायन कर रहे लोगों का भी उसे ध्यान रखना है।